शेष फिर

वीमेन्स फिक्शन
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शेष फिर

आज सुबह से रीना का अपनी गृहस्ती के किसी कार्य में मन नहीं लग रहा था .उसके विवाह को तीस वर्ष होने को आ गये हैं मगर सुमन की मृत्यु के समाचार ने ,ना जाने कितनी खट्टी मीठी यादों के साथ ,उसे बीते समय की पगडंडी में पहुँचा दिया हैं .

रीना का ननिहाल आना मानों परीकथाओ का सच हो जाना था ,मगर माँ हर साल अपने मायके कहां आ पाती थी .वे चार ,पांच साल में एक चक्कर लगा लेती है ,रीना के लिए तो वो गर्मी की छुट्टियों के दिन , मानों कल्पनाओ के रथ पे सवार होते .ऊँची, नीची पहाडियों पे आडू ,खुबानी, के पेड़ , हिसालू ,किल्मोड़े से लदी झाड़ियाँ ,रंग बिरंगे फूलों से सजे रास्ते ,रीना को पहाड़ी जंगल के भीतर तक खीचं लाते . घर में माँ को बिना बताये भाग कर आ जाती अपनी सहेलियों के साथ . बचपन के दोस्त कब किशोर हो गए पता ही नहीं चला . जब भी नानी के घर आती दो मिनट नहीं होते कि गावं भर से री ना के बचपन के दोस्त जमा हो जाते .

“ तू आ गयी हमने तुझे बस से उतरते ही देख लिया था “ राजू बोला वो गावं के रिश्ते से भले ही मामा लगता हो मगर है तो उसी के बराबर.

“ चल हट झूटे , मैं सबको लेकर आई हूँ ” रानी गर्व से बोली .

“अच्छा सब चलो यहाँ से अभी , ये लोग रेलगाड़ी और ,बस का लम्बा सफ़र कर के आये हैं , कल से खेलने आएगी “ नानी व मौसी सबको भगा देती ,मगर रीना कब चुपके से घर से निकल जाती , ये बात वे कभी जान ही न पायी .

“रुक जाओ ,रुक जाओ मेरी सांस् फूल रही हैं इस खड़ीं चढाई पे ” हांफते हुए रीना चिल्लाई .

“ तुम सब तो ऊपर चोटी में पहुँच जाते हो मिनटों मे ,पीछे मुड़ कर भी नहीं देखते कि मै कहाँ हूँ ?” रीना गुस्सा हो जाती .

“चल छोड़ गुस्सा , बाघ तो नही मिला न अकेले में तुझे ” सुमन मज़ाक करती .

“ उड़ा लो मेरा मजाक, कभी बाघ पीछे से उठा भी लेगा इस जंगल में और तुम आगे ही देखते रहना ”

“ तुम भी कितनी डरपोक हो रीना , बाघ भी सन्नाटे में आता है , इतने हल्ले गुल्ले में नहीं .चल

री शहर की छोरी ,तुझे असली पानी दिखाते हैं ” सुमन चिड़ाते हुए बोली.

वाकई बहुत खुबसूरत नज़ारा था . उपर पहाड़ी से गिरता बर्फ़ीले पानी का दूधिया झरना ,पत्थरों की प्राकर्तिक ओट ने मानों नारी लज्ज़ा को ढापने का बीड़ा भी खुद ही उठा लिया हो .

“यहाँ आदमी भी नहाते है क्या “ ?

“नहीं वे थोडा नीचे उतर के खुला चबूतरा है न ,उसमे नहाते हैं. तू बेफिक्र हो कर नहा, यहाँ सिर्फ औरते ही आएगी”

पानी के नीचे सिर लगाते ही ,एक चीख निकल गयी रीना की “ मर गयी इत्ता ठंडा पानी ”

“ मर मत रीना ,उपर से धूप भी तो है “ .

“ हाँ sss अब मज़ा आ रहा है, अब तो इसमें से बाहर आने का मन भी नही कर रहा हैं सुमन ” “ मैंने कहा था न कि असली पानी क्या होता है यही आकर , पता चलता हैं ”

“ सच सुमन तू मुझे कितने अनोखे अनुभव कराती है ”

“तू क्या ये याद रखेगी रीना? ” सुमन पूछती.

एक दिन ,एक नये प्रस्ताव के साथ सुमन हाजिर थी “रीना ताल मे चलेगी मछली पकड़ने”

पहाड़ियों की गोद में अंडाकार तालाब ,जिसके चारों तरफ लगे वृक्ष की परछाई पूरे तालाब को हरियाले रंग में रंग रही थी .वहां पूरी किशोर मण्डली जमा थी. उसे देख सबकी बाछे खिल गयी , लड़कपन की उम्र में, हर लड़का अपने को तीसमारखां ही समझ रहा था .हर कोई अपने तरीके से मछली पकड़ना सिखाने लगा . किसी ने काँटा लगाना सिखाया तो किसी ने उसे छोटी मछलियाँ भेंट में पालने के लिये दी मगर वे दूसरे ही दिन मर कर उलट गयी .

