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Kuch Suni Kuch Kahi

Literature & Fiction | 11 Chapters

Author: Smt. Rajni Raina

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This anthology is a collection of ten short stories which explore the volatilities of life, uncertainties of life, complexities of life, ambiguities in life, dynamics of human relationships in this fast-changing world, the frailties of human nature, the unpredictability of life, the difficulties of life, the challenges in life, the gift of resilience possessed by some human beings. 

इशारा

“तुमसे कितनी बार कहा कि सारा काम करने की कोशिश खुद मत करो। वह पड़ोस के भार्गव साहब की महराजिन से बात करो न। उनके यहाँ करने के बाद हमारे यहाँ आकर बना दे।”

“मैंने बात की थी पर उसने मना कर दिया पड़ोस की मिसज़ शर्मा से भी बात की थी-उन्होंने कहा है कि वह भी इधर उधर देखेगी। अब क्या करूँ। चलो जैसे तैसे निपट ही जायेगा।”

“अरे निपट तो सब जाएगा पर अपनी हालत भी तो देखो-क्यों न दिव्या को कुछ दिनों के लिए बुला लो कुछ तो सहारा तुम्हें हो ही जाएगा।”

“उसकी पढ़ाई में हर्ज होगा और यह मैं नहीं चाहती।”

“तो कौन कॉलेज जाती है। प्राइवेट कैंडीडेट के रूप में ही तो तैयारी कर रही है। यहीं भी पढ़ सकती है। कुछ तो मदद उसके आ जाने से तुम्हें मिल ही जाएगी। ओह! माँ ने तुम्हें लिखा भी था पर तुम ही पता नहीं क्यों टाल गयी- ख़ैर वह शुरु शुरु की बात थी पर अब दिन पर दिन तुम्हारा इस तरह सारा काम करना मुमकिन न होगा। ज़िद मत करो कहीं ज्यादा स्ट्रेन से कुछ ऐड़ा बेड़ा हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।”

“अब तुम इतना कह रहे हो तो मां से बात करती हूँ और फिर दिव्या का मन भी तो देखना पड़ेगा।”

“वह तुम्हें बहुत प्यार करती है और फिर बहिन बहिन में वक़्त पर मदद नहीं करेगी तो कौन करेगा। तुम्हें ज्यादा संकोच लग रहा हो तो मैं ‘पापा’ से बात कर के देखूं?”

“नहीं उसकी कोई ज़रूरत नहीं। मैं माँ से फोन पर बात कर के देखती हूँ। डिलवरी के समय तो अम्मा जी और माँ दोनों आएगी।”

दो तीन दिन तक आरती सोचती रही फिर उसने मां को फ़ोन मिला ही दिया। “माँ..कैसी हो?”

“मैं बिल्कुल ठीक हूँ-तुम्हारे तरफ ही ध्यान लगा रहता है, मन तो करता है कि तुम्हारे पास आ जाऊँ इतने सालों बाद भगवान ने यह दिन दिखाया है।”

“नहीं मां इतनी जल्दी आने की ज़रूरत नहीं’ महीना भर पहले आ जाना और उस समय अम्मा जी भी आ जाएगी।”

“यह तो बहुत अच्छा हुआ। एक जना अस्पताल में रहेगा और एक घर से सब संभालेगा”। “पर मां अगर दिव्या को तुम अभी भेज सको तो मुझे बड़ा सहारा हो जायेगा। वैसे तो मैं सब कर लेती हूँ पर किसी किसी दिन इतनी कमजोरी लगती है कि कुछ भी नहीं कर पाती। अब यह भी कहाँ तक छुट्टी ले-और फिर रसोई का काम तो यह भी नहीं कर पाती। महराजिन ढूंढ़ रही हूँ पर अभी तक कोई मिली नहीं। एक आई थी तो इतनी चटक भटक भला उनसे क्या काम होगा।”

“दिव्या को तो मैं भेज दूँ पर यहाँ वह कोचिंग के लिए भी तो जाती है ख़ैर अब कुछ न कुछ तो करना होगा। मैं ज़रा इनसे भी बात कर लूँ फिर दो चार दिन में तुम्हें बताती हूँ।”

“अरे माँ दिव्या को तो यह भी पढ़ा दिया करेंगे। इंटर की तो परीक्षा देनी है अब इतना तो यह कर ही सकते हैं नहीं तो कोई ट्यूशन लगवा देंगे।”

