हक

मिथक
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आखिरकार वैभव अक्षरा की बात मान ही गया। आज तीन साल बाद वह हमेशा के लिए भारत लौट रहा था। वैभव करीब तीन साल से अमेरिका की एक अच्छी कंपनी में बतौर सोफ्टवेयर इंजिनियर के पद पर काम कर रहा था। अक्षरा हमेशा से यही चाहती थी कि वैभव भारत में रहकर ही जॉब करे, पर वैभव हमेशा उसकी बात को टाल देता था। वैभव कई बार उसको समझा चुका था कि जितना पैसा और खुलापन उसको विदेश में रहकर मिल सकता है वह बात भारत में रहकर संभव नहीं हो सकती। साल में सिर्फ एक महीने के लिए ही वह भारत आता था। यह बात अक्षरा को सुई की तरह चुभती थी। हर एक दिन वैभव के बिना काटना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया था। यह लॉन्ग डिस्टेेंस रिलेशनशिप कुछ हद तक तन्हाई में बदल रहा था। यह वही वैभव था जिसने अक्षरा के घरवालों से लड़कर उसके साथ कोर्ट में शादी कर ली थी। एक साल तक वैभव भारत में रहकर जाॅब कर रहा था। उन दोनों की परफेक्ट शादीशुदा जिंदगी से हर कोई जलता था। शादी के एक साल बाद वैभव को अमेरिका जाना पड़ गया और अक्षरा के जीवन में सूनापन छा गया। दिल्ली के एक अकाउंटिंग फर्म में काम करते हुए वह अपना समय काट रही थी। हर दिन वह इसी आशा में जी रही थी कि एक दिन हमेशा के लिए उन दोनों के बीच की यह दूरियां खत्म हो जाएगी। मुश्किल भरी इस घड़ी में उसके साथ सिर्फ दो लोग खड़े थे। एक था वैभव का छोटा भाई रितेश और दूसरे वैभव के ही पापा थे। पर रितेश के साथ उसकी ट्यूनिंग बहुत अच्छी बैठ गई थी। उसको रितेश के रूप में एक अच्छा दोस्त और छोटा भाई मिल गया था। रितेश अपनी भाभी को कई बार ऐसे दुखी देखकर मजाक भरे अंदाज में कहता था कि एक बच्चा उनके सूनेपन को दूर कर देगा। अक्षरा भी उसकी कही बात को सही मानती थी, पर फिर भी इस मामले पर शांत ही रहती थी। वैभव ने अक्षरा से यह वादा कर रखा था कि लाइफ में सब सेटल हो जाने के बाद ही वह बच्चे के बारे में सोचेंगे। "अक्षरा, वैभव आ गया।" अक्षरा की मम्मी खुशी से झूमते हुए बोली। अक्षरा अतीत से सीधा वर्तमान में लौट आई। आखिरकार वह दिन आ ही गया था जब वह दोनों हमेशा के लिए एक होने वाले थे। आज का दिन बहुत ज्यादा खास था। पहला यह कि वैभव हमेशा के लिए भारत लौट आया था और दूसरा यह कि आज उनकी शादी को चार साल हो गए थे इसलिए यह तय किया गया था कि आज फिर से उन दोनों की शादी बड़ी धूमधाम से हो। जब पहली बार वैभव और अक्षरा ने शादी की थी तब अक्षरा के परिवार से कोई भी नहीं आया था। पर आज सब इस आयोजन से खुश थे।

वैभव सूटकेस लेकर अपने कमरे में पहुंचा तो उसने देखा कि कमरा बहुत ही सुंदर तरीके से सजाया गया था। अक्षरा भी पीछे पीछे कमरे में दाखिल हो गई। "सजावट कैसी लगी तुम्हें?" अक्षरा ने वैभव को कसकर गले लगाते हुए बोला। "हम्म, डेकोरेशन बहुत सुंदर है।" वैभव का उत्तर बड़ा ही रूखा सा था। "वैभव, तुम इतना परेशान क्यों हो? क्या तुम्हें भारत लौटने की खुशी नहीं है?" "बात यह नहीं है, अक्षरा। दरअसल…" वैभव बोलते बोलते बीच में ही रूक गया। उसकी चुप्पी देखकर अक्षरा यह समझ गई कि आखिर बात क्या थी। "मुझे पता है कि आठ महीने पहले रितेश को खोना हम सभी के लिए सबसे बड़ा घाटा था। मैं यह भी जानती हूं कि एक रितेश ही था जिसने हर घड़ी में मेरा साथ दिया। उसको इस दिन का बेसब्री से इंतजार था। पर इस ज़ालिम समय ने सब कुछ तहस नहस कर दिया।" वह उदासी भरी आवाज में बोली। वह दोनों रोने लगे। अचानक ही दरवाजे पर किसी की दस्तक ने उन दोनों को सचेत कर दिया। "ओहो, दीदी आप यहां हो? मैं कितनी देर से आपको ढूंढ रही हूं। आपको अभी तक ब्यूटी पार्लर भी तो जाना है। चलो, हम चलते हैं।" अक्षरा की छोटी बहन बोली।


