दहेज एक सामाजिक बुराई

आत्मकथा
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आज गुप्ता परिवार की बड़ी बेटी की शादी थी पूरा परिवार खुशियों में डूबा हुआ था एक तरफ़ dj का शोर तो एक तरफ़ मेहमानों की चहलकदमी थी। सगाई में उन्होंने अपनी बेटी के लिए जो बन पड़ा वह दिया। एक मोटर साइकल और 1 लाख नकदी भी दिया। गुप्ता जी ने अपनी हैसियत से बढ़कर ही दहेज दिया था।

सिन्हा साहब की बारात शाम चार बजे उनके दरवाज़े पर पहुँची। सारी विधि विधान के बाद जब दूल्हा दुल्हन मंडप में बैठे तो सिन्हा साहब ने ये कहते हुए शादी रुकवा दी कि हम ये शादी तभी करेंगे जब आप हमें ₹ 2000000 देंगे।

गुप्ता साहब ने तो जो कुछ भी था पहले ही दे दिया था अब फिर 20 लाख रुपए की एक और फरमाइश?

गुप्ता जी ने वह भी स्वीकार कर ली पर कहा कि अभी फिलहाल में उनके पास सिर्फ़ 2 लाख रुपए ही नकद पड़े है बाक़ी की व्यवस्था भी वह कर देंगे, थोड़ी-सी मोहलत दे दीजिए।

सिन्हा साहब नहीं माने और साफ़ बोल दिया कि ₹20 लाख या तो बारात वापस जाएगी।

"बारात वापस ले जाइए सिन्हा साहब" शादी के शोर शराबे के बीच में से आवाज़ आई।

सारे बाराती और घराती की नज़र उसी आवाज़ की ओर थी।

जब सब ने देखा तो एक 23 साल का सुंदर नौजवान बीच में एक कुर्सी पर बैठा हुआ बोला।

गुप्ता जी उस लड़के को चुप कराते हुए एक बार फिर सिन्हा साहब से हांथ जोड़ कर विनती करने लगे कि ये शादी हो जाने दीजिए पर सिन्हा साहब तो टस से मस नहीं हुए।

गुप्ता जी ने अपनी पगड़ी उतारकर सिन्हा साहब के पैरो में रख दी पर फिर भी उनको फ़र्क़ नहीं पड़ा। आखिरकार उस सुंदर नौजवान ने वह पगड़ी उठा कर गुप्ता जी के सिर पर पहना दी।

अंकल जी आप क्यों इनके जैसे घटिया लोगों के सामने अपनी इज़्ज़त कम कर रहे है, ये लोग लड़की देने के लायक ही नहीं है।

सिन्हा साहब गुस्से से तिलमिला गए "अब तो हमे ये शादी करनी ही नहीं है।"

सुंदर नौजवान ने भी उसी भाषा में उत्तर दिया "आपसे घर मैं अपनी शालिनी को भेजूंगा भी नहीं।"

पूरा माहौल एक दम शांत हो गया dj भी पहले ही बंद हो चुका था थोड़ा बहुत जो शोर था वह भी अब नहीं था।

गुप्ता जी ने एक ज़ोर का तमाचा उस नौजवान को मारा "ये लड़के तुम क्या कह रहे हो?" तुम होश में तो हो?

हाँ अंकल मैं सही बोल रहा हूँ मैं शालिनी से और शालिनी मुझसे पिछले चार सालों से प्यार करते है। हम आपसे बात करने के लिए आते उससे पहले ही आपने शालिनी की शादी सिन्हा साहब के बेटे से तय कर दी थी।

हम आपकी इज़्ज़त को खराब नहीं करना चाहते थे तो हमने अलग होने का फ़ैसला कर लिया था! मैं तो यहाँ सिर्फ़ शालिनी का दूल्हा देखने आया था।

अब तो पूरी बारात में काना फूसी चालू हो गई।

सिन्हा साहब को तो मौका मिल गया शादी न करने का, सिन्हा साहब बोले "लो कर लो बात किसी और का झुठन हमे पकड़ा रहे थे गुप्ता जी।"

खोट अपनी बेटी में और दोष दूसरो को दे रहे है।

सिन्हा साहब की बात सुनकर वह नौजवान उठा और सीधा जाकर मंडप में शालिनी के पास जो सिंदूर पड़ा था उसे उठाया और शालिनी की मांग में भर दिया।

शालिनी को समझ ही नहीं आया की क्या हो गया। जब उसने अपनी मांग में हाथ लगाया तो उसके उंगली पर सिंदूर लगा हुए देखा तो बस उसके मुंह से इतना ही निकला "राज ये क्या किया"

जब गुप्ता जी ने ये सब देखा तो गुप्ता जी वहीं ज़मीन पर ही बैठ गए।

तब राज मंडप से बाहर आकर बोला "किसी को और कुछ कहना है?"