“फिर भी मैं दिव्या से बात कर लूँ क्योंकि वैसे ही कहीं एडमीशन न मिलने से परेशान है ख़ैर चलो दो चार दिन में बताती हूँ।”

अगले दिन दिव्या जैसे ही कोचिंग क्लासेस से वापस आई माँ ने कहा, “दिव्या आरती का फोन आया था- तुझे कुछ दिनों के लिए बुलाया है-तू जानती है न कि तू मौसी बनने वाली है। अब अकेले उसे सब करना पड़ता है-वैसे झाड़ू पोछे वाली तो है पर खाना बनाने वाली कोई नहीं है।”

“तो क्या मैं उनकी कुक बन कर जाऊँगी। और फिर मेरी कोचिंग का क्या होगा। अब प्राइवेट इम्तहान दे रही हूँ तो भी कोचिंग की तो ज़रूरत पड़ेगी।”

“वह तेरे जीजा तुझे पढ़ा देंगे”

“बस! रहने दो माँ। जीजा जी भला क्या पढ़ायेंगे? वैसे भी मुझे उनसे डर लगता है।”

“डर लगता है क्यों?”

“यह मैं नहीं जानती-पता नहीं क्यों मेरी पढ़ाई में ही सब अड़चने क्यों आ रही है” कहती हुई वह कमरे से बाहर चली गई।

शाम को हरीप्रसाद जी ऑफिस से आए तो घर में बड़ा सन्नाटा सा नजर आया। आरती चाय लेकर आई तो उन्होंने पूछा, “आरती क्या बात है, सब ठीक तो है न?”

“सब ठीक है मैंने मां से फोन बात कर के दिव्या को भेजने के लिए कहा। तुम्हें तो मालूम है कि दिव्या इस साल इंटर की परीक्षा एज ए प्राइवेट कैंडीडेट दे रही है। कोचिंग के लिये भी जाती है। अब यहाँ तीन चार महीने के लिए तो नहीं आ सकती है। महीने डेढ़ महीने तो चल जाएगा। पता नहीं तुम क्यों उसे बुलाने के लिये कह रहे हो। अरे धीरे-धीरे मैं सब कर लूँगी’ कहते तो यही है कि प्रेगनेन्सी में काम करते रहना चाहिए, डिलवरी में आसानी होती है।”

“अब यह तुम मुझे न बताओ। थोड़ा बहुत काम करना और सुबह से शाम तक जुटे रहना अलग बात होती है। ख़ैर चलो महीने डेढ़ महीने के लिए भी बुला लो तब तक कोशिश करते हैं शायद कोई न कोई मिल ही जावे। असल में इन लोगों में भी दिमाग आजकल खत्म हो गये हैं। तंख़ा तो इतनी लंबी मांगते हैं कि जैसे सब उन्हीं को दे दो। ख़ैर छोड़ो यह सब तो चलता ही रहेगा। वक़्त में आगे हर एक को झुकना पड़ता है और यह भी हमारी मजबूरी समझते हैं। सुनो मुझे बहुत ज़ोरों से भूख लगी है।”

“ओह मैं ऐसी पागल हूँ आते ही शुरु हो गयी। मैंने आज गाजर का हलुआ बनाया है अभी एक मिनट में आई।”

लगभग एक हफ़्ते बाद दिव्या आ गयी। आते ही उसने काफी कुछ संभाल लिया। वैसे भी कुकिंग कार्य उसका शौक था। दिव्या के आ जाने से आरती को बड़ा सहारा मिला।

धीरे-धीरे दिन बीत रहे थे। 1 दिन का सारा काम आरती खुद निपटाती पर शाम तक वह काफी थक जाती। रात का खाना दिव्या ही बना ली। एक दिन दिव्या ने मोती पुलाव और फ्रूट क्रीम बनाई। हरि ने तारीफ़ करते हुए आरती की ओर देख कर कहा, “तुमने ऐसा कभी नहीं बनाया। भई वाह! पेट भर गया पर मन नहीं भरा। किसी दिन इसे फिर रिपीट करना।”

“इसने कुकिंग कोर्स किया था न और वह भी ‘शाही मेनू’ से- इसे शुरु से ही खाना बनाने का शौक रहा है। मैगज़ीन से किताबों से देख-देखकर नयी नयी रेसिपी ट्राई करती थी।”

“अरे वाह! मुझे मालूम होता तो मैं साली साहब से ही”........कहते कहते वह रूक गया।

आठ दस दिन बाद हरी ने खाना खाते समय कहा, “बहुत दिन हो गये कहीं निकले नहीं, चलो आज पिक्चर देखने चलते हैं” पिक्चर का नाम सुनते ही दिव्या चहक उठी। “हाँ हाँ जीजा जी-वह परिणिता लगी है, चलिए उसे ही देखते हैं।”

“अरे! वह तो बहुत पुरानी है।”

“पुरानी है पर मैंने तो नहीं देखा है न चलिए न दीदी तुम कुछ बोल नहीं रही हो। तुम भी चलो न?”

