आशिक़ी का भूत

kushwaharavi389
हास्य कथाएं
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अब समाज में न कोई जमींदार रह गया है और न ही कोई किसान महतो जिसके बैल, खेत-खलिहान व घर-द्वार गिरवी पड़े हो किसी दुष्ट जमींदार के हाथों। अब व्यवस्थाएं नये रुप में हैं। सब आजाद हैं। गिरवी कुछ है तो.., विचार। इसी ऊहापोह में हमें समझ ही नहीं आ रहा है हम किसका पक्ष लें, कौन होगा हमारा नायक?
शायद हमारे प्रिय गौरवशाली नायक का अभी तक न मिलना ही प्रेमचन्द का सौभाग्य है जो कालजयी रचनाओं के गौरव शिखर पर शान से विराजमान हैं और हमारे नायकों न होने पर हम पर तरस खा रहे हैं और अपने नायकों पर इतरा रहे हैं।

खैर, जितना जल्दी हो सके आपलोग अपना नायक ढूँढ लें। हमारा नायक तऽ जनता डिग्री कॉलेज के युवा नायक के रुप में बिल्लू भईया मिल ही गये हैं।
इनका असली वाला नाम है बलवीर चौहान। कोई छात्रसंघ का चुनाव नहीं जीते हैं। असल में तीन-चार साल से यहां कवऽनो चुनाव हुआ ही नहीं है। अब काफी धरना-प्रदर्शन के बाद बात बना है चुनाव का पर का फायदा ऊ तो अगले साल होगा ना, बिल्लू भईया का तब तक कॉलेज तऽ ख़त्म हो जावेगा।

वो तो बिल्लू भईया जईसा अच्छा आदमी कवऽन मिलेगा जो अब कॉलेज के अंतिम साल में भी दस लड़कऽन के साथ कॉलेज के गेट पर बड़का पोस्टर में मोटा-मोटा अक्षर में लिखवाये रखे हैं 'आपकी सेवा में हाज़िर' उसके नीचे काला चश्मा पहने फोटो के नीचे 'बलवीर चौहान उर्फ़ बिल्लू भैया उर्फ़ बल्लू भैया' भी लिखवाये हैं।
जी हाँ, कुछ लोग बलवीर भैया को 'बिल्लू भईया' या 'बल्लू भैया' कहकर प्यार से बुला ही लेते हैं।
अरे हाँ प्यार के नाम से एक बात याद आ गया है। ये जो बलवीर भैया हैं ना... अरे बिल्लू भईया, एक बार प्यार की गाड़ी में चढ़े थे पर गाड़ी अब भी वहीं के वहीं है जहवाँ ऊ बईठे थे।

बल्लू भईया के प्रेम-कहानी आगे कुछ बढ़ऽत की कहानी के हीरोइन दीप्ति यादव ही ब्रेक लगाई दीं। बस ब्रेक लगा है दो साल से। जैसे 100% डाटा ख़त्म भईले के बाद भी इंटरनेट चलता है पर कवनों काम के नाहीं रहता है यहाँ भी वहीं स्थिति है।

उस दिन जब बिल्लू भईया..., बिल्लू भईया न होकर बलवीर चौहान ही हुआ करते थे मतलब कॉलेज के शुरुआत में पहले ही दिन के क्लास में मास्टर साहब सबसे नाम व बारहवीं के साथ-साथ इंट्रोडक्शन ले रहे थे। दाहिने तरफ वाली बेंच के दूसरे नम्बर पर बैठे एक लडकी को इशारा करते हुए मास्टर साहब इतना ही बोले,"हाँ जी, तुम!"
"दीप्ति यादव, 82.23%" लड़की ने अपना अन्य सभी की तरह अपना भी इंट्रोडक्शन दे तो दिया पर उसको क्या पता था इस छोटी सी बात का का किसी लड़के पर इतना इम्परेशन पड़ेगा की इंट्रोवर्ट से एक्सट्रोवर्ट हो जायेगा।
अब ई नाहीं मालूम है कि काहे बलबीर चौहान जी और सब लड़किऽयन के बजाय दीप्ति यादव पर ही फिदा हो गये थे। अरे! ईहो तऽ नाहीं मालूम है कि काहे फरीद चाचा पाना खाईके कवनों खाली जगह के बजाय दीवार पर ही कलाकारी देखावत हवऽन और नाहीं तऽ का अब ई कवऽन बतायेगा की कवनों कुत्ता काहे मोटर-गाड़ी आदि सब देख के ओही पे चढ़ावा चढ़ावऽत हवे?