ये देखकर सिन्हा साहब ने वहाँ से जाने में ही भलाई समझी।

राज ने पीछे से आवाज़ लगाते हुए कहाँ जा रहे है सिन्हा साहब रुकिए जरा।

सिन्हा साहब रुक गए तो राज उनके पास आया और उनसे कहा " वो जो आपने सगाई में मोटर साइकिल और जो नगद 1 लाख रुपए लिए थे वह लौटाते जाइए।

सिन्हा साहब ने भी लौटाने का वादा किया और वहाँ से भागते हुए निकल गए। सारे बाराती और सारे मेहमान धीरे-धीरे करके जाते रहे। आखिरी में वहाँ बच गए तो सिर्फ़ गुप्ता जी उनकी धर्मपत्नी शालिनी और राज।

गुप्ता जी अपने होश संभालते हुए राज के पास आए और राज से कहा "तुमने शालिनी की ज़िन्दगी बर्बाद कर दी" मैं तुमको कभी माफ़ नहीं करूंगा जाओ चले जाओ तुम दोनों मेरी नज़रों से दूर हो जाओ।

शालिनी रोते हुए आई पापा ये आप क्या कह रहे है?

आज से न मैं तुम्हारा बाप हूँ न तुम मेरी बेटी हो।

शालिनी भी रोते हुए वहाँ से दौड़ कर बाहर की ओर भागी उसके पीछे-पीछे राज भी भागकर गया।

शालिनी नहीं रुकी और सड़क के बीचों बीच भागती ही जा रही थी, राज पीछे से आवाज़ लगाता हुआ शालिनी का पीछा कर रहा था।

शालिनी के सामने की तरफ़ से एक गाड़ी उसकी ओर तेजी से चली आ रही थी तो राज ने शालिनी का हाथ पकड़ कर एक ओर खींच लिया।

"पागल हो गई हो शालिनी तुम" राज ने कहा।

"मुझे मर जाने दो राज मुझे नहीं जीना" मैंने अपने पापा का गुरूर तोड़ दिया। मुझे जीने का कोई हक़ नहीं है।

तभी पीछे से गुप्ता जी भी आ गए जब उन्होंने शालिनी को ऐसे सड़क पर रोते बिलखते हुए देखा तो वह भी रो पड़े! आख़िर गुप्ता जी सबसे ज़्यादा प्यार शालिनी से ही करते थे, वह उसको ऐसे रोते हुए नहीं देख सकते थे।

उठो बेटा उठो और घर चलो जो हो गया सो हो गया।

नहीं पापा मैंने आपका सर झुका दिया है मुझे जीना नहीं है, मैं मर जाना चाहती हूँ।

गुप्ता जी ने जिद्द करके शालिनी और राज को अपने साथ गुप्ता निवास में लेकर आ गए।

और गुप्ता जी ने अब परिस्थितियों से समझौता कर लिया था और राज को अपने दामाद के रूप में स्वीकार कर लिया।

अगले दिन शालिनी विदा होकर राज के साथ राज के घर गई तो राज के पिता विक्रमजीत खन्ना ने उनको घर पर नहीं आने दिया घर की चौखट से ही वापस लौटा दिया ये कहते हुए की मुझे ये रिश्ता मंजूर नहीं है। कहाँ हमारा ख़ानदान और कहाँ इस लड़की का खानदान।

मायूस होकर राज और शालिनी वहाँ से वापस आ गए।

राज और शालिनी दुखी मन से अपने घर से वापस आते है।

शालिनी अब क्या होगा? हम कहाँ जाएंगे?

चिंता मत करो मैं हूँ ना शालिनी, तुमको मूझपर भरोसा नहीं है क्या?

शालिनी बोली "बात भरोसे की नहीं है पर इस मुसीबत में हम कहाँ जाएंगे?"

राज ने कहा "चिंता मत करो हम चांदनी के घर जाएंगे।"

"चांदनी कौन?" वह तो नहीं जो 2nd ईयर में हमारे साथ पढ़ती थी।

"हाँ वही चांदनी" राज ने उत्तर दिया।

पर उसके यहाँ क्यों जाएंगे? उसकी तो शादी हो गई है। उसका पति क्या बोलेगा?

