JUNE 10th - JULY 10th
मधु ने कराहते हुए आँखें खोली। देखा तो मेघा उनके लिए काढ़ा बना कर ले आई थी। मेघा ने काढ़ा बिस्तर के किनारे पड़ी मेज पर रखा और मधु को हाथ से सहारा देते हुए बिठा दिया। उनका अब खुद के शरीर पर कोई वश नहीं था, सो आटे की बोरी की तरह उठ गईं। मेघा बिस्तर पर बगल में बैठ कर अपने हाथों से धीरे-धीरे काढ़ा पिलाने लगी। कोविड की वजह से मधु की खाने-पीने की इच्छा बिल्कुल खत्म हो चुकी थी और शरीर तो यूं लगता मानो किसी ने ताकत का एक-एक कतरा निचोड़ लिया हो। ऊपर से उम्र का तकाजा। 60 से ऊपर की उम्र। हर एक घूँट के साथ वो ना-नुकुर करती जा रही थीं पर मेघा बातें बना-बना के जबरदस्ती पिलाए जा रही थी।
“ये कमरा अब भी वैसा ही है न! पिछले 6 साल में कुछ नहीं बदला। यहाँ मेरी खटिया पड़ी रहती थी। वहाँ दीवार के पास पढ़ने के लिए मेरी मेज कुर्सी लगी रहती थी जहाँ एक बार मैंने....जहाँ मैंने..“ पाँच दस सेकंड के मौन के बाद अचानक बात बदलते हुए बोली, “मौसी, पता है, कभी-कभी तुम मुझे बिल्कुल मेरे बिट्टू जैसी लगती हो। वो भी खाने में पचासों नखरे करता है। 3 साल का हो गया है मगर इतना ज्यादा शैतान है कि क्या बताऊँ। ‘इतने दिनों से उसके पास नहीं गई न तो पूछता रहता है मम्मी कहाँ रह गईं, कब आओगी? आपने देखा नहीं न मेरे बिट्टू को कभी? आज उसके पापा शाम को लौटेंगे दुकान से, तब विडिओ कॉल कराती हूँ।
काफी मशक्कत और करीब आधे घंटे की मेहनत के बाद कहीं एक कप काढ़ा पिया गया।
मेघा ने मौसी को सहारा दे कर लिटा दिया। मेघा उन्हें खिलाते पिलाते बातें करती रहती है। कमजोरी की वजह से वो बोल नहीं पातीं। बोल पाना उनके लिए सहज क्रिया नहीं रह गई है और शायद बोलने के लिए उनके पास कुछ बचा ही नहीं है। वो धुँधलाती पनीली आँखों से उसे देखने की कोशिश करती रहती है। बुढ़ापे की वजह से उनकी नज़रों ने ठीक से देखना कम कर दिया था पर लोगों को पहचान पाने की समझ उन्हें अभी आ रही थी। उनकी नजरें सामने दीवार पे टंगी तस्वीरों पे जा टँगी जहाँ 8-10 फ्रेम्स में उसके बच्चों और परिवार की फ़ोटोज़ थीं। उनका मन क्रमबद्ध लगे फ्रेम्स के एस्थेटिक को बिगाड़ते हुए साथ लगे हुए उस बेतरतीब से कैलंडर में अटक गया जहाँ से माँ सरस्वती उसकी और देख के मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं, या..... या शायद उसकी नासमझी पर हँस रही थीं। उनकी आँखों की कोरों से दो मोटे-मोटे आँसू बह निकले।
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मेघा मधु की छोटी बहन सुमन की बेटी थी। मधु और सुमन की उम्र में चार साल का अंतर था और बचपन से उनमें गहरा प्रेम रहा था। । बचपन का स्नेह उम्र के साथ और गाढ़ा होता गया। सुमन के तीनों बच्चों का जन्म मधु के घर पर ही हुआ। मम्मी पापा के गुजर जाने के बाद सुमन के लिए यही उसका मायका थी और यही उसके सुख दुःख का ठिकाना। मधु के भी तीन बच्चे थे। एक बेटी, दो बेटे। हँसते खेलते, बच्चों के पीछे भागते समय कैसे गुजरता गया और कब बच्चे बड़े हो पढ़ाई लिखाई के सिलसिले में अलग-अलग ठिकानों पे जा लगे, पता ही नहीं चला। बच्चों के जाने के बाद घर सूना हो गया। पर ममता का सोता तो ऐसे ही नहीं सूख जाया करता न।