खैर, कॉलेज के दूसरे साल के शुरुआत में बहुत हिम्मत करके बलवीर चौहान तीन-चार बार दीप्ति यादव के बगल से गुजरने के बाद बोल ही दिये,"हाय दीप्ति।"
"हाँ..., बोलो.." दीप्ति थोड़ी अचरज से बोली।

"हम यही कहना चाहते हैं कि.., कि.."

"अरे! क्या कहना चाहते हो?"

"कि.., कि तुमसे प्यार करते हैं।"

"हमसे?" दीप्ति इस बात के लिए तैयार नहीं थी।

"हाँ।"

"हमसे क्यों?" अब तक दीप्ति सम्भल चुकी थी। उसका जी तो हुआ कि बिजली के कहर से टूट पड़े पर बलबीर के चेहरे पर उड़ते हवाइयों को देखकर उसने सोचा क्यों न एक-दो गोते वह भी इसी हवा में लगा लें और इतने ऊपर ले जाकर पटके की आह भी न निकले।

क्यों का जवाब तो नहीं था इसलिए घबराते हुए बलवीर चौहान बोल पड़े "और भी लोग हैं.., मेरा मतलब..., दोस्त, मम्मी-पापा और...!"

"और बस इतना ही। प्यार करना तो कोई बुरी बात नहीं है फिर इतना ही क्यों? तुम्हें तो सबसे प्यार करना चाहिए।"

"हाँ, सबसे करता हूँ, सबसे..." बलवीर हबड़ाते हुए बोला।

"अच्छी बात है, हमें तो यहीं छोटी क्लासों से सिखाया जाता है कि सबको प्रेम-व्यवहार से मिलजुलकर रहना चाहिए।" बलवीर को उसके इस बात का मतलब कुछ समझ न आया वह क्या कहना चाहती है?
दीप्ति ने आगे बोलना जारी रखा "जाओ, और लोगों को भी बताओ कि उनसे भी प्यार करते हो।" इतना कहकर दीप्ति वहाँ से चलती बनी।

बेचारे बलवीर भैया को यह समझ न कि दीप्ति कवऽनों टोंट तऽ उस पर नाहीं मार रही थी।
अगले दिन से जब भी कभी उससे नज़र मिली बलवीर सिहर कर इधर-उधर देखने लगता। देखे भी तो कइसे गर्मी के दोपहर के सूरज को कोई सीधे देख सकता है क्या? लेकिन अब उससे कैसे बात करे? कैसे पता चले की जो उसने कहा था उसका आशय किस तरफ और कहाँ था?

इधर एक दिन कॉलेज में फीस बढ़ाने को लेकर बवाल हुआ और बलवीर चौहान धीरे-धीरे इस बवाल में इतना सक्रीय हुये कि कॉलेज में जो एक-दो नेता बचे थे उसमें इनका भी नाम शुमार होईये गया।
अगर सबकुछ सीधा-सादा होये जात तऽ कवनों नेता का जरुरत रह जात है? अरे! राजनीति तऽ उहे जगह होत है जहाँ कवनों बखेड़ा शुरू होये।
18 रूपया फीस में बढ़े रहै उहो कॉलेज में बढ़िया पानी के ख़ातिर। खैर, फीस कम तो नाहीं हुआ पर बलवीर चौहान के फेसबुक पर मित्र मंडली और फॉलोइंग लिस्ट का विस्तार जरूर होई गया और इस तरह अब बलवीर चौहान कहीं बिल्लू भईया तऽ कहीं बल्लू भईया के नाम से धीरे-धीरे फेमस होना शुरु हो गये।
"अरे! फेसबुक कवऽने काम आयेगा?" यही सोचते हुये अब दो दिन से बिल्लू भईया लगे हैं दीप्ति यादव को सर्च करने में जाने कितने प्रोफ़ाइल खंगाल चुके हैं इस नाम के पर वो है कि मिलती ही नाहीं है।

