JUNE 10th - JULY 10th
कुमाऊँ क्षेत्र में बसा विशालकोट गाँव अपने नैसर्गिक सौंदर्य के लिए जाना जाता रहा था.. गाँव अब तक हर बाहरी दखल अंदाज़ी से अछूता था.. पर इस बार, ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क बनना लगभग तय था.. हालांकि प्रशासन कितना भी सुनियोजित ढंग से काम करना चाहे, ऐसी हर योजना किसी न किसी के जीवन में झंझावात पैदा कर ही देती है.. इस बार उस बूढ़ी महिला की बारी थी..
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पूरा गाँव भगवती देवी को हमेशा से सौम्य दृष्टि और प्रसन्नचित्त रहने वाली महिला की तरह जानता था.. गाँव में जो इक्का-दुक्का बड़े बुजुर्ग बचे थे वे भी धर्मानन्द और भगवती के फेरों और सप्तपदी की स्मृतियाँ दोहराते कभी नहीं थकते.. कैसे उतने रूढ़ समय में धर्मानन्द ने भगवती को सबके सामने कह दिया था कि "भगवती, आज से तुम मेरी ध्रुव हुई, ईश्वर ने तुम्हें मेरा लिए ही बनाया है.."
"इस अग्नि को साक्षी मानकर तुमसे वादा है मेरा मैं और तुम साथ साथ बूढ़े होंगे, मेरे जीवन के सौ शरद तुमको प्रेम करते हुए बीतेंगे.."
क्या ही प्रतिबद्ध व्यक्ति था धर्मानन्द!
पर पति के गुज़र जाने के बाद एकदम ही बदल चुकी थी...
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"ए ताई! तू तो ऐसी न थी.. क्यों जिद्द कर रही है? दे दे ज़मीन, ले ले पैसे। दूसरी जगह हमलोग बनवा देंगे तेरी झोपड़ी।" दाड़िम के पेड़ के नीचे बैठे मन्नु ने कहा..
"मन्नु तू ऐसी दिल जलाने वाली बात तू मुझसे न कर हाँ.. जा अपना काम कर, मुझे यहीं पड़ा रहने दे।"
"अरे तू समझती क्यों नहीं ताई! सड़क आने से गाँव का विकास होगा। घर आने वालों की गाड़ी घर के मुँह पर लगेगी। भैया लोग जल्दी-जल्दी गाँव आएंगे न तब।"
"मैं नासमझ ही ठीक हूँ मन्नु! मुझे न समझा। खूब देखा है मैंने सड़कों का विकास। यह सड़क हमारे बच्चों को बाहर ले जाने के लिए गाँव आती है, फिर इन सड़कों से लौट कर कोई गाँव की ओर नहीं आता। मैंने कह दिया है कि मैं अपना घर नहीं छोडूंगी, तो नहीं छोडूंगी। जब तक हूँ सारे शरद यहीं, इसी घर में देखूँगी, उनसे वादा किया था.."
"तुझसे बात करना ही बेकार है ताई। तू जाने और ठेकेदार जाने, हमने तो दे दी अपनी झोपड़ी। यहाँ कौन सा ख़ज़ाना गड़ा है जो अड़े रहें..."
"हाँ जा! मुझे परेशान न कर..."
मन्नु चला गया! बुढ़िया बड़बड़ाती रही। ख़ज़ाना... ख़ज़ाना क्या रुपये पैसे का ही होता है? मैं क्या बताऊँ कि क्या ख़ज़ाना गड़ा है मेरे घर में! जब मेरी सन्तान ही नहीं समझ पाई तो दुनिया खाक समझेगी...
घर की जीवटता भी उसमें रहने वाले लोगों से ही बनी रहती है। बदलते समय ने मनुष्य जीवन को इतना रुक्ष बना छोड़ा है कि एक सम्वेदनशील व्यक्ति कोई बात कहे तो समाज उसे अतिभावुकतापूर्ण बयान समझकर खारिज कर देता है..
घर की बाबत यह तो केवल भगवती ही समझती थी कि "इदं चित्ताय न मम्" , चित्त का है मेरा नहीं..