सुमन की सबसे छोटी बेटी मेघा, जो उस वक्त दस-बारह साल की रही होगी, उसे मधु ने अपने घर पर बुला लिया। कारण कुछ भी कह सकते हैं। मधु का अकेलापन, ममता की चाह या सुमन की आर्थिक स्थिति। मेघा बचपन से बहुत गंभीर टाइप की रही थी या घर पर माहौल ने उसे समझदार बना दिया था। मधु ने उसे बेटी की तरह रखा और उसने भी मौसी के घर पर बेटी की ही तरह सारी जिम्मेदारियाँ ओढ़ लीं। उसका स्कूल पास के कस्बे में ही था जहाँ से उसके दोनों घर बराबर दूरी पर ही थे इसलिए वो जब जहाँ जरूरत होती उस घर चली जाती। वो मधु के घर करीब 4 साल रही और फिर उनकी बड़ी बेटी के वापस आने पर अपने घर पर चली गई।
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मेघा का स्कूल एक कस्बे में था। संकुचित सोच वाले इस कस्बे में सब एक दूसरे के जीवन में दखल रखते थे। मेघा17 की हो चुकी थी और उसके घरवाले शादी के लिए लड़का ढूँढ रहे थे। अनौपचारिक रूप में तो कई जगह बात चल ही रही थी। पर बारहवीं में स्कूल में उसके साथ पढ़ने वाले लड़के से कब उसकी नजदीकियाँ बढ़ी, कब ये प्यार में बदलीं, उन दोनों को तो बाद में पता चला, पर बाकी दुनिया को पहले मालूम हो गया। उन दोनों में जो अनकहा सा, अनसुलझा सा था, लोगों की नज़रों और बातों ने उसे पुख्ता कर दिया। जिन चीजों को हम जितना दबाते हैं वो उतना ही उभर कर निखरता है। इनका प्रेम भी कुछ यूँही हुआ। लोगों की टोका-टोकी से नज़रों का ये खेल गंभीरता में बदल गया और जल्द ही उन्होंने खेलने कूदने की उम्र में जीने मरने की कसमें खानी शुरू का दीं।
उड़ती हुई खबरें घर तक भी पहुँची। आमना-सामना हुआ। मेघा ने अफवाहों को पुष्ट किया। घरवालों ने समझाया, धमकाया। लड़का अभी स्कूल में था, पारिवारिक स्थिति भी साधारण थी पर सबसे बड़ी बात उनसे नीची जात का था। हालांकि वो लोग खुले विचारों के थे और जात-पाँत में नहीं मानते थे, बस लड़का उनसे ऊंची जात का होना चाहिए। पहले स्कूल बंद हुआ। फिर घर से बाहर निकलना भी। पर न जाने कैसे बातों का आदान प्रदान हो ही जाता था। किसी कॉमन फ्रेंड के जरिए या सड़क और छत पर इशारों से। मोहल्ले वालों ने एक दिन पाकर उस लड़के को पीटा, धमकियाँ भी दी गईं उसके गाँव में जाकर हाथ पैर तोड़ देने की धमकी भी। मगर सब कुछ बेअसर रहा।
वक्त और दूरी प्रेम के रोगियों की अचूक दवा मानी जाती रही है। मधु की बेटी अंजू की शादी भोपाल में हुई थी। जो दूरी के लिहाज से काफी दूर माना गया और मेघा को कुछ वक्त के लिए चुपके से भोपाल भेज दिया गया। इस उम्मीद में कि वहाँ तक पहुँच पाना मुमकिन न होगा। कुछ दिन सब कुछ ठीक रहा फिर भी न जाने कैसे वो लड़का वहाँ भी जा पहुँचा। दोनों फिर भाग निकले पर चूँकि ट्रेन हमेशा की तरह लेट थी तो दोनों स्टेशन पर ही पकड़ लिए गए।