“भई तुम लोग हो आओ मेरे लिए इतनी देर एक जगह बैठना मुश्किल हो जाएगा, पर तुम लोग हो आओ। जब से आई हो बाज़ार के अलावा कहीं निकली भी नहीं”

“नहीं नहीं फिर रहने दो-फिर कभी चलेंगे।”

“फिर कब जाएगी अब क्या यह पिक्चर महीने दो महीने थोड़ी लगी रहेगी-पुरानी पिक्चर है ज़्यादा से ज़्यादा दस पन्द्रह दिन। यहां जब से आई है कहीं निकली भी नहीं। चौका चूल्हा ही संभालती रही-तुम क्यों चुप हो गये- तुम भी तो कुछ कहो न-”

“अब मैं क्या कहूँ-मैं तो चलने को तैयार हूँ-”

“तो बस ज़्यादा बहस की ज़रूरत नहीं-दिव्या जाओ तैयार हो जाओ- टाइम से पहुँचो वर्ना आधी पिक्चर देखकर ही लौटना पड़ेगा।”

दिव्या चली तो गयी पर बाद में उसे लगा कि उसे दीदी को छोड़कर इस तरह नहीं आना चाहिए था। सामने पिक्चर चल रही थी पर मन आधा दीदी के पास ही चला जाता।

हॉल से बाहर आते ही हरि ने दिव्या से वहाँ के एक शानदार रेस्ट्रा में चलने को कहा। दिव्या के बहुत मना करने पर आख़िर हरी की बात माननी पड़ी। बैरा को उसने उसने पचरंगी पकौड़ी और कॉफ़ी का आर्डर दिया। चलने से पहले उसने वहाँ के मशहूर सैंडविच आरती के लिये पैक करवा लिये।

दरवाजा खोलते ही आरती ने पूछा, “क्या ट्रैफ़िक ज़्यादा था तुम लोगों को आने में कुछ देर हो गयी।”

“दीदी जीजा जी ने एक बड़े शानदार रेस्ट्रा में हमें चाय पिलवाई-वहाँ के मशहूर सैंडविच जीजाजी तुम्हारे लिए भी लाए हैं। अब तुम इस समय खाने की झंझट मत करो। सैंडविच और और कॉफ़ी से काम चल जाएगा।”

“पर मैंने तो पावभाजी बना ली है तुझे पसन्द है न। सैंडविच फ्रिज में रख देते हैं कल ब्रेकफास्ट में काम आएंगे’ हाँ पिक्चर कैसी लगी यह तो बताया ही नहीं तूने।”

“बहुत बढ़िया और हीरो अशोक कुमा तो आपके फ़ेवरेट है न। सच में बहुत अच्छी लगी”

“अरे दिव्या पुरानी पिक्चरों की बात ही अलग थी। आजकल तो इतना उछलकूद और शोर शराबा रहता है कि असली कहानी ही पकड़ से छुट जाती है।”

लगभग पन्द्रह बीस दिन बाद दिव्या ने आरती से कहा, “दीदी और सब सबजेक्ट तो मैं कर ले जाऊंगी पर साइंस मैथ्स में मुझे दिक्कत हो रही है। वहाँ तो कोचिंग के लिये मैं जाती थी। यहाँ भी कोचिंग क्लासज़ ज़रूर होंगे।”

“अरे! वहाँ जाकर क्या करेगी-एक तो घर ऐसी जगह है कि सब चीज़ यहीं से मीलों दूर- पर इसमें परेशानी की क्या बात है? दोनों ही सबजेक्ट तेरे जीजा बड़े आराम से तूझे पढ़ा दिया करेंगे। सुबह तो ऑफ़िस की जल्दी रहती है शाम का समय ठीक रहेगा।”

