सेतु

editor.ijirse
कथेतर
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"स्टोर रूम की सफाई करती सी ज़िन्दगी में चाय सी स्फूर्ति देने वाले लोग बहुत कम ही मिलते है और आवश्यकता पड़ने पर उनकी उपलब्धता किसी चमत्कारिक घटना से कम नहीं होती ।" बस यही सोचते सोचते निकिता अपनी यादों के गलियारे से बाहर निकलने की नाकाम कोशिश करती हुई सी मशीनी गति से अपने दैनिक कार्य करने में लग गई । जानती थी वो, कि उसके लिए चाय बनाने यहाँ कोई नहीं आएगा ।
"कोई नहीं अपनी संजीवनी में खुद ही हूँ" एक बार फिर से उसने खुद को अहसास दिलाया कि वो जिन्दा है अपने भीतर कहीं ।
तभी बाहर से बारिश की बूँदों की तेज आवाज सुनकर वह लगभग दौड़ती सी बालकनी से कपड़े लेने गई । खुद को ही कोसते हुए बड़बड़ाने लगी "दिमाग भी ना... खराब हो गया है, कुछ याद ही नहीं रहता आजकल । कितनी बार आयरन वर्क्स वाले देबू भैय्या ने काॅल कर कहा कि दीदी शेड बना दूं बालकनी का बारिश में आराम रहेगा । मगर छुट्टी वाले दिन भूल ही जाती हूँ ।"
खैर.... बिना शेड की बालकनी का भी अलग ही आनन्द है । सर्दियों में गुनगुनी धूप सूकून देती है और गर्मियों की शाम चाय के साथ । वाह क्या बात । फिर मॉनसून का आना तो भीगों देता है तन के साथ-साथ मन को भी । भीगने से निकिता को ख्याल आया कि वो भी सूखे कपड़े लाने की जद्दोजहद में पूरी भीग चुकी है । भीतर सोफे पर कपड़ों का ढेर पटक कर वो पुनः बालकनी में लौट आई । गीले बालों को झटकते हुए प्रकृति के इस वरदान से अपनी सूनी सूखी सी ज़िन्दगी को तर करने लगी । तभी अपनी ओर किसी को नीचे रोड़ पर चाय की टपरी के पास से टकटकी लगाए देखते हुए पाया । एक किशोरवय लड़का उसे घूरता हुआ सा प्रतीत हुआ । मगर इसे अपना वहम मान वो भीतर चली गई ।
कालेज के समय से ही अपने आकर्षक व्यक्तित्व के चलते सभी के दिलों की धड़कन रही निकिता आज भी नवयौवना सी पतली कमर और खूबसूरत चेहरे की धनी है । जबकि अपनी उम्र के उनचालिस बसन्त देख चुकी है ।
बारिश के मौसम के चलते अक्सर बालकनी में वह कुर्सी लगाकर बैठ जाती और अपनी पसंदीदा मैग्जीन के पन्ने पलटते मिलती । वहाँ दूसरी ओर वह अजनबी लड़का भी रोज़ बिना नागा किए टपरी पर आता रहता ।
ये बात निकिता को अब खटकने लगी थी । ऐसा नहीं था कि उसके लिए यह पहला अनुभव था, कई जोड़ी नजरें उसके कपड़ों के आर-पार देखने की भरसक कोशिश हर रोज ही करती थी । वैसे भी एक तलाकशुदा महिला पुरूष जाति के लिए 'मौका' ही समझी जाती है । लेकिन उन सबसे बिना उद्वेलित हुए निपटना निकिता भली-भाँति जानती थी । आज बात उसके बेटे की उम्र जितने लड़के की थी, जो ना जाने क्यूँ ऐसा कर रहा था । देखने में तो भले घर का लगता था । शायद बढ़ती उम्र के केमिकल लोचे का प्रभाव हो । यहीं सोच मन में उसे सही रास्ता दिखाने की ठान कर निकिता ने मुस्कुराते हुए उस लड़के की ओर अपना हाथ हिलाया । अचंभित हो लड़का अगल-बगल झांकने लगा अविश्वास से विस्फारित आँखें उसकी और भी अधिक फैल गई जब निकिता ने उसे इशारे से बुलाया । धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए वह अपार्टमेंट के करीब आया तो निकिता चिल्लाते हुए बोली "पागल हो क्या? कब से बारिश में भीग रहे हो । ऊपर आओ ।"

बड़ी ही शालीनता से मुस्कुराते हुए लड़का सीढ़ियाँ चढ़कर निकिता के फ्लैट के बाहर खड़ा था । बेल बजाने को हाथ बढ़ाने से पूर्व ही निकिता ने दरवाजा खोलते हुए तौलिया उसकी और बढ़ा दिया ।
सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए पूछ बैठी - " हाँ तो बेटा तुम्हारा नाम क्या है?"