वापस आने के बाद मेघा को एक कमरे में बंद किया गया और आनन-फानन में खोजबीन शुरू की गई। किसी भी दो पैरों पर चलने वाले प्राणी को ढूँढ के शादी की बातें होने लगी। मास्टर दुकान छोड़ के इसी काम में लग गए। सुमन ने सारे रिश्तेदारों का जाल फैलाया और जब तक बात पक्की होती, वो फिर से घर से भाग निकली और गायब हो गई।
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बड़े मुश्किल दिन थे वे। हालांकि सुमन ने गाँव मोहल्ले में बता रखा था कि मेघा फिर से अपनी अंजू दीदी के घर भोपाल गई है और फिर वहीं रह कर आगे की पढ़ाई कर रही है। पर गाँव की कच्ची दीवारें अकसर इन गुप्त योजनाओं का बोझ नहीं उठा पातीं। कोई सामने नहीं कहता था, पर पीठ पीछे यही चर्चा रहती थी कि इनकी बेटी किसी के साथ भाग गई है। ‘लड़की भाग गई’ सिर्फ तीन शब्दों का एक समूह नहीं है अपने आप में पूरा एक कलंक है, असीम विस्तार में फैला शर्म और गुनाह का वो बोझ है जिसके नीचे माँ-बाप पिस के रह जाते हैं।
अब इज्जत बचाने की जुगत भिड़ने लगी। योजनाएं बनने लगीं। हंसिया या फिर दराँती। चूहामार या फिनायल। गंगाजी में कलंक धोया जाए या फिर खेत में दफन किया जाए। कितने लोग लगेंगे। सभी रिश्तेदारों और शुभचिंतकों ने इस पारिवारिक संकट में अपना भरपूर सहयोग देने का वादा किया। चूँकि मधु के यहाँ भी उसने 4 साल बिताए थे तो उसके जीने और मरने का फैसला लेने के हक उन्हे भी था। मधु ने इज्जत की फसल में लगे इस घुन के लिए कीट-नाशक और गाँव से दूर वाला अपना खेत प्रस्तावित किया। जोर शोर से उन्हें ढूँढा गया पर वो दोनों नहीं मिले तो फिर नहीं ही मिले। समय के साथ ये बात भी वक्त की परतों में दब गई।
कुछेक साल पहले पता चला कि शायद वो लोग कानपुर में ही कहीं रहते हैं। मेघा ने किसी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था और उसके पति ने जनरल स्टोर खोल लिया था। उनके एक बच्चा भी था, दो-तीन बरस का। मेघा और उसके पति ने सबसे माफी माँगने और घर वापसी की कोशिश भी की। पर चूँकि वो उनके लिए मर चुकी थी इसलिए घरवालों ने जानते-बूझते अपनी आँखें और घर उनके लिए बंद कर लिया था।
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जब कोविड की दूसरी लहर का कहर टूटा तो जीवन की नश्वरता की सच्चाई मुखर हो लोगों के सामने आई। मधु और उसके पति भी चपेट में आ गए और बिस्तर से जा लगे। बच्चे अपने-अपने परिवार के साथ नौकरी के लिए बाहर रहते थे। हफ्ते भर में जब किसी ने फोन किया तो उन्हें मम्मी पापा की बीमारी के बारे में पता चला। उन्होंने चिंता व्यक्त की और हाल चाल पूछा। हालांकि आधे-अधूरे मन से उन्होंने घर आने की बात कही थी पर मधु के चिंता नहीं करने, उनकी नौकरी, परिवार और आने-जाने में रिस्क के बारे में समझाने और आने से मना करने पर तुरंत मान भी गए थे।
