वापसी

वीमेन्स फिक्शन
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सिगरेट का कश भरकर एक जोरदार किक उसने पास रखे स्टूल पर दे मारी, "ओवर कॉन्फीडेन्ट" माय फुट और दर्द से तड़पती वहीं ज़मीन पर बैठ गयी। आँखों में धीरे-धीरे कुछ पिघलने लगा।


बॉस की तल्खी ,सहकर्मियों की हँसी, चुभती निगाहें और माँ का शक करना की वो कहीं,'लेस्बियन तो नहीं।'
काश होती! कम से कम एक चॉइस तो होती। ऐसा नहीं है कि लड़कों से परेशानी है पर कोई ऐसा मिले तो सही जो मन तक पहुंचे। ज़रा दोस्ती बढ़ते ही ये सीधा जिस्म की फिराक में क्यूँ रहते हैं?


उसने एक लम्बी सांस भरी। कमरे में फैला धूंआ उसके सीने में भर गया। उसने नज़रें उठाई तो खिड़की में से एक खुबसूरत नज़ारा दिखा। आधा चांद और उसके पास एक छोटा सा सितारा। लगा जैसे दोनों गुफ्तगू कर रहे हैं। नहीं! शायद दोनों चुप हैं। चुपचाप बस एक दूजे के साथ।
कितना सुदंर और सुकून भरा साथ। वो टैरेस पर जाने को मचल उठी। उसने सिगरेट बुझाई और टैरेस की तरफ कदम बढ़ाए ही थे कि डोर बैल बज उठी।
"ओह नो!इस वक्त नहीं!"
दरवाजा खोलते ही सौम्या आंटी बोलने लगी, "क्या बात है गुल! तुम्हारी माँ बड़ी परेशान हो रही थी। एक फोन कर लेती तो वे इतनी चिंता न करती।"
"......."
"कल रात भी गायब थी तुम और उससे पहले की दो रातों में, तुम्हारे कमरे की लाईट चलती रही।" बोलते हुए उन्होंने पूरे कमरे का जायजा ले लिया।
"जी आंटी, बस कॉल ही करने वाली थी कि आप आ गयी"
"और! सब ठीक। कुछ चाहिए तुम्हें? किसी चीज की जरूरत हो तो...।"
" नो! "
वे जितनी तेजी से आई थी उतनी ही तेजी से चली भी गयी। शायद सीधा सपाट जवाब सुनने की वे आदी नहीं थी।
" माँ भी ना!"फोन कान पर लगा कर वो सीढ़ियों पर चढ़ने लगी।
"गुल! तुम कहाँ गायब रहती हो। एक फोन करने में कितना समय लगता है? चल क्या रहा है वहाँ पर? क्या है तुम्हारे मन में? भरोसा करके भेजा था दूसरे शहर।कब बाज आओगी तुम?"
" माँ! आपको बताया तो था.... माँ! मैं परेशान हूँ ।ऑफिस की... ।"
"ऑफिस... ऑफिस... ऑफिस ।हमने कहाँ था जाने को? तुम घर आ जाओ। इस वीकेंड मैं तुम्हें घर पर देखना चाहती हूँ बस। "
"माँ! प्लीज़... ।"
फोन कट जाता है। टैरेस पर खूले आसमान के नीचे वो अकेली खड़ी है। टूटी और बेज़ार। आसमान बादलों से घिरने लगा है। जिस चांद को देखकर वो मचली थी वो बादलों में गुम हो चुका है और वो सितारा कब का डूब चुका है। वो टैरेस के हर कोने पर खड़े होकर चांद को तलाशती है लेकिन चांद कही नहीं दिखता। हताश लाचार फिर से कमरे में आती है और ज़मीन पर गश खाकर गिर जाती है।
अगली सुबह एक किरण उसकी आँखों पर थपकियाँ देती सी उसे उठा रही थी कि तभी एक जोर का खांसी का दौरा उसे पूरी तरह जगा देता है। वो आईने के सामने खड़े होकर खुद को निहारती है। पपड़ी दार काले होंठ, बिखरे बाल, आँखों के नीचे काले धब्बे! वो घबरा कर मुंह फेर लेती है।
नहा कर कॉफी का मग हाथ में लिए वो बालकनी में आती है तो एक चिड़िया काली और चमकदार नीले पंखों वाली बालकनी की रेलिंग पर आकर बैठ जाती है और इधर-उधर देखने लगती है। थोड़ी - थोड़ी देर में उसका सिर घुमा कर चोंच हिलाना गुल को आनंदित कर देता है। वो भीतर जाती है और एक कटोरे में पानी भर लाती है। छिप कर इंतज़ार करती है पर वो चिड़िया फिर नहीं लौटती। लेकिन वो लौट आती है अपनी असल दुनिया में और इस दुनिया की कड़वाहट उसकी कॉफी के जायके को कसैला कर देती है।उसे मीठी कॉफी पसंद है पर हर बार अपनी पसंद का ही हो ये मुमकिन नहीं होता। हम समझौते करते हैं हर बार अपनी चाहत और अपनी हकीकत के बीच झूलते हुए।
एनीमेशन के फील्ड में नाम कमाना चाहती थी।इसलिए घर वालों से मिन्नतें कर के पुने युनिवर्सिटी में दाखिला लिया था। फिर तुरंत ही दिल्ली की नामी एनीमेशन कंपनी में जॉब ऑफर हुआ तो जॉब मिलने से ज्यादा खुशी अनुभवी लोगों का साथ पाने और उनसे सीखने की थी। घर वालों को नाराज़ कर के जॉब जॉइन किया। कुछ समय तक सब ठीक ही रहा लेकिन फिर सभी के चेहरों पर चढ़े नकाब उतरने लगे। बस मन धीरे-धीरे अपनी खोल में गुम रहने लगा। एक डर हर समय सीने में खटकता रहता आगे क्या? न वापसी की गुंजाइश और न कोई सुनने समझने वाला। एक माँ का आसरा था लेकिन जिन परिस्थितियों में उन्होंने जितना और जैसा साथ दिया वो काफी था। इससे अधिक की उनसे उम्मीद रखना खुद के साथ फरेब करने जैसा था।

