आज ही आखिर क्यूं?

आत्मकथा
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ठीक है चलो कुछ बात कर ही लेते हैं, किंतु सोचता भी हूं, आज ही आखिर क्यूं? मन एक तरफ कभी रुक ही नहीं सकता , हां यही हुआ भी मेरे साथ ।ठीक ही कहा गया है _मन: शीघ्रतरम वात।त ।दिन अच्छा व्यतीत होता है।संध्याकालीन आकाश अपनी मनोहारी सौंदर्य छटा बिखेर रहा था। संसार रात्रि के स्वागत की प्रतीक्षा में था। अन्ततः रात भी आ गई ।समय बीतता गया , रात की खामोशी अब निद्रा की तरफ पुकार रही थी।ईश्वर को याद करके अपने बिस्तर पे निद्रा की पुकार को स्वीकारते हुए उसकी गोद में समाहित होता हूं।अन्ततः मैं उसका हो जाता हूं,अब मैं स्वयं का भी नहीं हो पाता हूं।अब उसने ऐसी पकड़ से मुझको जकड़ा हुआ है कि मैं कुछ कर ही नहीं सकता ।अब मैं स्वयं का होश भी नहीं संभाल सकता ।आखिर उसने मुझे वश में कर ही लिया।अब मुझे वो अपनी बाहों में जकड़े हुए सहलाते हुए अपना बना लेती है।अब मैं संपूर्ण खोया हुआ हूं।अब मैं निद्राकाल में था।यकायक शीत पवन चलती है जो मुझ पर ऐसी लग रही है जैसे मुझे कोई सहला रहा हो।अब क्या मैं निद्रा के आगोश में आ जाता हूं। मैं देखता हूं कि मैं एक ऐसी जगह पर खड़ा हूं जहां मेरे पीछे नदी है आगे कुछ दूरी तक मैदान और उसके आगे जंगल ।में भय में था क्यों कि वहां किसी प्रकार का प्राणी नही दिख रहा था।अचानक अजीब सी आवाजें आने लगीं और मेरे अंतर्मन में खलबली मचने लगती है कि अब क्या होगा ? आवाजें आनी बंद हुंई ,तब जाकर कुछ सुकून मिला।लेकिन सुकून कहां मिलने वाला था ,वो कहावत याद है न कि इतना सन्नाटा मतलब कुछ आफत ।ऐसा ही हुआ मेरे साथ मैं पीछे मुडता हूं तो देखता हूं, कि जो नदी अभी जलतरंगों में कलरव कर रही थी , अब वह उबलते हुए लावे में तब्दील हो चुकी थी।जरा सोचकर बताइए कि वहां अगर आप होते तो आप कैसा महसूस कर रहे होते ,अंदाजा लगा के देखिए । मेरे साथ भय और निराशा थी ।अब क्या नई मुसीबत आन पड़ी है कि अब क्या करूं मैं एक बड़ा पक्षी जो गुलाबी रंग का टोडो है । यह भयानक होने के साथ ही यह विशालकाय भी था । उसकी चोंच नुकीली एवं खतरनाक थी ।वो मुझे देखकर अजीब सी आवाज निकालता है । मैं डर की हालत में पूरी शक्ति लगाकर दौड़ना शुरू करता हूं और देखता हूं कि वो भी मेरे पीछे आ रहा है। मैं अपनी गति बढ़ा कर मैदान पर करके जंगल में भाग कर एक घने पेड़ के पीछे छुप गया।ढूंढ न पाने के कारण वो वापस चला जाता है।अब कुछ संतुष्टि मिली।लेकिन अभी भी मेरे लिए खतरा टला नहीं था ।याद किया ही था कि शैतान हाजिर।अचानक जंगल में अंधेरा हो गया । मैं अब थोड़ा आगे बढ़ रहा किंतु यह क्या ? मैं एक गुफा में जा पहुंचा जहां बहुत दूर _दूर पर मशाले जल रहीं थीं लेकिन दूरी होने के कारण मध्य स्थान अंधकारपूर्ण था । मैं चलता गया अब क्या भयानक आवाजें सनसनाने लगीं तो देखता हूं कि अनेक चमगादड़ मेरी तरफ आ रहे हैं मैं लेट जाता हूं और सारे चले जाते हैं । मैं अब भय से पूरी तरह भयभीत हो रहा था ।एकदम से जमीन थर्राती है और मैं भागना शुरू कर देता हूं । मैं दौड़ता हुआ मन में अजीब सी व्यथा बनाते हुए सोचता हूं आखिर आज ऐसा क्यों?मेरा ध्यान सोच में ही था कि मैं अपने आगे ठोकर को नहीं देख पाता जिस कारण मैं ठोकर खाकर गिर जाता हूं।अरे यह क्या मेरी आंखे खुल जाती हैं मैं निद्राकाल से वापस आ जाता हूं।मेरा सारा शरीर पसीने से भीग गया था। मैं अब लंबी सांस लेता हूं और अपने अंतर्मन से कहता हूं कि यह तो एकमात्र स्वप्न है।और मैं पुनः निद्राकाल में चला जाता हूं। निद्राकाल में चला तो जाता हूं लेकिन अभी भी मैं बेबस सा महसूस कर रहा था और अंदर ही अंदर डर के साथ कुछ अजीब व गरीब बैचैनी हो रही थी ।मैं स्वयं के मन को कैसे समझाऊं क्योंकि वो तो कुछ सुनना ही नहीं चाह रहा था कि कुछ है या कुछ होएगा वो भी गलत।मन तो मन है जिसे समझा पाना मुश्किल होता है तो आखिर करूं तो क्या करूं?यही सारी बातें जो कि मेरे मस्तिष्क को विराम करने ही नहीं दे रहीं थीं।लेकिन मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा था कि मैं अपने मन में चल रहे भ्रम को दूर कर सकूं। मैंने कोशिश की क्योंकि मैंने उर्दू का एक शेर पढ़ा हुआ है कि ,"तदबीर के दस्ते जर्रीन से तकदीर दरखशा होती है।कुदरत भी मदद फरमाती है जब कोशिश ए इंसान होती है।"इतने सारे वबाल में मैं सोचता हूं कि आखिर आज ही ऐसा क्यों? मैं ईश्वर की तरफ हो लिया और गिड़गिड़ाने लगा कि हे! ईश्वर मैं आपकी शरण लेता हूं मेरी परेशानी दूर करो ।आखिरकार कोशिश सफल होती है ,मन दुविधामुक्त हो जाता है और ईश्वर की कृपा से बिना किसी भय और चिंता के मैं निद्राकाल की ओर प्रस्थान करता हूं।अब मेरा मन आश्वस्त था। अब कोई बात नही थी। मैं अच्छी तरह निद्रा में मग्न हो जाता हूं।

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