“अब वह शाम को थककर वापस आते हैं तो फिर मैं उनके गले लग जाऊँ।”

“अब साली को तो गले लगाना ही पड़ेगा तू इसकी फिकर मत कर आज मैं बात करूँगी।”

शाम को चाय नाश्ते के बाद आरती ने हरि से कहा, “तुमसे एक बात कहनी है। दिव्या को साइंस और मैथ्स में कुछ दिक्कत हो रही है। जहाँ तक मुझे मालूम है यहाँ तो आसपास कोई कोचिंग क्लासेज भी नहीं है। तुम ही शाम को थोड़ी देर उसे देख लिया करो।”

“तुम देखती हो न शाम को मुझे आने में अक्सर देर हो जाया करती है। ख़ैर अब कुछ न कुछ तो करना ही है। वैसे भी ऑफ़िस में भी पूछ कर देखूंगा। सभी के बच्चे पढ़ने लिखने वाले हैं। सभी ने कहीं न कहीं कोचिंग क्लास ज़रूर ज्वाइन कर रखा होगा पर दिव्या को दूर अकेले भेजा भी तो नहीं जा सकता। ख़ैर मैं दो एक दिन में मालू करके तुम्हें बताऊँगा।” बहुत कोशिश करने पर भी कोचिंग का कोई इन्तज़ाम न हो पाया तो उसने दिव्या को पढ़ाना शुरु किया। पहले पहल तो दिव्या चुपचाप सुनती रहती और कुछ पूछने में उसे संकोच होता लेकिन फिर धीरे-धीरे उसकी झिझक दूर हो गयी. एक दिन ऑफ़िस से आकर उसने दिव्या को साइंस की एक किताब देते हुए कहा, ‘इसे पढ़ कर देखना बहुत अच्छी तरह सब इक्सप्लेन किया है। दिव्या ने किताब को उलट-पुलट कर देखते हुए हरि की ओर कृतज्ञता से देखा पर बहुत चाह कर भी कुछ बोल न पाई। पर उसकी कृतज्ञता को आँखों ने बहुत कुछ कह दिया। इसी तरह दिन बीत रहे थे-

दिन में वह हरि द्वारा पढ़ाए टॉपिक्स को दुहराती ताकि उसके द्वारा पूछे जाने पर वह उत्तर दे सके। एक दिन पढ़ाते समय हरि ने अचानक दिव्या से पूछा, ‘तुम अपनी दीदी की तरह साड़ी नहीं पहनती”

‘पहनती हूँ पर कभी-कभी असल में मुझसे संभलती नहीं”

“यहाँ लाई हो?”

“हाँ एक दो लाई हूँ”

“अच्छा तो कल पहनना”

“क्यों?” “बस! ऐसे ही तुम्हें साड़ी पहने कभी देखा नहीं इसीलिये कह रहा हूँ”

अगले दिन वह साड़ी पहन कर कमरे से बाहर आई तो दीदी ने देखते ही कहा, ‘अरे! तुझे क्या हुआ है आज साड़ी कैसे पहन ली?’

“वह कल जीजा जी पूछ रहे थे कि मैं साड़ी पहनती हूँ कि नहीं तो.........”

“ओह! अच्छा किया........” कह तो दिया आरती ने पर दिल में कुछ खट से हुआ। आगे कुछ कहने जा रही थी पर चुप हो गयी।

दो दिन बाद आरती शाम को अपने कमरे में लेटी हुई थी अचानक उसने दिव्या को आवाज़ देकर अपने पास बुलाया। “दिव्या मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही है हरि आते होंगे, ‘तू चाय बना देना तू भी ले लेना। मैं अभी नहीं पीऊँगी।”

“चाय के साथ कुछ नाश्ता भी बनेगा?”

“नहीं उसकी ज़रूरत नहीं वह सैंडविच फ्रिज में रखे ही रह गये-उन्हीं को निकाल देना”

“वह ख़राब न हो गये हो- मैं कुछ और बना दूँ?”

“नहीं उसकी कोई ज़रूरत नहीं। देख ले अगर सैंडविच खराब हो गये हैं तो मठरी रखी है वह दे देना”

“दीदी कच्चे केले रखे हैं उसकी पकौड़ी बहुत अच्छी बनती है।"

“देख तुझसे जो कहा है उतना ही कर”

दिव्या आगे बोल न सकी पर दीदी के स्वर में एक उलझन की खनक उसने सुन ली।

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