आखिरकार वह रात आ ही गई। शादी का कार्यक्रम कुछ ही समय बाद शुरू होने वाला था। अक्षरा सुंदर से गुलाबी जोड़े में बहुत फब रही थी। वह आईने में अपने इस रूप को देखकर बहुत ही प्रफुल्लित हो रही थी। और होती भी क्यो नहीं? आखिर पहले उनकी कोर्ट मैरिज जो हुई थी। ऐसे रंग मे उसने स्वंय को पहली बार देखा था। वह सोचने लगी की आखिर दूल्हे के भेष मे वैभव कैसा लग रहा होगा? यही सोचकर वह वैभव के कमरे की ओर चली गई। वहां पहुँचकर उसने देखा उसका कमरा खुला पड़ा है। वह जल्दी से अंदर घुस गई। कमरे में दाखिल होते ही उसकी नजर वैभव पर पड़ी जो वहां आईने के पास बैठा था। कमरे मे किसी की आहट पाकर भी वैभव ने कोई हलचल नहीं की। "यह क्या, तुम अभी तक तैयार नही हुए?" वह थोड़ा चौंक- सा गया। "अक्षरा, आप यहां पर?" उसके स्वर में मानो कुछ घबराहट सी थी। "अरे, ऐसे चौंक क्यों गए?" "वह… मैं…" "क्या हुआ, कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम जानबूझकर देरी कर रहे हो जैसे शादी टल जाए?" यूं कहकर वह जोर से हंस दी। "हां।" धीमें स्वर में उत्तर आया। उसकी खिलखिलाहट धीमी पड़ गई। "हां- हां, बहुत हुआ तुम्हारा मज़ाक। अब जल्दी से तैयार हो जाओ। समय निकला जा रहा है।" वैभव तेज आवाज में बोला, "यह शादी नहीं हो पाएगी!" अक्षरा कांपती आवाज में बोली," "तुम यह क्या कह रहे हो? सारी तैयारी हो चुकी, और तुम कह रहे हो की… क्यों?" "क्योंकि,मैं रितेश हूं!" इस पर वह चिढ़ते बोली, "मजाक बंद करो ,वैभव।" "यह मजाक नहीं है!" अक्षरा का सिर घुमने लगा। "हां, मैं रितेश हूं। उस एक्सीडेंट में मैं नहीं, बल्कि भैया पूरे हुए थे। भैया का हमशक्ल होने की वजह से मुझे यह सब करने का आदेश मिला था। आपका और हमारा परिवार काफी मंथन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा, ताकि आप हकीकत जानकर टूट ना जाए, और किसी नन्हें की जिंदगी बिखर ना जाए। भाभी, मुझे माफ करना की मैंने आप से यह बात छिपाकर रखी।" अक्षरा की आंखों से नदियाँ बहने लगी। आखिर क्यों भगवान ने वैभव के जीवन की लौ बुझा दी थी? क्या उसके दीप रूपी ह्रदय में प्रेम का तेल कम पड़ गया था? आखिर क्यों? वह जोर- जोर से रोने लगी। रितेश बोला,"भाभी, संभालिए अपने-आप को।" "कैसे संभालू? कितना प्यार करते थे हम एक दूसरे से…तो फिर ऐसा क्यों हुआ?" वह सिसकती हुई बोली। "देखिए अक्षरा भाभी, मैं जानता हूं कि आप भईया से कितना प्यार करती थी, पर…" वह अचानक ही कहते- कहते रूक गया। "पर क्या? हमारा सफर अधूरा रह गया और बच्चा भी…" वह फिर से फफक पड़ी। "नहीं, मेरे कहने का मतलब यह नहीं था। वो दरअसल…" अक्षरा ने उत्सुक नज़रों से देखा। "क्या आप जानती हो कि भाई यहां आने के लिए अचानक क्यों तैयार हो गए?" इन वाक्यों से अक्षरा उलझन में पड़ गई। "मैं समझी नहीं।" "बात यह है की… भाई ने अचानक यहां आने का प्लान इसलिए बनाया क्योंकि… उनका उनकी गर्लफ्रेंड से ब्रेक-अप हो गया था।" अक्षरा को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसे चक्कर आने लगे तो रितेश ने उसे संभाला। "भाभी, आप ठीक तो हो ना?" "हां" "और…और मैंने कुछ मिनट पहले आपको बताया था ना नन्हें के जीवन के बारे में..." "हां.. तो… क्या वह..?" "हां, आपने सही समझा। उन दोनो की एक बेटी भी है।" मानो अक्षरा पर दुखों का बादल फट गया हो। "ब्रेकअप के चलते वह बच्ची को भी अपने साथ इंडिया लेकर आ रहे थे। दुर्भाग्यवश प्लेन क्रैश में भैया मारे गए पर उनकी बेटी बच गई। फिर…" "बस, बस। अब और नहीं सुना जाता। अब सब खत्म हो चुका है। अब मेरा किसी पर हक नहीं रहा।" "किसने कहा? भैया के चले जाने से आपका इस घर पर हक खत्म नहीं हुआ है, और ना कभी होगा। हम सब पर हक के साथ-साथ एक और जने पर आपका हक बढ़ गया है।" "मैं…समझी नहीं।" "उस दो साल की बच्ची को मां की बहुत जरूरत है। जो कुछ भी हुआ उसमें उस मासूम की कोई गलती नहीं है। मैं चाहता हूं कि एक मां को मातृत्व का सुख मिल जाए और बच्चे को मां का प्यार मिल जाए।" यह सब सुनते ही अक्षरा फफक फफक कर रोने लगी। रितेश ने यह घोषणा करके इस बात पर मुहर लगा दी थी कि अक्षरा का हक आज भी उतना ही बरकरार था जितना पहले था।

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