“रीना कल नावं में बैठकर ताल घूमेगे चलोगी न” सुमन ने पूछा .

“ हाँ कितने रूपये लगेंगे ”

“कुछ भी नहीं , प्रकाश अपनी नाव लायेगा और खुद ही चला लेगा , तैयार रहना . दो बजे मै आऊँगी और हम तीनो घूमेगे “.

“मै भी चलाऊ चप्पू ” रीना नाव में बैठ कर, प्रकाश से बोली .

“ मेरे साथ तुम भी पकड़ लो इसे ” प्रकाश ने रीना का हाथ खींच कर, अपने हाथों मे दबा दिया .एक झुरझुरी सी पूरे बदन मे दौड़ गयी रीना के . नीचे पारदर्शी पानी ताल का ,दोपहर का सन्नाटा ,दूर किनारे से एक्का दुक्का गुजरते हुए लोग ,ताल की ठण्डी हवाए , प्रकाश के हाथों का गर्म स्पर्श ,ताल मे तैरती , अठखेलियाँ करती मछलियाँ ,एक अलग ही दुनियाँ में आ गयी थी रीना .

“नीचे उतरोगी भी या नाव में ही रहने का इरादा हैं ” प्रकाश और सुमन हँस रहे थे और रीना लज्जा से गड़ी जा रही थी . दूसरे दिन एकांत में उसने सुमन को, खूब खरी खोटी सुनाई “ ये तुम दोनों की मिलीभगत थी न ”

“ हाँ ” सुमन हँसहँस कर दुहरी हो गयी “वो कह रहा है कि बड़े होकर तुझसे ही विवाह करेगा ”

“ चुप बद्तमीज़ कोई सुन लेगा ,आइंदा से मैं तेरे साथ कही नहीं जाऊँगी ”

रीना बरसों बाद ,एक बार फिर से माँ के साथ ननिहाल आई थी . जवानी की देहलीज़ पे खड़ी रीना के आस पास की दुनिया बदल गयी थी .उसकी सहेली गीता की शादी राजू से हो गयी थी. वो अब उसकी मामी बन गयी थी . कई विदा हो चुकी थी कुछ की तैयारी चल रही थी.सुमन अपनी पढ़ाई छोड़ के घर बैठ गयी थी .इस बार कोई भी रीना से मिलने, नानी के घर नहीं पहुँचा तो वो स्वम् ही सुमन के घर चल दी . पत्थर की ढलुआ छत के नीचे , मिटटी से लिपे पुते आँगन के एक कोने में बैठीं सुमन को ,उसके आने का पता ही न चला |

“ ओ री सुम्मी क्या पढ़ रही है चोरी चोरी ”

“कुछ भी तो नहीं ” अचानक रीना को सामने देख हडबडा कर, सुमन ने कॉपी छुपा दी .

“ ऐसा क्या है इसमें? मैं भी तो देखूं ,कही प्रेमपत्र तो नहीं ?”

“ तुझे कैसे पता चला ? ”

“ ओह हो ” रीना खिलखिला पड़ी .

“ ‘चोर की दाड़ी में तिनका’, मेरी भोली सहेली , पढ़ाई लिखाई तो कब की छोड़ दी तूने , अब यहाँ कोने में घुस कर कौन से कॉम्पीटिशन की तैयारी हो रही है. मै सब जानती हूँ ”

“ उजज्या s s s ” एक लम्बी सासं ले के सुमन ने कहा “ कितनी तेज हो गयी है तू ”

“हाँ जी कॉलेज जाती हूँ .नर्सरी क़ी बच्ची नहीं हूँ ,चल दिखा न क्या लिखा है इसमें ” झक सफ़ेद कागज़ पे मानों नीले मोती बिखरे हुए थे .

“ इतनी सुंदर हैण्डराइटिंग होगी तेरी ! मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती ” रीना ने आश्चर्यचकित होकर कहा .

”ओ तू रहने ही दे रीना, मेरा मजाक क्यों बना रही हैं ”

“ नहीं रे ,मैं सच्ची में कह रही हूँ सुमन ,अब बता ये पत्र किसे लिखा जा रहा हैं ”

“ तू ठहरी अन्तर्यामी , रीना तुझसे क्या छिपा हैं? यहाँ ताल के किनारे एक बी . टी. सी. ट्रेनिंग सेण्टर खुला हैं ,उसमें दूर दूर से लोग आते है ” सुमन की बात काटते हुए रीना बीच में ही बोल पड़ी “ और ट्रेनिंग पूरी करके चले भी तो जाते हैं उनके चक्कर मे कहाँ पड़ गयी तू ? ”

“ वो ऐसा नहीं है . अपनी पोस्टिंग लेने के बाद आयेगा,मेरे बौज्जू (पिता जी )से बात करने ”

“ अरे फुर्र्र हो जायेगा एक दिन सुमन ,तू करती रहना इन्तजार ,पता हैं ? हमारे लखनऊ में एक पागल घूमता रहता है चौराहे–चौराहे पे बडबडाते हुए कि ‘वो आएगी ,वो आएगी’. सब हँसते है उसे देख कर , मुझे तो बड़ी दया आती हैं ”