'अनिकेत'

'क्या?' मेरा मतलब है कि फिर से बताओ ।
"जी, मेरा नाम अनिकेत है"

तेजी से अतीत की ओर लौटी निकिता अपने स्मृतिपटल पर आते जा रहे एक-एक दृश्य को किसी फिल्म की भाँति देख रही थी कि कैसे माता-पिता की ईच्छा के विरूद्ध जाकर उसने अपनी पसंद 'अनिल' से विवाह किया । परन्तु विचारों में विरोधाभासों के चलते वह विवाह बोझ स्वरूप हो गया । समय अपनी गति से बढ़ रहा था, इसी बीच जीवन में नन्हें मेहमान के आने से खुशियों की आहट हुई । सबकुछ भूलाकर उसने और अनिल ने मिलकर बड़े ही प्यार से अपने बेटे का नाम अनिकेत रखा । थोड़े समय तक तो सब ठीक रहा लेकिन अनिल के शक ने फिर से उसके दिमाग में पैर पसारने शुरू कर दिया । हद तो तब हो गई जब उसने निकिता को बदचलन का तमगा दे डाला ।
चूँकि अब प्रश्न स्वाभिमान का था तो निकिता ने इस रिश्ते को यही पर विराम देना तय कर लिया । तलाक के फैसले में अनिकेत की कस्टडी आर्थिक कारण को देखते हुए पिता को दी गई । स्वाभिमानी निकिता ने हरमाह पति द्वारा मिलने वाला गुजारा भत्ता भी अस्वीकार कर दिया । दिल पर पत्थर रख उस शहर से सदा के लिए विदा लेते हुए निकल पड़ी नई राह की ओर.....
मगर आज अचानक से इस बच्चे ने बिसरा चुकी सारी यादें सामने लाकर रख दी ।
बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए निकिता ने पूछा -"कहाँ रहते हो बेटा?"
"जी, मैं यहाँ हॉस्टल में रहता हूँ । वो क्या है ना कि....." बात को बीच में ही रोककर उसने पूछ लिया -"आंटी आप अकेली रहती है?"

"हाँ" संक्षिप्त सा उत्तर देती हुई निकिता बोली ।
"तो आपको अपने परिवार की याद नहीं आती? मेरा मतलब है कि आपका परिवार कहाँ रहता है?"
"तुम्हें क्या करना है जानकर और वैसे भी तुम होते कौन हो?" व्यक्तिगत प्रश्न पूछे जाने पर भी संयत होने का प्रक्रम करते हुए बोली ।
"सेतु"
"सेतु.....क्या कहना चाहते हो तुम? अभी तो तुमने अपना नाम अनिकेत बताया था ना? "
"अब मान भी जाओ ना माँ। पापा आपसे दूर रहकर टूट से गए है और मैं तरस गया हूँ माँ के प्यार को ।मैंने पापा को आपके लिए तड़पते और आपको भी सख्ती के साथ अपने अकेलेपन में भी इस रिश्ते के प्रति ईमानदारी निभाते देखा है ।मुझे लगता है कि इतनी सजा काफ़ी है पापा के लिए । मैं तो बिना अपराध की ही सजा भुगत रहा हूँ अब तक।"

"अनिकेत.....मेरा अनिकेत....."
खुशी के भावातिरेक में धम से सोफे पर बैठती बोली -"बेटा तूने तो मुझे मेरी खोई उम्मीदें लौटा दी बेटा। सच तू सेतु ही बनकर के आया है मेरे और तेरे पिताजी के बीच।"

"मेरा अनिकेत.....मेरा अभिमान.....प्यारा सेतु"।

अब हो रही थी बारिश बाहर बूँदों के रूप में और भीतर स्नेह की । आज तप्त सूखी धरा सी निकिता के जीवन में ये मॉनसून ममता के रूप में उमड़-घुमड़ के आया ।

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