DUSHYANT

DUSHYANT KI SHAKUNTALA

by Pradeep Anuplal Sharma

ISBN9789352060481

Type : Paperback

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Overview

Summary of the Book

भारतीय पौराणिक इतिहास में दुष्यन्त और शकुन्तला की प्रेम कहानी अद्वितीय है । इस कहानी में महाराज दुष्यन्त को युवा, शक्तिशाली एवं महावीर पुरुवंशी राजा के रूप में चित्रित किया गया है । उनकी कीर्ति पृथ्वी लोक से स्वर्ग तक फैली हुई थी । स्वयं देवराज इंद्र इनके परम मित्र थे, जिनकी सहायता वो असुरों के विरुद्ध युद्ध में कई बार कर चुके थे ।

एक समय देवराज इन्द्र की आज्ञा से मेनका विश्वामित्र जी की तपस्या को भंग करने के लिए पृथ्वी पर आयी और अपने कार्य में सफल हुई । इस सफल कार्य के परिणति के रूप में शकुन्तला का जन्म हुआ । इन्द्र की आज्ञा से अपनी तीन माह की अबोध कन्या को वन में अकेले छोड़ कर मेनका को वापस स्वर्ग लौटना पड़ा । संयोग से महर्षि कन्व उस मार्ग से कहीं जा रहे थे, तभी उनकी नजर शकुन्त पक्षियों द्वारा संरक्षित उस अबोध बच्ची पर पड़ी । महर्षि कन्व उस अबोध कन्या को अपने आश्रम में लाकर लालन-पालन किया और उस बच्ची को शकुन्तला नाम दिया ।

एक बार महाराज दुष्यन्त महर्षि कन्व से मिलने उनके आश्रम में पहुँचे, तभी उनकी दृष्टि तरुणी शकुन्तला पर पड़ी । महाराज दुष्यन्त, मेनका पुत्री शकुन्तला की सुंदरता पर आसक्त हो गए। शकुन्तला महाराज दुष्यन्त की प्रेयसी बनी । महाराज दुष्यन्त ने महर्षि कन्व की अनुपस्थिति में शकुन्तला के साथ गंधर्व विवाह किया और फिर शकुन्तला को अपनी अंगूठी भेंटस्वरूप देकर, अपनी राजधानी लौट गए । नियति के खेल के अन्तर्गत,किसी कार्यवश महर्षि दुर्वासा कन्व ऋषि से मिलने उनके आश्रम पहुँचे, और अनजाने में हुई गलती के कारण शकुन्तला को शापग्रसित कर गए । उस शाप के प्रभाव से महाराज दुष्यन्त अपनी पत्नी शकुन्तला को भूल गए । जब गर्भवती शकुन्तला महाराज दुष्यन्त के पास आई, तो पति दुष्यन्त ने उसे पहचानने तक से मना कर दिया और तिरस्कृत कर महल से बाहर कर दिया । शकुन्तला को महर्षि कश्यप के आश्रम का आश्रय मिला और वहीं उसने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया । जब इनपर नियति मेहरवान हुई तब शकुन्तला के हाथ की खोई हुई अँगूठी किसी मछुआरे के द्वारा महाराज दुष्यन्त के पास पहुँची तभी महर्षि दुर्वासा के शाप का प्रभाव खत्म हुआ । कालांतर में, इन दोनों का मिलन सम्भव हुआ । पुत्र सर्वदमन सहित अपनी पत्नी शकुन्तला को लेकर महाराज दुष्यन्त प्रसन्नता पूर्वक अपनी राजधानी लौट आए । शकुन्तला, दुष्यन्त की पटरानी बनी और पुत्र भरत आगे चलकर महाराज दुष्यन्त का उत्तराधिकारी बने । वही भरत चक्रवर्ती सम्राट बने और उन्हीं के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा ।

About the Author

प्रदीप अनूपलाल शर्मा ने भागलपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक ( विज्ञान ) की पढ़ाई पूरी की । पटना के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ऐरोनौटिक्स से एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीन्यरिंग का कोर्स किया ।

इनका जन्म बिहार के मुंगेर जिला के एक मध्यवर्गी परिवार में हुआ । इन्होंने अपना कर्मभूमि के रूप में मुंबई, महाराष्ट्र को चुना, जहाँ वर्तमान में ये एयर-इंडिया,मुंबई में कार्यरत हैं ।

विज्ञान के छात्र हो कर भी, इनकी रूचि साहित्य के क्षेत्र में काफी रहा है । ये कॉलेज के साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यकलापों में भी सक्रिय रूप से शामिल होते रहते थे । अपनी इसी रूचि के कारण ये साहित्य तथा साहित्य से जुड़े लेखन कार्यों से हमेशा प्रेरित रहे हैं । यही वजह रही है की अपनी भाषा पर इनकी काफी अच्छी पकड़ है । भारतीय पौराणिक साहित्य के प्रति इनका विशेष लगाव रहा है । ‘दुष्यन्त की शकुन्तला’, प्रकाशित होने वाली इनकी प्रथम लेखन कार्य है । ‘दुष्यन्त की शकुन्तला’,प्रथम लेखन कृति होने के बावजूद भी, इस पुस्तक में इनका कार्य सराहनीय है ।

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