वह ज़ोर की बरसात

ankitsingh2472
बाल साहित्य
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भादवे की बरसात थी। सावन की फुहारें चिढ़ाकर थक गई थीं, तो भादो जीवन बरसाने लगा था। छोटे शहरों में वर्षा और बिजली का रिश्ता "तू आ मैं जाऊं" का था। लेकिन, अभी तो शाम के पांच‌ ही बजे थे। अंधेरा होने में अभी घड़ी की सुइयों के कुछ वर्तन बाकी थे। बालकनी के पास लोहे की बड़ी-सी दीवालनुमा जाली लगी थी। वह उसी के पास कुर्सी डाले बैठा था। सवाई, नाम था उसका। उसके जीवन की चिंताएं वही थीं, जो एक नौ साल के कस्बाई बच्चे की होनी चाहिए। जैसे, "आज बिजली नहीं है, तो स्कूल में दिया गृहकार्य कैसे होगा?"

वह चिंतित था। नहीं भी होता था, तब भी हमेशा चिंतित दिखाई देता था। उसकी विचारधारा तोड़ते हुए माँ बोली, "नहा ले बरसात में। मेह में नहाने से घमोरियां मिट जाती हैं।" लेकिन, उसने बात अनसुनी कर दी।

गंभीर दिखने के अलावा वह सोचने का काम करता था। उस‌ समय सोच रहा था कि ये बरसात सुबह-शाम ही क्यों होती है? दुपहरी में क्यों नहीं? फिर ख़ुद ही सोचने लगा, "नहीं-नहीं, दोपहर में भी तो होती है। कभी-कभी।‌ हाँ! कभी-कभी होती है।" उसे गणित का प्रायिकता वाला पाठ याद आ गया। उसने गुन लिया कि संसार में कुछ भी हर बार नहीं होता। जितने विकल्प उतनी संभावनाएं बनती जाती हैं। हां, संभावनाओं में कमी-बेसी हो सकती है।

सात बजे के करीब उसके पिता घर आए। भाई भी जहां थे, वहां से घर लौट आए। पिता पाक-कला में निपुण थे, तो झटपट पकौड़े तलने बैठ गए। वह वहीं जाली से चिपका रहा। घर के पास की जमीन बरसों से खाली पड़ी थी। झाड-झंकड उग आए थे। वह उसी ओर देखे जा रहा था। थोड़ी दूर एक पीपल का पेड़ था। उससे वह भयाक्रांत रहता था। उसे लगता था पीपल के पेड़ों में आत्माएं रहती हैं। फिर किसी ने बताया कि हर आदमी के शरीर में एक आत्मा रहती है, तो उसके मन में अचरज व्यापा।

तिमिर घिर आया। पर बिजली अब भी नहीं आई थी। परिवार के साथ वह बालकनी के पास बैठा रहा। बाहर रिमझिम चल रही थी। इसी बीच दो पिल्लों के कराहने जैसी आवाज़ आई। कुछ देर सबने अनसुना करने की कोशिश की। फिर से आवाज़ आई। आवाज़ की वेदना इस बार सवाई का हृदय बींध गई। उसने अपने पिता से कहा, "कहीं पिल्ले रो रहे हैं।" पिता ने हामी भरी और चुप हो गए। उसने विनीत भाव से कहा, "देख आते हैं ना?" भाईयों ने समर्थन दिया। पिता ने मुस्कुराकर कहा, "ठीक है।" माँ ने रोकना चाहा कि "कहाँ रात को बारिश में भीगने चल पड़े बाप बेटे? कितना अंधेरा है बाहर।" पर दोनों टॉर्च लेकर बढ़ चले। शीघ्र ही पता पड़ गया कि पास के खाली प्लॉट से आवाज़ आ रही है। देखा तो झाड़ियों में दो छोटे पिल्ले दीख पड़े। उसने टॉर्च जलाकर देखी। एक भूरा और एक चितकबरा पिल्ला। जाने कहाँ से चले आए यहां? ऐसा सोचते हुए उन्हें बाहर निकालकर घर ले आए।

पहली मंज़िल पर घर के दरवाजे तक लाए, फिर रुक गए। सवाई का मन था कि घर के अंदर ले आए पिल्लों को। लेकिन, फिर ठिठक कर रह गया। माँ दूध और रोटी ले आई। पिल्लों को दिया। पिता एक टाट लाए, जिसे बिछाकर पिल्लों को उसके ऊपर बिठा दिया। माँ ने कहा, "ये क्या रात भर यहीं रहेंगे?" लड़के ने कहा, हाँ। माँ ने जवाब दिया, "रात भर में जब सीढियां शौच से भर देंगे तो तू सफ़ाई करेगा?" उसने फिर कहा, हाँ।

वह सफ़ाई नहीं करता। माँ भी जानती थी कि वह सफ़ाई नहीं करेगा। लेकिन, पिल्लों को सीढ़ियों पर रहने की इजाज़त मिल गई। घर के लोग सोने चले गए। सवाई भी गया।‌ लेकिन, उसका मन नहीं माना। छुप-छुपकर फिर सीढ़ियों तक पहुंच गया। उन्हें देखने लगा। उसे लगता था कि किसी क्षण ये दोनों बोल पड़ेंगे। उसे अपने प्रति कृतज्ञता देखने का लालच था या जाने क्या? पर वह उन्हें ताकता रहा। फिर, झपकी आने लगी तो उठकर सोने चला गया।

अगली सुबह से दोनों पिल्ले उसके दोस्त बन गए। उसने अपने जीवन की पहली मित्रता कर ली थी। दो पशुओं से।‌ वह खुश था। उनके साथ खेलता, उन्हें खाना खिलाता। दिन कटते गए। फिर एक दिन पिता ने घर आकर बताया कि पूरा परिवार एक ब्याह में जा रहा है। लड़के को पिल्लों की चिंता हुई। लेकिन, निर्णय उसके हाथ में न था। विदा कहना उसके हाथ में था। वह पिल्लों से विदा कहने गया।

पूरा परिवार सात दिन कस्बे से बाहर रहा। लौटा तो वह सबसे पहले पिल्लों को ढूंढते हुए उनके अड्डे पर गया। वहां न थे। भाईयों ने चिढ़ाते हुए कहा कि मर-वर गए होंगे। लड़का उदास हो गया। भागकर अपने कमरे में घुस गया। रोने लगा। लेकिन, शोक करने से विगत चीजें भला कब लौटती हैं? कुछ दिन बीते। स्कूल से लौटते वक्त उसे अपने घर की सीढ़ियों पर दो पिल्ले दिखाई दिए। एक भूरा और एक चितकबरा। "ये वही हैं। हाँ, ये वही हैं।‌ लेकिन, ये इतने बड़े कैसे हो गए?" उसने सोचा। "क्या पिल्ले इतनी जल्दी बड़े हो सकते हैं?" उसने पिता से पूछने का मन बनाया। पर पूछा नहीं। उसने मान लिया कि ये वही पिल्ले हैं, मान लिया कि पिल्ले आज भी सकुशल हैं, मान लिया कि पिल्ले उसे ही याद करते हुए फिर लौट आए हैं। एक भ्रम का अस्तित्व उसकी प्रसन्नता की शर्त बन चुका था।

-अंकित सिंह राजपुरोहित

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