तभी एक नोटिफिकेशन आया, फ्रेंड रिक्वेस्ट था वो भी किसी खास का था। बिल्लू भईया उँगली ठिरकाते हुए कन्फर्म का बटन दबाये और हल्का सा मुस्काई दिये। उनके मित्र-मंडली में अमन यादव अब जुड़ चुके थे। अरे! ये वहीं अमन यादव हैं जो अभी कॉलेज में नये-नये आये हैं और बिल्लू भईया के जूनियर हैं मगर इन सबसे जो खास बात है कि वो दीप्ति यादव के छोटे भाई हैं यानी बिल्लू भईया के होने वाले साले साहब। अरे छक्का ना सही चौका तऽ लगिये गया है वो भी मार लेंगे इसमें कवऽन बड़का बात है? इहे सोचते हुए बिल्लू भईया अमन यादव के पाँचों-छह: फोटो पर दबा के दिल उछालने के साथ-साथ हैंडसम, अवेसम, एक्सीलेंट, बुय्टीफुल आदि सब कमेंट भी चेप दिये। उधर से भी यही दिल वाला इमोजी और हैंडसम, स्मार्ट, बहुत बढ़िया भईया आदि के कमेंट्स इनके भी फोटो और पोस्ट पर बारिश की तरह झमाझम आ बरसा। धीरे-धीरे बिल्लू भईया और अमन यादव के बीच बातचीत भी होने लगा। रिश्तेदारी ना सही दोस्ती की शुरुआत हो ही गई है तो बाद में रिश्तेदारी भी हो ही जायेगा।

अब तऽ कॉलेज का दूसरा साल समाप्त भी होने को आ गया, बल्लू भईया एक बार फिर हिम्मत किये कुछ तो जवाब आज मिल ही जाये संयोग से दीप्ति यादव को किनारे देख पूछ ही लिये- "उस दिन बताई नहीं तुम हमको?"

"का नहीं बताये?" दीप्ति यादव सीधे बल्लू भईया के चेहरे पर ही नजर गड़ाये बोली।

"हम तुमको बताये थे ना..., हम तुमको प्यार करते हैं?"

"एक बात पूछे बताओगे?"

"क्या?"

"तुमको अपनी इज्जत नहीं प्यारी है का?"

इतना सुनते ही बल्लू भईया आगे कुछ बोल नहीं पाये लेकिन दीप्ति यादव आगे भी बोल पड़ी, " ई दूसरा बार तुमको छोड़ रहे हैं, अगली बार ऐहिसन थपड़ियायेंगे न कि दोबारा मुँह नहीं दिखाओगे कॉलेज में..., समझे गये न?"

अबकि सीधा-सीधा जवाब बिल्लू भईया को मिल गया था। उनको भी समझ आ गया ग़नीमत कहाँ है इसलिए चुपचाप बिना कवनों सरसराहट के वहाँ से सरक गये ठीक वैसे ही जैसे गरीब के जेब से नोट, जैसे मुट्ठी से रेत और जैसे कवऽनों राजनेता साहब हार-जीत के बाद लोग के बीच में से।

बिल्लू भईया अपना ध्यान तो हटा लिये दीप्ति यादव से पर मन तो चला ही जाता था। हाँ, एक बात हुआ कि कभी सामने ना गये उसके। दूसरा साल समाप्त भी हो गया और तीसरा शुरू भी, पढ़ाई में कुछ खास करने को था नहीं कि बिल्लू भईया आन्दोलन चलाई दिये।
दो दिन के अनशन के बाद ई कन्फर्म हो गया कि छात्रसंघ वाला चुनाव होगा पर कब होगा यह किसी को न पता हुआ और 3-4 महीना बाद बात फिर से बिगड़े इससे पहले ही घोषणा हो गया कि अगले साल से छात्रसंघ का चुनाव होगा।

