मैं आज भी जब उस पल को याद करता हूँ मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं । उस समय मैं कॉलेज में पढ़ता था । पिताजी ने मुझे ठीक से पढ़ने के लिए एक ऐसी जगह में रख दिया था जो शहर में होते हुए भी बिल्कुल एकांत था । इतना एकांत कि रात को थोड़ी-सी भी हलचल होती तो डर लग जाता । कॉलेज जाना और रात को खाना खाने होटल जाना मेरी दिनचर्या में शामिल था । वह रात अमावस्या की रात थी , काली अंधेरी रात उसपर भी आसमान में काले-काले बादल छाए हुए एक भयानक-सा अनुभूति करा रहा था । सचमुच एक भयानक माहौल पैदा कर रहा था । दूर कहीं कुत्ते के भौकने की आवाज निस्तब्ध वातावरण में एक डरावना स्थिति ला रहा था , बिल्ली और झींगुर की आवाजें इतनी भयावह प्रतीत हो रही थी कि लगता था अब प्राण निकल जाएंगे । दिल की धड़कन बढ़ चुकी थी , दिल दाढ़-दाढ़ बज रहा था । इस नाजुक वक़्त में कोई भी सहारा नजर नहीं आ रहा था । भूखे पेट पेट में चूहे कूद रहे थे सो अलग । आसमान क काले-काले बादल अब तड़ित के साथ ही बिजली भी कड्कने लगे थे । दूर से पास आती पुलिस के गाड़ियों के सायरन की आवाज माहौल को और डरावना बना रहे थे । एक बार दिल किया कि होटल के लिए चल दें किन्तु ज्यों हीं दरवाजे तक आया ज़ोर से बिजली कड़की और बढ़े हुए पाँव वापस कमरे में लौट गए । एक तरह से मेरी घिघ्घी बंध गई । गले से आवाज नहीं निकल पा रही थी । मुझे पता था कि इस स्थिति में अगर मैं अपने मकान मालिक को पुकारता तो मेरी आवाज शायद हीं उन तक पहुँच पाता । इसलिए मैंने उन्हें पुकारा हीं नहीं , चुपचाप सब सहता रहा । बिजली भी कट चुकी थी इसलिए अंधेरे में और इजाफा हो गया था । लगता था बाहर में कुछ प्रलय होनेवाला है किन्तु इस प्रलय का जो कारण अभी उसे नजर आ रहा था वह बेमौसम की आंधी और तूफान था किन्तु इसके अंतर में कुछ ऐसे भेद छुपे थे जिसका पता लगते हीं सारा डर कपूर की तरह उड़ गया । हुआ कुछ यूं था कि शहर में शरकस आया हुआ था , जिसके फोकस आसमान में चमकती बिजली का अहसास करा रहे थे और दूर कहीं बहुत सारे राजस्थानी लुहार रात को हथौड़े चला-चलाकर हथियार बनाया करते थे जो बार-बार कड़कने के आवाज की अनुभूति कराते थे । कुत्ते और बिल्लियों की आवाजें वैसे तो रोज आती हीं रहती हैं तो ऐसा कुछ नया नहीं था जिससे इतने खौफनाक स्थिति की प्रतीति हो , पर प्रत्यक्षत: हो तो यहीं रहा था । अब सच्चाई जानते हीं सारा डर जा चुका था । मुझे यह सीख मिली कि भरम में आदमी को नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि मन का भरम सबसे बड़ी चीज होती है और ऐसे ही हौलनाक स्थिति को जन्म देता है , कदाचित मन में भरम नहीं पालना चाहिए ।

दूसरा भाग

यह एक आपबीती सच्ची घटना है । मैं और मेरे पिताजी अपनी बड़ी बहन की ससुराल से विदाई कराने जीप से गए थे । लग्न का समय था इसलिए कोई गाड़ी मिल नहीं पा रही थी किन्तु पिताजी के अपने प्रभाव से एक गाड़ी मिल गई । पर गाड़ी का ड्राइवर छुट्टी पर था । सो मुश्किल था कि बिना ड्राइवर के गाड़ी कैसे जाएगी पर इसका भी समाधान था क्योंकि पिताजी को गाड़ी चलाने आती थी । मैं और पिताजी गाड़ी वाले के यहाँ गए और वहाँ से पिताजी के साथ हमलोग बहन के ससुराल पहुंचे । रात को विश्राम किया और सुबह विदाई हो गई । हमारे बिहार में रिवाज है कि जब पहली बार कोई दुल्हन विदा होकर अपने मायके जाती है तो उसे फल-मूल , मिठाई वगैरह उपहार स्वरूप दिया जाता है । दीदी को भी उपहार में बहुत सारे उपहार मिले थे । वे सारे दऊरा (टोकरी) की शक्ल में थे । वे सारे गाड़ी के पीछे लाद दिये गए । दीदी को भी पीछे हीं बैठाया गया । दीदी पीछे अकेली बैठी थी और घूँघट काढ़े थी । किसी भी तरह से अपने को संभाला था तबतक दऊरा उसके शरीर पर गिरने लगा क्योंकि वह बेतरीब तरीके से रखा हुआ था । वह दऊरा को संभालना चाह रही थी पर संभाल नहीं पा रही थी । ससुराल होने की वजह से कुछ बोल भी नहीं पा रही । तभी साइड मिरर में पिताजी ने गाड़ी की स्थिति देखी । उन्होने मुझे पीछे जाने का इशारा किया । यह सब करने में उन्हें तीन-चार मिनट लग गए और इसी क्षण गाड़ी का बैलेंस गड़बड़ा गया और गाड़ी की स्टेयरिंग दायें की ओर मुड़ गई । दायें ओर मिट्टी की नई भराई हुई थी सो गाड़ी के पहिये ने मिट्टी में धंसना शुरू हो गया । इसके पहले कि पिताजी स्टेयरिंग संभालते गाड़ी कई फुट गहरी खाई सदृश्य गढ़े में पलट गई । लोग जो अभी भी हमलोगों को विदा कर गाड़ी के ओझल होने की प्रतीक्षा कर रहे थे तत्क्षण हमारी गाड़ी के पीछे दौड़े । गाड़ी ने तीन पलटा खाया था पर हमलोग सुरक्षित थे । लोगों ने हमलोगों को गाड़ी से निकाला पर हमलोग बिल्कुल ठीक थे । यह भगवान का आशीर्वाद हीं था कि हमलोग इस घटना में बाल-बाल बच गए थे । यहाँ तक कि मेरी दीदी की चनकी हुई चूड़ी भी नहीं फूटी थी । इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि मारने वाले से बड़ा बचाने वाला होता है ।