JUNE 10th - JULY 10th
1-सहूलियत
15 मार्च , दिन मंगलवार.....
पर मेरे लिये कुछ मंगल न था....आज का दिन भी बाकी दिनों जैसा ही था...
सुबह के कितने बज रहे थे.... ये तो नहीं पता था पर इतना पता था की कुछ देर और लेटा रहा तो गुडमॉर्निंग की जगह मुझे गुड आफ्टरनून बोलना पड़ सकता है...
माताजी कुछ काम कर रहीं थी.... और जितनी तेज उनके हाथ चल रहे थे उससे कहीं तेज उनका मुख...
“ सही कहते है वो... मैंने ही बिगाड़ रखा है... सब मेरे लाड़ प्यार का नतीजा है... कर लेओ मस्ती अभी हमरी राज है तो......... मेहरिया आ जाई तो कुकर उठाकर सर पे पटकी.... जो पड़े राहत हो ना बिस्तरा पर ”
“ कुकर नहीं मम्मी...लात.... लात मारके पलंग से फेकी इनका.....बने लाट साहब जो पड़े हैं...,” “छोटी बहन अपना सब्र का बांध तोड़ते हुए तपाक से बोली ”
उफ्फ्फ ये कांव कांव.. कीच कीच....मेरी नींद में विघ्न पड़ रहा था... मैंने जोर से चादर को कान मुँह से कसके लपेटा ही था की चादर खींच ली गयी...
अब बेड था फिर मै था मेरे उप्पर वस्त्र के नाम पर मात्र एक कच्छा.. जोकि कल ही पिताजी लाये थे... और फिर छत....
तापमान सामान्य था पर मुझे अब सर्दी लग रहीं थी.....
आलस के नाम पर तो पीएचडी कर ही रखी है मैंने... बेड की बेडशीट को ही मैंने पकड़ के कोने से उसमे रोल हो गया जैसे रोल पराठा... और बिना आँखें खोले मैंने फरमाइश पेश की.....
चाय...??
उधर से आवाज़ आयी...
आयं..?
मै फिर बोला....चाय...??
आयं......??
उफ्फ्फ... ये छोटी बहने..... घर में अगर कोई आपका सबसे बड़ा दुश्मन या दोस्त होता है तो वो आपका सिबलिंग... मानो या न मानो ... पर दोस्ती कभी कभी.... दुश्मनी हर पल पूरी सिद्द्त से निभाई जाती है... खैर कॉलेज भी जाना था आज..... सो एक घंटे बाद मै कल्याणपुर में था....
भईया गुरुदेव क्रॉसिंग....”, “ मेरा एक टैक्सी वाले से पूछना हुआ ही था...कि उसकी हाँ से पहले मेरी आँखों ने मुझसे वही रुक जाने की हामी भरवा ली... उसके हाँ बोलते ही मै पलट कर वापस सड़क के किनारे की और बढ़ चला।”
“ अरे भईया क्या हुआ...”
- कुछ नहीं...( मैं धीरे से बुदबुदाया )
आज सुबह ही किराये के लिये मम्मी से 250 रूपये मांगे थे...
और मेरी आँखों के सामने ही एक 12-13 साल का लड़का एक जूते के ढाई रूपये मांग रहा था.... एक जोड़ी जूते के पूरे पांच रुपए....
हम दोनों ने ही माँगा था...... हम दोनों ने ही हाथ फैलाये थे.. मैंने अपनों से माँगा था... उसने गैरों से माँगा था....
मैंने हक जताते हुए माँगा था.... उसने हक का माँगा था..
सुबह उठने पर मेरी आँखों में नींद थी.. उसकी आँखों में
बेचैनी..
मेरे हाथों में ढाई सौ रुपए थे... उसके हाथों में एक जूते के ढाई रुपए...
अब उसकी आँखों में चमक थी..... अब मेरी आँखों में शर्म..................................
सहूलियत आपको कितना कमजोर और जिम्मेदारियां आपको कितना मजबूत बना देती है ये आज मैंने बड़े नजदीक से जाना था......।
2-वैल्यू
5 अप्रैल, दिन मंगलवार
रात के करीब पौने तीन .....
हल्का हल्का सा जुकाम है.... पर अभी फ्रिज से ठंडा लगभग बर्फ जमा हुआ पानी पिया है.... काहे की चाय पीने को नाही मिला हमें.... दूध नहीं था।
अब जब पौने तीन बज रहे थे, तो बताने का कोई तुक बनता ही नहीं की भईया हमें नींद नहीं आ रही है................
हाँ नींद क्यूँ नहीं आ रही है ये विषय उठाया जा सकता है..... पर ये विषय भला कोई काहे ही उठाये.... उसे क्या पड़ी है भई...!
पर मेरा फोन मेरे पास ही पड़ा था.. अब यही तो है जो अकेले होने पर भी अकेले नहीं छोड़ता....
अचानक से गूगल के सर्च इंजन में हमने एक word सर्च किया....‘ value ’
जी हाँ..! वैल्यू.....
और कुछ इस तरह के परिणाम प्राप्त हुए कि -
the amount of money that something is worth
थोड़ा नीचे दृष्टि डाली तो लिखा था -
To value is to attach importance to a thing
सच कहे आपसे....???
अच्छा चलो कह ही देते हैं....., हमको कुछ खासा समझ नहीं आया पढ़के वैल्यू का मतलब...