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पूरे गाँव में केवल छः सात घर ही बचे थे जिनमें अब तक ताला नहीं लटका था। उनमें से एक था भगवती देवी का घर। एक बूढ़ी महिला के लिए अपने घर में अकेले रहने से बड़ा दु:स्वप्न क्या हो सकता है.. जिस सुमंगली वधू के आने के बाद ससुराल फूला फला उस भगवती में अब नीचे नौहौ से पानी लाने और दो मील से अनाज लाने तक की ऊर्जा नहीं बची थी..
आज जाने क्या सोच कर दीवार से जाले हटाने लगी बुढ़िया! दीवार पर टंगी तस्वीर को मक्खियों ने काला कर दिया था। अनायास ही उतार कर उसे आँचल से पोंछने लगी। भरीपूरी तस्वीर! निर्मल, निशांत, उनके पिता और माँ... तब बच्चे सचमुच बच्चे थे और भगवती जवान! दिन कितनी जल्दी बीत जाते हैं...
निशांत के जन्म के साल ही बना था यह घर। चहकते फिरते थे उनके पिता। चहके भी क्यों नहीं, पहाड़ में घर पक्का कर लेना कभी भी कोई छोटा काम नहीं रहा। घर बहुत मुश्किल से बनते हैं.. चार मील दूर से अपने कांधे पर लकड़ियाँ और पत्थर ढोए थे उन्होंने! खिड़कियों के लिए लोहा खरीदने पहली बार दिल्ली गए थे...
और छत? सारे गहने खत्म हुए तब पड़ी यह छत! सास ने तीन पीढ़ियों के गहने दिए थे, सब खत्म हो गए थे इसी में... इजा का दिया गुलूबंद, चेनपट्टी, हसुली, माँगटीका सब तो चला गया था... और मन्नु कह रहा है कि कौन सा खज़ाना गड़ा है! अब कौन समझाए उसे?
एक आयु के बाद विगत जीवन की मधुर स्मृतियाँ ही मनुष्य की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति होती हैं। भगवती का इस घर में कौन सा खज़ाना दबा था, यह केवल वही जानती थी।
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खाने का मन नहीं था आज भगवती का! वैसे अपने घर मे अकेली रहने वाली किसी बूढ़ी स्त्री के लिए खाने का मन नहीं होने का अर्थ वस्तुतः 'खाना बनाने का मन नहीं होना' होता है। एक दिन नहीं खाने से कोई मर तो नहीं जाता! और मर भी गई तो कौन रोने के लिए बैठा है...
दस साल हुए जब काम की तलाश में निर्मल पहाड़ों से नीचे उतरा था। बुजुर्ग यूँ ही नहीं कहते थे कि एक बार जिसकी प्रतिष्ठा उतर गई फिर दोबारा नहीं चढ़ती। यह बात पहाड़ियों के लिए भी उतनी ही सही है। निर्मल भी कहाँ चढ़ सका फिर! खुद उतरा, फिर पत्नी को उतार ले गया। छोटे भाई ने राह देख ली थी, सो एक दिन वह भी उतर गया। ताश के पत्तों का खेल ही तो है जीवन, एक पत्ता सरक जाय तो सब सरक ही जाते हैं। यहाँ बस बुढ़िया बच गयी थी..
यह घर धर्मानन्द के साथ बिताए समय के संस्मरणों और भगवती के हठ पर ही तो टिका था..
पर मूर्ख नहीं थी वह। जानती थी कि सरकार जो चाहे वह कर लेती है। सरकार के मन में बस गया कि इस पहाड़ी के पास बाँध बनवा ही लेना है, तो फिर हजार घर उजाड़ने पड़ें तो भी नहीं रुकती वह। सरकार तो फिर सरकार है, उसके आगे जनता की क्या औकात? गत तीन वर्षों में यह तीसरा अवसर था जब जेसीबी गाँव तक पहुँची थी..