"गुल! वेयर आर यूँ?"
"जस्ट ऑन द वे सर!"
"आर यूँ आउट ऑफ द माइंड! प्रजेंटेशन प्रीपेयर हुआ या नहीं?"
"या! डन सर! डॉन्ट वरी। जस्ट...।"

फोन कट गया।
एक गंदी सी गाली गले तक आकर अटक गयी। अपने आप को शांत कर एक मुखौटा उसने ओढ़ लिया। "यस सर", "यस मैम", "ओह सॉरी" बोलते हुए रोबोट का मुखौटा।
मशीनों के आदी होते-होते न जाने कब हम रोबोट बन गये। सुबह के अलार्म क्लॉक से लेकर देर रात तक मोबाइल और लैपटॉप पर अंगुलियां चलाते एक रोबोट। हमारी भावनाएं और एहसास भी रोबोटिक हो चले हैं। प्यार भी मशीन सा परवान चढ़ता है और उतना ही तेजी से सब कुछ ख़त्म। फिर नयी मशीन की तरह पार्टनर भी नया आ जाता है ज़िदंगी में।
आकाश भी इसी तरह आया था उसकी ज़िदंगी में एक खामोश लम्हें सा और तूफ़ान के बीचोंबीच छोड़ कर आगे बढ़ गया था।
गुल का पहला प्रेम और उसका चौथा, पांचवा या शायद न जाने कौनसा प्रेम। जानती थी, अच्छे से कि ठहरेगा नहीं। वो बहती नदी सा चंचल था बंध कर सड़ने वाले दलदल सा नहीं। वो बह गया और मैं वही रूकी रही।
बहुत समझाया उसने और मदद भी की मुझे इस सब से बाहर लाने में पर कभी-कभी कुछ घाव बहुत लंबा समय लेते हैं भरने में।दवा, परवाह, माकूल माहौल सब कुछ तो होता है पर ये जिद्दी घाव।
"मैम यही है आपका ऑफिस? "
कैब ड्राइवर को पैसे चुका कर ऑफिस काउन्टर पर पहुंची ही थी कि मिस माथुर ने कहाँ,
"गुल! कितनी देर कर दी तुमने! कहाँ जा रही हो?"
"अंदर। प्रजेंटेशन देना है मुझे।"
"यार वो!मोना का प्रजेंटेशन चल रहा है अंदर। किसी को भी अलाउ नहीं है"
"हाँ! ओके ।पर मेरा भी प्रजेंटेशन है।"
"था। अब सर ने मना किया है।" उसकी तिरछी मुस्कान चुभ गयी।
"पर क्यूँ... अच्छा! ओके!पर... एक मिनट। ये पुरा कॉन्सेप्ट मेरा था तो मोना कैसे...? ये तो सिर्फ सर के साथ डिस्कस किया था... मतलब...मतलब... हद है यार.... ।"
" इतना क्या सोच रही हो? यहाँ रोज़ का है। तुम अपना लैपटॉप यहीं छोड़ दो। कल दूसरा लैपटॉप तुम्हें दे दिया जाएगा साथ ही नया प्रोजेक्ट भी और हाँ, एटलीस्ट डोन्ट बी ओवर कॉन्फीडेंट दिस टाइम। "
