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JEEVAN DARSHAN GITA

Young Adult Fiction | 36 Chapters

Author: Neha Singh

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Many Mahatmas like Pandit Madan Mohan Malaviya ji, founder of Banaras Hindu University, honored with Bharat Ratna, have descended on this land of India and such people, while defeating every negativity, performing their Sanatan Dharma duties by being simple to extraordinary deeds, for every future generation Incredible and exemplary impressions are left. Such Mahatmas have been continuously enlightened by Srimad Bhagavad Gita to understand and r....

Chapter - 1

अध्याय – 1

अर्जुन विषाद योग
(सकारात्मकता एवं नकारात्मकता का प्रभाव)

अर्जुन विषाद योग ​​​​​​​(सकारात्मकता एवं नकारात्मकता का प्रभाव)

यदि हम गीता के प्रथम अध्याय को पढ़ते हैं तो उसमें सबसे पहले यही ज़िक्र होता है की धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र में कौरवों एवं पांडवों के बीच क्या हो रहा है? अर्जुन अपने ही भाई, चाचा, गुरु, और मित्रों को देखकर युद्ध करना नहीं चाहता | अपनों से कैसे युद्ध कर सकता है आदि बातों को सोचकर रोता हुआ थक हारकर बैठ जाता है |

परन्तु मेरी समझ से यदि हम इस अध्याय को समझे तो हमारे शरीर को क्षेत्र, धर्म को कर्तव्य तथा कुरु को बुरे विचार से जोड़ा गया है | उदाहरण के लिए जैसे कोई बच्चा जन्म लेता है यानि एक क्षेत्र का निर्माण हुआ | वो बच्चा पैदा होते ही मोह माया में नहीं पड़ता | वो सिर्फ अपने कर्तव्य करता है जैसे भूख लगने से रोना, हाथ-पैर हिलाना, खाना, पीना आदि, यानि वह शरीर (धर्मक्षेत्र) केवल कर्तव्य कर रहा है | लेकिन जैसे ही वह शरीर बड़ा होता है उसे मोह-माया, इर्ष्या-द्वेष जैसे अनेकों “भाव” घेर लेते हैं अर्थात् वह शरीर कुरु रुपी शरीर यानि कुरुक्षेत्र बन जाता है |

अब इस धर्म (पांडव) एवं कुरु (अधर्म/कौरव) के बीच युद्ध होता है | आखिर विजय हमेशा धर्म की यानि सत्य की होती है, परन्तु फिर भी धर्म एवं अधर्म, सत्य एवं असत्य की बीच युद्ध होता ही रहता है |

अगर इसी बात को अपने जीवन से जोड़े तो यह समझ आता है की हमारा मन कभी कभी सही एवं गलत के बीच में लड़ता रहता है | क्या सही है, क्या गलत, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए आदि बातों में हम फंस जाते हैं | हम कई समस्याओं से इतने घिरे रहते हैं कि सही फैसला नहीं ले पाते और परेशान हो जाते हैं | कभी कभी समस्या इतनी बढ़ जाती है की कुछ लोग आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाते हैं मगर समस्याओं से निपटने की कोशिश नहीं करते |

अर्जुन विषाद योग का अर्थ भी वही है | कई समस्याओं से घिरे अर्जुन | हम सबकी भी यही अवस्था है, कई समस्याओं से परेशान ज़िन्दगी, चारों तरफ समस्या ही समस्या | मोह-माया का प्रभाव इतना की अपने खून के रिश्ते होने के बावजूद कभी कभी अपनों से ही लड़ना पड़ता है | कहीं कहीं हम गलत न होने पर भी अपनों से डाट खाकर सहते हैं, क्यों? सिर्फ और सिर्फ एक लगाव के कारण | अर्जुन अपनों से लड़ नहीं पाता है जबकि वो जानता है कि वे सभी अधर्मी हैं, गलत हैं फिर भी | अर्जुन अपने उस समस्या से निपट नहीं पाता और सब छोड़कर थक-हारकर बैठ जाता है |

चाहे अर्जुन हो या हम, जिंदगी में किसी भी तरह की विषम परिस्थिति आये यानी विषाद अवस्था आये उस परिस्थिति से डरकर रोना या भागना नहीं चाहिए या सबकुछ छोड़कर हारकर बैठना भी नहीं चाहिए | उससे लड़ना चाहिए, हर एक समस्या से निपटना और उत्तरोतर जीत हासिल कर अपने लक्ष्य तक पहुंचना चाहिए |

मगर कैसे ?

यही आगे के अध्याय में कृष्ण (प्रकृति) हमें सिखाते हैं एवं समझाते हैं |

ॐ तत् सत्

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Chapter - 3

अध्याय – 2

सांख्ययोग (अपने आपको पहचानो)

सांख्ययोग (अपने आपको पहचानो)

पहले अध्याय में हमने थके हारे अर्जुन की स्थिति जानी जैसे हम लोग अपने जीवन के समस्याओं से थक हार के बैठ जाते हैं, सब छोड़ देते हैं और लड़ने के बजाय हार मान लेते हैं | गीता के दूसरे अध्याय में हारे हुए अर्जुन को सही और धर्म के विषय में उनको समझाते हुए उनको खड़ा करने के लिए श्री कृष्ण आते हैं | मेरी नज़र में यदि श्रीकृष्ण को सखा कहें तो समझना ज्यादा सरल हो जायगा | जैसे हम जब जीवन में हार के बैठ जाते हैं तब हमें हौसला, हिम्मत और सही रास्ता दिखाने के लिए कोई हाथ पकड़कर उठाता है | हमें ऊर्जावान बनाते हैं, लड़ने की शक्ति एवं मार्गदर्शन देते हैं | भगवद्गीता में यही कार्य श्री कृष्ण करते हैं |

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