बुढ़िया मन ही मन प्रार्थना करती थी कि सड़क का काम बस दो चार साल और रुक जाए।
ऐसा नहीं था कि निर्मल या निशांत गाँव नहीं आते! पर्व त्योहारों में यदा कदा आ ही जाते.. जेठ बैसाख के मेले बच्चों को दिखाने कोई न कोई आता ही है उनमें से! पर... पर अतिथियों की तरह आना भी कोई आना है। मेहमानों से घर थोड़े ही बनता है, घर बनता है उसमें हमेशा रहने वालों से।
भगवती अब कभी-कभी सोचती है, काश! उसे एक बेटी भी हुई होती।
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यहाँ मन्नु आ कर फिर समझा गया है कि घर छोड़ना ही होगा ताई! यूँ भी सड़क का काम उसके घर तक आ कर रुका हुआ था।
मन्नु बता रहा था कि "हम न चाहें तब भी ठेकेदार घर को हटवा ही देगा, उसके पास सरकारी आदेश हैं.. हम खुद से सामान हटा लें तो.. वरना कुछ नहीं बचेगा ताई!"
बुढ़िया ने एक बार सोचा भी कि हटा लें, अब क्या ही हठ करना, पर...
तभी प्रधान जी ठेकेदार और दो चार लोगों के साथ वहाँ आए।
"पै लाग भौजी, स्वास्थ्य ठीक है?"
धोती को सिर पर टिकाते हुए भगवती ने कहा "सब ठीक है बिशनदत्त, बस जाने ये कैसा संकट आया है मेरे सिर पर जो इस उम्र में मुझे मेरा घर छोड़ने को मजबूर कर रहे हो तुम.."
"भौजी, क्यों तुम जिद्द पर अड़ी हो! अभी निर्मल होता तो कभी मना नहीं करता, मेरी बात हुई तो थी उससे.. तब तक ददा की पुरानी कुड़ी में रह लेना.. बाकी लोग भी तो कर ही रहे हैं सहयोग.."
"बाकी लोग क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं मै नहीं जानती बिशनदत्त और तुमने कैसे सोच लिया कि निर्मल मना नहीं करता.. मन्नु, लगा ज़रा नीलू को फोन, मुझे उससे बात करनी है.."
भगवती बोली "जब इस घर में रह-खा मैं रही हूँ तो इसे तोड़ देने की मंजूरी देने का अधिकार निर्मल का कैसे हो गया?"
मन्नु ने नम्बर लगाकर फोन ताई को दे दिया..
दूसरी ओर से निर्मल की आवाज़ आई, "हैलो, हाँ मन्नु बता!"
भगवती ने इधर से जवाब दिया "ओ रे नीलू"
"इजा नमस्कार! सब ठीक.. के हाल हैं रई?"
"कुछ ठीक नहीं है नीलू, ये बिशन चाचा घर आए हैं, रोड के लिए घर खाली करने को कह रहे हैं.. तेरी कोई बात हुई थी क्या इनसे?"
"अरे हाँ इजा, बिशन चा ने फोन किया था, मन्नु तेरी मदद कर देगा, तू सामान पुरानी कुड़ी में रखवा दे.. मैं आऊँगा तब देखते हैं आगे क्या करना है.."
"ऐसे कैसे तूने हाँ कर दी?" भगवती गुस्से में बोली और फोन काट दिया...
"बिशनदत्त, तुम चाहे जितना ज़ोर लगा लो, मैं ये घर खाली नहीं करूँगी.."
प्रधान जी चाह कर भी वे भगवती देवी को कुछ न कह पाए और चुपचाप चले गये..