एक तमाचा! हाँ, उस आधे ढ़के शरीर वाली मिस माथुर को मारने को उसका हाथ मचला पर वो ज़रा सा मुस्कुरा कर वहाँ से हट गयी।
वो क्या है जो हमें पूरा करता है? पैसा? काम? सपने? ख्वाहिशें या प्रेम? रिशतें? नहीं! शायद इनमें से कुछ नहीं। हमारा स्व। वहीं है जो हमें अधूरा रखता है और वही है जो हमें पूरा कर सकता है।
बिल्डिंग की लिफ्ट खुलते ही वो ख्यालों से बाहर आई। कमरे में बसी उकताहट और बासीपन उसके भीतर भरने लगा। आज उसने बहुत बहुत दिनों बाद अपने को इतना खाली पाया कि टेबल पर जमीं धूल, टेबल क्लॉथ पर लगा कॉफी का दाग और पर्दो से लगे जाले भी साफ नज़र आने लगे। फोन की स्क्रीन चमकी तो दिखा उसकी स्क्रीन पर भी दरारें है।
वहाँ की घुटन से घबरा कर वो टैरेस पर चली गयी। आज भी बादलों से ढ़का था आसमान। तन बहुत थका था और मन उससे कहीं ज्यादा बस बेसुध सा। कोई है जिससे वो बात कर सकें। ऐसा कोई जो उसे समझे! बिना जज किये, बिना कोई सवाल पूछे बस एक बार सुन लें। काश वो चांद होता! या वो सितारा! या वो... टप - टप आँखों के बादल बरसने लगे। वो वहीं ज़मीन पर लेट गयी। उसने आसमान को निहारते हुए फोन कान से लगाया। उधर से एक चिंता और प्रेम में डूबी आवाज़ आई, "गुल बेटा! आज तुने फोन किया? क्या बात है? बड़ी देर से मन हो रहा था तुझे फोन करूं पर फिर लगा तुम नाराज़ हो जाओगी। तू ठीक तो है?"
"हाँ!... माँ!" कितनी मुश्किल हुई थी उसे अपने हालात छिपाने में।
"माँ हूँ तेरी।कितना छिपाएगी?"
बस वो चुपचाप बेआवाज़ रोती रही।
"गुल! तुम आना चाहती हो। मैं जानती हूँ। मेरा मन जानता है। तुम आ जाओ। कोई एक भी सवाल नहीं करेगा तुझसे और शादी का भी कोई दबाव नहीं। बस आ जा।" माँ की आवाज़ रूंधने लगी थी।
"आती हूँ माँ! कल शाम की टिकट करवा रही हूँ। तुम्हारी गोदी में सिर रखकर सोते हुए सितारों को निहारना है माँ! और वो तेरे हाथ की बाजरे की रोटी और राब, जी भर कर खानी हैं। "
वो देखती है आसमान से बादल छंट रहे हैं और चांद की रोशनी धीरे-धीरे फैल रही है। इधर दो खिलखिलाहट बेआवाज़ बारिशों में भीगी गूँज रही है..।

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