मधु और उसके पति की तबीयत बिगड़ती रही। हालांकि आक्सिजन आदि सब नॉर्मल थी, जान का खतरा नहीं था पर बुखार, बदन दर्द और सरदर्द से उठना बैठना और खाना-पीना तक मुहाल हो रखा था। आसपास वाले यूं तो मदद कर देते थे पर डर तो उनको भी था। बीमारी से अधिक अकेलापन दुखदायी होता है। दर्द को साझा कर सकने वाले अपनों से दूरी का डिप्रेशन अधिक घातक होता है। ऐसे में ही न जाने कहाँ से एक दिन मेघा घर पर आ गई थी और घर का सब काम संभाल लिया था। पूछने पे बताया कि हालांकि आप लोग मेरी हाल खबर नहीं लेते थे पर हम तो लेते ही रहते थे।
मेघा ने घर के काम, दवा, सेवा और खाने पीने का जिम्मा ले लिया था। कुछ ही दिनों में मधु और उसके पति अब ठीक हो चले थे। पर बीमारी से ठीक हो जाने के बाद भी मेघा की निस्वार्थ सेवा और अपने कर्मों के अपराधबोध का बोझ मधु के सीने को जकड़े हुआ था। न जाने कितनी सारी यादें उसके मन को भिगाती जा रही थीं। उसने दीवार से माँ सरस्वती वाला कैलंडर उतार दिया। उसके पीछे कभी दीवार पर मेघा ने चाकू से “मेघा कक्षा 8” गोद रखा था और डाँट पड़ने पर ‘यहाँ मेरी फोटो नहीं थी इसलिए’ का कारण बताया था। मेघा के भागने के बाद मासूमियत भरे वो शब्द उसे बदसूरत लगने लगे थे और इस शर्म और कलंक का दोष ईश्वर पे लगाते हुए उन्हें ही इसे छिपाने की जिम्मेदारी दी गई थी। धुँधलाते हुए उन अक्षरों को हाथ से महसूस करते हुए मधु ने मेघा को आवाज दी।
“मेघा, बेटा जरा यहाँ बैठो। आज कुछ बताना चाहती हूँ”
“अभी? रुको, मौसा जी को खाना दे आयें । फिर खाना ले आते हैं तुम्हारा, फिर बैठ के बतियाते हैं न”
“नहीं अभी आ जाओ। अब और देर बोझ नहीं सह सकती। तुम्हें पता नहीं होगा। पर बेटा मैं तुम्हारी अपराधी हूँ। हालांकि तुम्हारा गुनाह इतना बड़ा नहीं था पर तुम्हारे जाने के बाद तुम्हें मारने की योजनाओं में हम भी शामिल थे। और फिर तुम मेरे लिए..आगे के शब्द कहीं घुट के ही रह गए .. मुझे माफ कर देना बेटा”
मेघा ने मौसी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए आहिस्ता से कहा, ”मैं जानती हूँ मौसी। पर मैं ये भी जानती हूँ कि आपने मुझे अपना परिवार का हिस्सा हूँ। आपने बेटी की तरह प्यार दिया है। आपको जो ठीक लगा वो अपने किया, और मुझे तो ठीक लग रहा है अब वो मैं कर रही हूँ।“
मधु ने मेघा को गले से लगा लिया और दोनों के आँसुओं में सारे गिले शिकवे बह निकले। दीवार में लिखा हुआ ‘मेघा कक्षा 8’ और भी खूबसूरत हो उठा।
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pooooja09
Very touching story.
katiyarsiddharth79
123532abhi
Badhiya
Description in detail *
Thank you for taking the time to report this. Our team will review this and contact you if we need more information.
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