सबके चले जाने के बाद बुढ़िया यूँ ही पड़ी रही। मन ठीक नहीं था, सो रात को भी बिना खाये सो गई।
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अकेलेपन का आदी हो चुका मानुस फिक्र को भी देर तक अपने पास नहीं रहने देता। पिछला दिन बिना खाये निकला था, सो भूख भी लगी ही थी। भोर में ही उठ भगवती पानी लाई, बर्तन धोए, लकड़ी जलाई और चूल्हा चढ़ा दिया। घण्टेभर में सभी काम निबटा कर उसने सोचा मन बदलने के लिए थोड़ा बाखली तक घूम आऊँ।
जैसे ही सीढ़ियाँ उतरने लगी तो देखा, दूर से जेसीबी मशीन ले कर ठेकेदार चला आ रहा है। इतना तो वह समझ ही रही थी कि ठेकेदार घर तोड़ने पर आ गया तो उसके रोके न रुकेगा। रात को प्रधान जी चेता ही गये थे।
उसने सोचा, क्यों न भाग जाऊं कहीं! घर में ताला लगा देखेगा तो वापस लौट ही जायेगा। बिना मुझे बताए तो घर नहीं ही तोड़ देगा कोई... भगवती झट से अंदर गयी और ताला ले कर निकली। और घर में बाहर से ताला लगा दिया।
फिर सोचा, बाखली जाऊंगी तो सब ढूंढ ही लेंगे। कोई नहीं तो यह मन्नु ही पकड़ लाएगा। क्यों न घर में ही छिप जाऊँ...
कुछ सोचने के बाद वह घर के पिछवाड़े गयी और पीछे के रास्ते से अंदर आ कर बिस्तर में घुस गई। मन ही मन कहा- "अब ढूँढते रहो गाँवभर में नीलू की इजा को!"
कुछ ही देर में ठेकेदार जेसीबी के साथ पहुँच गया! देखा तो घर में ताला लगा है। उसे खबर थी कि घर मे केवल एक बुढ़िया ही रहती है। तब तक अगल बगल के दो चार लोग और आ गए थे। ठेकेदार ने उन्हें सुना कर कहा, "सरकार पैसा दे ही देगी। गिरा देते हैं घर... भगवती देवी रहतीं तो गिराने नहीं देती, बेहतर है कि अभी यहाँ नहीं हैं।"
जेसीबी आगे बढ़ी, छत पर एक दबाव बना और घर भरभरा कर गिरा। चादर में मुँह छिपा कर लेटी भगवती के माथे पर लकड़ी और पत्थर गिरे तो वह चीख पड़ी... बाहर खड़े लोगों ने चीख सुनी तो दौड़ कर आगे बढ़े। जेसीबी को पीछे हटा लिया गया। चार लोगों ने मिलकर लकड़ियाँ हटाईं तो देखा, बुढ़िया का सिर खून से सन गया है, और तसली की गर्म दाल के छींटों से चादर!
धर्मानन्द का गढ़ा घर शायद इस प्रतीक्षा में ही था कि उसकी प्यारी भागुली मरे तो विधिवत् वह भी मर जाए। वह तो भगवती के लिए ही अब तक खड़ा था और उस की मृत्यु के साथ ही वह भी ढह गया..
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फिर! फिर क्या? कुछ भी तो नहीं! मन्नु ने बेटों को खबर की.. उनके आने के बाद भगवती का दाह संस्कार किया गया। अंजाने में हुई गलती कहकर ठेकेदार ने हाथ खड़े कर दिए। गाँववालों के समझाया सो दोनों बेटों ने पुलिस कार्यवाही नहीं की। भगवती का घर तो ढह गया पर उसका मलबा उठा लेने की हिम्मत आज तक किसी की न हुई। बेटों की भी नहीं.. पर निर्मल के कहने पर एक छोटा सा मन्दिर ठीक उस जगह पर स्थापित कर दिया गया ताकी जब भी उनका गाँव आना जाना हो दीया बत्ती करने की सुविधा रहे।
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हाँ, रोड प्लान में थोड़ा बदलाव कर गाँव में पक्की सड़क ज़रूर बन गयी है, एकदम चमाचम! और मन्नु भी अब दिल्ली चला गया है। उसके घर में भी अब केवल उसकी इजा रहती है।
और विकास के बहाने लोगों के घरों का उजड़ने-बसने का खेल यूँ ही हमेशा चलता रहेगा...
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bromohit280
bksahu871
ritu.tyagi108
पहाड़ी जीवन का यथार्थ दर्शाती बहुत अच्छी कहानी
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