का है कि बचपने से ही हर चीज महसूस करने के बाद उसे समझने और उसपे अमल करने की आदत रही है....पर साला वैल्यू आजतक कोई महसूस ही नहीं कराया.... हम स्वयं भी खुद को नहीं ......
लोग कहते है समय की वैल्यू को समझो... कब संभलोगे......इधर मै कहता हूँ.... समय मुझे क्यूँ न समझ रहा...???
लोग कहते हैं... देखना एक दिन ये समय हाथ से निकल जायेगा..... इधर मै कहता हूँ.... एक दिन मै भी सबके हाथ से निकल जाऊंगा......।
लोग कहते हैं... तो क्या ही किसी का कुछ ले जाओगे..... इधर मै कहता हूँ..... लेने आया ही कौन था यहाँ..... मै तो देने आया था....
लोग कहते हैं क्या.....???
इधर दबी आवाज में मुँह से निकलता है.....वही जिसका मुझे अहसास नहीं....................................... ....................................“वैल्यू” ।
3- मै और मेरा आलस्य
26 मार्च,दिन शनिवार -
जो लोग मेरे जितने करीब है... वो उतने ही करीब से जानते है की आलस्य और मेरा संबंध ठीक वैसे ही है जैसे गुड़ में मिठास.... न तो कभी गुड़ से मिठास गायब हो सकती है.... ना मेरे शरीर से आलस्य....।
सुबह चाय के प्याले के साथ...... एक मग पानी भी मेरे बिस्तर पर मुझे अर्पित किया जाता है ताकि मै अपना मुँह...,लिहाफ से निकाल कर उस मग में डाल सकूँ....।
और ये सिर्फ घर में ही नहीं होता....
हॉस्टल में होता हूँ तो ये जिम्मेदारी रूम पार्टनर निभाता है जैसे घर में माँ......।
शाम का खाना भी अक्सर अभी भी या तो बहन खिलाती है या माँ ही अपने हाथ से.... और मेरे हाथ..?
मेरे हाथ मेरे फोन ने पकड़ रखा होता है.....
सर्दियों में ही नहीं... गर्मियों में भी कभी कभी एक दिन छोड़ के एक दिन नहाता हूँ....सिर्फ इसलिये की नहाने के लिये पहने हुए कपड़े उतारने होंगे...
पहने हुए कपड़े धुलने होंगे..... और जो कपड़े धुले है उन्हें पहनकर फिर जल्दी से गंदा कर दूंगा... और फिर उन्हें धुलने होंगे......।
हाल में ही मेरे एक मित्र ने मुझे सुझाव दिया था की तू शादी क्यूँ नहीं कर लेता.... तेरे सारे काम होंगे.. अब उन्हें कौन समझाये की उसके लिये भी मुझे उसे लेने जाना पड़ेगा.....कोई खुद से चली आये मै बस इसी इंतजार में हूँ....
चार दिन से कन्नौज की ट्रेन छूट जा रही है..... क्यूंकि मुझसे सुबह सुबह तड़के 5 बजे बिस्तर नहीं छोड़ा जाता.... खैर आज पिताजी खुद मुझे रेलवे स्टेशन तक छोड़ के गये अपनी साइकिल से...,
मेरा बैग और मुझे दोनों को रखकर.....।
समय से कोई काम,आजतक मैंने न किया....चाहें वो स्कूल -कॉलेज जाना रहा हो... जल्दी से तैयार हो किसी से मिलना रहा हो.... या भोजन करना रहा हो.....कोई प्रोजेक्ट या मेरा सबसे प्रिय कार्य ही कहानियाँ -कविता लिखना क्यूँ न रहा हो वगैरह,वगैरह, वगैरह.......।
दिनचर्या मेरी सदैव से अस्त व्यस्त ही रही है..
समय से मेरी कभी नहीं बनी.....इसीलिए समय ने भी मुझे कभी कुछ बनने न दिया.....
अब देख लो ना... सेमेस्टर परीक्षा प्रारम्भ होने का का कल प्रथम दिवस है.... जहाँ बाकी सहपाठियों में टॉप करने की होड़ मची है... मै अभी भी बिस्तर में पड़ा ये लेख लिख रहा....।
वैसे कोई अमूमन लेखन को काम नहीं मानता लेकिन अगर आप मानते है .... ये काम ही तो है.... तो बता दू ये चार लाइने भी मै कल से लिख रहा हूँ...और पता नहीं कितने दिन लग जाये ये छोटा सा काम खत्म करते करते
बाकी कूकर से चार दफा चिल्लाने की आवाज़ आ चुकी है.... अगर बिस्तर से न उठा तो हो सकता है, वह फट जाये.....
और साथ..........ये काहिल इंसान भी ।
समाप्त
अपने बारे में......( मै अनुराग अज्ञानी हिन्दी साहित्य का विद्यार्थी, उत्तरप्रदेश का रहने वाला हूँ और मै स्नातक कर रहा हूँ.... उपरोक्त अंश जो प्रस्तुत किये है मेरी डायरी से है जिसका उद्देश्य सिर्फ अपना लेखन कौशल की जाँच करना है आप सभी सम्माननीय के द्वारा.. भविष्य में आपका स्नेह और साथ रहा तो उपन्यास भी प्रस्तुत करना चाहूँगा.... धन्यवाद!)
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Laxmi
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