कुछ नहीं बोलेगा वह मेरा अच्छा दोस्त है और चांदनी मेरी बहन जैसी है।

जैसा तुमको ठीक लगे राज।

राज ने चांदनी के पति मिस्टर मुकेश को फ़ोन लगाया।

हैलो मैं राज बोल रहा हूँ।

मिस्टर मुकेश: हाँ जीजाजी सब खैरियत तो है इतने दिन बाद याद किया है।

राज: हाँ सब ठीक है मुकेश जी बस आपकी थोड़ी-सी मदद चाहिए थी।

मिस्टर मुकेश: जी बोलिए।

राज: वह मैंने शादी कर ली है।

मिस्टर मुकेश: क्या? क्या बात कर रहे हो? ये तो ख़ुशी की बात है और हमे बताया भी नहीं और बुलाया भी नहीं। अब हम इतने पराए हो गए है।

राज: अरे पूरी बात तो सुनिए, आप तो बिना बात के हमसे नाराज़ हो रहे हैं।

वो बात ऐसी है कि...

मुकेश जी: आःह्ह ऐसा क्या, फिर अब क्या करना है आगे?

राज: अभी तो एक छत की व्यवस्था करनी है जिसके लिए हमने आपको फ़ोन लगाया है।

मुकेश जी: पहले तो यहाँ आइए! हम फिर बात करते है।

राज: जी।

फिर राज और शालिनी मिस्टर मुकेश और चांदनी के घर पहुँचते है। मुकेश और चांदनी ने राज की पूरी मदद भी की थी।

मुकेश एक बड़ी कम्पनी में मैनेजर की पोस्ट पर था चांदनी उसके अंडर काम करती थी। दोनों में प्यार हुआ और दोनों ने एक साथ रहने का फ़ैसला भी किया।

सब कुछ हसी ख़ुशी चल रहा था। एक साल बाद राज के घर में खुशियों किलकारी गूंजी।

शालिनी ने एक प्यारे से बच्चे को जन्म दिया।

तब चांदनी ने राज से कहा!

चांदनी: राज अपने माता पिता को ये खुशखबरी बता दो।

राज: वह तो मुझसे बात करना ही पसंद नहीं करते, कई बार फ़ोन लगाया है।

चांदनी: बात मत करो पर उनको ये खुशखबरी तो सुना ही सकते हो।

राज: ठीक है चांदनी मैं फ़ोन करूंगा और शालिनी के माता पिता को भी फ़ोन करना है।

और राज ने फ़ोन लगाकर अपने पिता जी से बात की, जैसा कि उसको पहले से ही पता था विक्रमजीत खन्ना ने फ़ोन उठाया।

विक्रमजीत: तुमको कितनी बार बोला है यहाँ फ़ोन मत किया कर। या तो उस लड़की को छोड़ दो या तो हमें भूल जाओ

राज: पिताजी मैं शालिनी को कभी नहीं भूल सकता और आप तो मेरे जन्मदाता है।

विक्रमजीत: हो गया ये बता फ़ोन क्यों किया है।

राज: पिताजी एक खुशखबरी है, आप दादा बन गए है। शालिनी ने एक प्यारे से बच्चे को जन्म दिया है।

विक्रमजीत: क्या?

राज: हाँ पिताजी।

विक्रमजीत खन्ना की तो ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था जब उसने सुना कि वह दादा बन गया है।

विक्रमजीत: राज बेटा तुम सच कह रहे हो? मेरा पोता...मै अभी आ रहा हूँ अपने पोते से मिलने के लिए और फ़ोन रख दिया।

विक्रमजीत खन्ना दौड़ते हुए लता के पास गए।

विक्रमजीत: अजी सुनती हो राज की मां।

लता: जी क्या हुआ?

विक्रमजीत: अभी-अभी राज का फ़ोन आया था, उसने बताया कि हम दादा दादी बन गए है।

लता: अब तो राज को माफ़ कर दीजिए।

विक्रमजीत: वह बाद में अभी चलो पहले हम अपने पोते को घर लेकर आयेगे मेरे ख़ानदान का वारिस आया है।

और फिर राज ने गुप्ता जी को कॉल किया, उनको बताया कि वह नाना बन गए है तो गुप्ता जी भी अपने नाती से मिलने के लिए अपने घर से निकले।

हॉस्पिटल पहुँचकर विक्रमजीत ने जब अपने पोते को गले लगाया तो सब कुछ भूल गया और उसने राज और शालिनी को माफ़ कर दिया। अपने पोते को ही देखते रहे

ये देखकर राज की माँ ने भी अपने पोते को विक्रमजीत के हांथ से-से ले लिया और उसको प्यार करने लगी। तभी वहाँ पर गुप्ता जी और उनकी पत्नी सुलोचना भी पहुँच गए।

विक्रमजीत: गुप्ता जी मुझे माफ़ कर दीजिए, मैं अपने अहंकार में जी रहा था। आपने अपनी बच्ची को अच्छे संस्कार दिए है। आज मुझे नाज़ है अपनी बहू पर।

फिर सब ने अपने गीले शिकवे भुला दिए।

विक्रमजीत: पूरे हॉस्पिटल में मिठाई बटवा दो आज मेरा वारिस आया है।

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