“तू तो रहने ही दे रीना, तेरी तो बचपन से आदत है क़िस्से बना कर सुनाने की ”

“ तू मत मान सुमन मुझे क्या , पर एक बार मुझे भी दिखा अपने राजकुमार की सूरत ”

“ तो अभी चल ,शाम तो हो ही गयी हैं , वो होस्टल में वापिस आ गया होगा ”

हॉस्टल क्या था बस पेड़ो से घिरी दोमंजिला ईमारत थी , जिसकी छत ढलावदार टिन की चद्दरों से बनी थी . पूरा अहाता , चारो तरफ से आडू ,खुबानी ,अखरोट और पुलम के पेड़ो से घिरा हुआ था . सुमन ने एक अखरोट हॉस्टल की छत पे उछाल कर, रीना व खुद को पेड़ो के झुटपुटे में छुपा लिया .थोड़ी देर में होस्ट्ल से निकल कर एक नवयुवक उनकी तरफ आने लगा .रीना की डर से धड़कने बढ़ गयी.

“क्या ये ही है वो सुमन ?”

“तू चुपचाप छिपी रह, मैं मिल कर आती हूँ ” सुमन तेजी से निकल कर उस ओर चल पड़ी. वे दोनों पेड़ो की आड़ मे हाथों में हाथ डाले ,मनुहार करते रहे फिर एक दूसरे को पत्रों का आदान प्रदान कर लौट गये . रीना को ये सब फ़िल्मी दृश्य लग रहा था, साथ ही पकड़े जाने पर, होने वाली बदनामी का डर अलग सता रहा था .लेकिन उस पर किसी की नजर पड़ चुकी थी .

अगले दिन जब रीना की नानी की छत, पर अखरोट गिरने लगे तो नानी भले ही आश्चर्य में पड़ गयी थी मगर रीना की सिट्टी –पिट्टी गुम हो गयी. डर से दिन भर बाहर नहीं आई . दो तीन दिन जब ऐसा ही हुआ तो एक दिन नानी ने आँगन में खड़े होकर , अज्ञात को जी भर कर गालियां दी . तब जाकर शान्ति हुई . अब तो रीना की हिम्मत ही न हो कि वो हमेशा की तरह ,जंगलो में ,ताल के किनारे या फिर फलों के बगीचों में घूमती फिरे .

समय कब किसके लिए रुका है . बरसों बाद अपने दोनों बेटो और पति के संग नैनीताल को जाते हुए उसने ,गाड़ी ननिहाल की तरफ यह कहकर मुड़वा दी .

“ प्लीज मेरी खातिर, एक रात मामा के घर रुक जाते हैं. नानी तो अब रही नहीं मगर मामी से पूरे गावं का हाल चाल लेने का ,मेरा बड़ा मन हो रहा हैं”

“ सुमन के क्या हाल है मामी ?”

“बड़े बुरे हाल हैं उसके , अभी दो महीने पहिले ही किसी उम्रदराज से शादी हुई हैं ,इतनी गनीमत समझ कि बच्चे नहीं हैं पहली से ”

“ पर इतनी लेट शादी क्यूँ ?”

“पता नहीं किसका इंतज़ार करती रही अब तक , आखिर में यहीं होना था”

वापसी में उसे, सुमन के उलटे सीधे ख्याल आते रहे .

रीना तक सुमन की ख़बरे छन छन कर पहुँच ही जाती .उसके पति , बच्चे , घर गृहस्ती के सुखद समाचार सुन खुश हो जाती . फिर अचानक पता चला कि उसका पति चल बसा तो वो अपने मायके दो छोटे बच्चों की ऊँगली थाम कर लौट आई हैं . उसके मायके में भी बस भाई भाभी ही थे .उन्होंने पास की फैक्ट्री मे काम पर लगा दिया .इधर तीन चार सालों मे सुमन ने किसी तरह अपने आप को नई परिस्तिथि के अनुकूल ढालना शुरू कर दिया था . रीना ने कई बार सुमन से मिलने का सोचा पर अपनी घर -गृहस्ती के चलते संभव न हो पाया .

आज सुमन की रोड दुर्घटना में हुई मृत्यु का समाचार सुन , रीना को सुबह से ना जाने कितने ख्याल आये और चले गए . पहाड़ के छोटे से गावं की सड़क में , पैदल चलती महिला का, रोड एक्सीडेंट बहुत बड़ी दुर्घटना थी .बेचारी अपनी जिन्दगी के उधेड़बुन में ऐसी उलझी कि सामने से आ रही गाड़ी की चपेट मे वो कब आ गयी ,न वो खुद समझ पाई और न दूसरे ही .

बचपन की कहानी में “ दोनों मर गए ,खत्म कहानी ” कह कर समापन हो जाता था . पर सुमन की कहानी का क्या ? उसके बच्चों का क्या ? सुमन से जुडी अनगिनत यादो का क्या ? किसका कहा पे समापन करूँ . क्या कहूँ “शेष फिर ”

==दीपा पाण्डेय

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