अब कॉलेज के आखिरी साल में बिना कवऽनों धमाका किये गुमनामी में तो हम नहीं जा सकते यह ख़्याल करके बिल्लू भईया और उनकी दस-बारह लोगों की टोली ने डिसाइड किया कुछ नाम किया जाये और बहुत माथापच्ची के बाद सर्वसम्मति बनी की इस बार फरवरी के महीने में प्रकट होने वाले आशिक़ी का भूत भगायेंगे।
इधर फरवरी का महिना का आया आशिक़ अपनी तैयारीयों में लग गये और उधर बिल्लू भईया समेट 25 लोगों की टोली आशिक़ी का भूत भगाने के लिए अपनी गुपचुप तैयारी में लग गये।

सुतली वाला बम फोड़ने से अच्छा है कि तोप का गोला दागा जाये इस अनुमोदन के साथ 14 फरवरी का दिन भी मुकर्रर हो गया।

फरवरी का वैलेंटाइन डे भी आ गया था, बिल्लू भईया और तीन-चार लोग तोप यानी डंडा-हॉकी गाड़ी में छुपाकर जनता डिग्री कॉलेज से एक किमी दूर स्थित 'मिनी लैंड पार्क' में जमीनी तहक़ीकात करने के लिए पहुंच गये थे और बाकी के साथी भी पहुँचने वाले थे।

सबकुछ तय प्लान के मुताबिक होना था। उधर प्रेमी-प्रेमिकाओं का मेला लगना शुरू हुआ और इधर गोला दागने का क्रियान्वयन।
अचानक कुछ लड़के-लड़कियाँ चीखते हुए बिल्लू भईया के बगल से भागे। बिल्लू भईया और उनके चारों साथी डंडा लेकर हरकत में आ गये और भाग रहे लड़के-लड़कियों को आगे से घेरकर खड़े हो गये। पार्क का दोनों गेट बंद किया जा चुका था जहाँ पर चार-चार लोग हाॅकी-डंडा लेकर तैनात थे। अंदर पिटाई शुरू हो चुकी थी।

अधिकतर लड़के-लड़कियों को एक जगह इकट्टा किया जा चुका था और कुछ का होना बाकी था। तभी बिल्लू भईया को उस भागमभाग के बीच वाले हिस्से में कई चेहरों के बीच उन्हें कोई अपना जाना-पहचाना चेहरा भी दिखाई दिया जो भागते हुए उनकी ही तरफ आ रहा था कि अचानक कुछ दूरी पर आकर रुक गया। यह बिल्लू भैया की बहन थी साथ में उसका हाथ पकड़े खड़ा था अमन। उन दोनों को कुछ समझ ही न आया था, अमन की नज़र बिल्लू भैया से मिलते ही वह उनकी बहन का हाथ छोड़ चुका था जो उसी की क्लासमेट भी थी और बिल्लू भईया की छोटी बहन जैसे वह दीप्ति यादव का छोटा भाई था।
अब बिल्लू भईया को उस दिन डेढ़ साल पहले आये अमन यादव के फ्रेंड रिक्वेस्ट का मतलब समझ में आ चुका था।
बल्लू भईया ठगाये से खड़े थे और बुत बने उन दोनों जाने-पहचाने आकृतियों को निहार रहे थे जो जमीन में नज़र छुपाये हुए थे जैसे शुतुरमुर्ग रेत में।
तभी बल्लू भईया के एक साथी की नज़र उन दोनों पर पड़ी और उसे माज़रा समझते देर न लगी उसने अपने दूसरे साथी जो एक लड़के पर हॉकी आजमा रहा था के कान में कुछ बुदबुदाया तो वह दूसरा साथी हॉकी छोड़कर गेट की ओर भागा।
जितना तेजी से वे यह सब भीड़ इकट्टा किये हुवे थे उतना तेजी से वे पॉर्क के गेट को तेजी से खोलकर भीड़ को गायब करके खुद भी वहाँ से गायब हो गये।
अभी कुछ ही आशिकों पर डंडा गिरा था और बहुत तो बच ही गये थे। कम-से-कम दो-तीन घंटे का कार्यक्रम बीच में ही बीस मिनट से भी कम समय में समाप्त करना पड़ा था। उन लड़के-लड़कियों पर से आशिक़ी का भूत भले न उतरा हो पर उनके उतारने वाले हमारे नायक बिल्लू भईया का भूत जरूर उतर गया है।

-रवि कुशवाहा

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