ट्रेन टू बचपन

deeptimittal403
हास्य कथाएं
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पंकज मिश्रा ने सुबह-सुबह सहारनपुर से दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी और विंडो सीट पकड़कर इत्मिनान से बैठ गया। सामने की बर्थ खाली थी। दिल उम्मीद से भर गया। क्या हुआ जो उम्र 30 पार हो चली, ब्याह हुए चार बरस गुज़र गये...पुरानी आदतें कहाँ आसानी से छूटती हैं? मौका, माहौल देख कर ख़ुद-ब-ख़ुद बाहर निकल पड़ती हैं। जैसे ट्रेन में बैठते ही आदतन पंकज मिश्रा के भीतर से ये प्रार्थना पूरे भाव से फूटी, ‘हे भगवान! सामने वाली बर्थ पर कोई ढ़ंग की सवारी भेज दियो, सफ़र का लुत्फ़ आ जाएगा।’ ढ़ंग की सवारी तो आप समझ ही गए होगें, अब इतने नासमझ भी नहीं।

अगले स्टेशन, रूड़की पर ट्रेन रूकी तो वे बड़ी उम्मीद लगाये नई चढ़ी सवारियों को देखने लगा। मगर उम्मीद पर तब पानी फिर गया जब एक थुलथुले महाशय और उनके 4-5 साल के चुन्नु-मुन्नु खिड़की पर बैठने की हाय तौबा मचाते हुए सामनेवाली बर्थ पर विराजमान हो गये।

‘लो भई, आज तो बस खिड़की से पेड़ गिनने पड़ेंगे’ मन में सोच उन्होंने खिड़की की ओर मुंडी घुमाई ही थी कि कानों में रस घोलती छम, छम की मधुर झंकार पड़ी। वो चुन्नु-मुन्नु की अम्मॉ थी। बच्चों को ट्रेन में बैठने की तमीज़ सिखाती, शौहर को ढ़ंग से सामान जमाने की तालीम देती एक तेज़तर्रार, सख़्त मिज़ाज मोहतरमा।

पंकज मिश्रा को जैसे ही उनके नूरानी चेहरे का दीदार हुआ, दिल में तेज़ बिज़लियाँ कड़क उठी! करेंट खाया दिल उछाले मार मुँह को आ गया! ‘अरे ये तो वही है! ऊदबिलाऊ की मौसी! दुमकटी बिल्ली! यानि नकुड़ वाली रजनी त्यागी! मेरी पहली बीवी!’

पंकज मिश्रा के लबों पर मुस्कुराहट और आँखों में चमक दौड़ गई। शातिर नज़रें रजनी त्यागी का ऐक्सरे मशीन की तरह मुआयना करने लगी। बदन थोड़ा...नहीं नहीं, काफी भर गया है। लंबा सपाट चेहरा गोभी के फूल सा खिल गया है। मगर आँखें... काजल में डूबी बड़ी-बड़ी आँखों में तेवर वहीं हैं...कसम से, आज भी उतनी ही जहरी दिख रही है...

ट्रेन हल्के-हल्के हिचकौले खाती खेत-खलिहानों से गुज़र रही थी और रजनी को देख पंकज मिश्रा का चंचल मन उन्नीस साल पहले के ‘बालोदय विद्यालय, नकुड़’ के ग्राउंड में चक्कर लगाने लगा था, जहाँ होली के अगले दिन की भोजनवेला में सातवीं में पढ़ने वाले तीन पक्के दोस्त अरूण चौहान, अमित बंसल और पंकज मिश्रा गहन विचार-विमर्श में व्यस्त थे।

समस्या बड़ी संगीन थी। हुआ यूं था कि, कल होली की शाम उसी स्कूल की एक लड़की रजनी त्यागी ने पंकज मिश्रा को साईकिल चलाते हुए बीच पगडंडी थाम लिया और दावा किया, वह अब उसकी पत्नि है। क्योंकि कल होली पर उन दोनों का ब्याह हो गया। बतौर सबूत उसने अपनी सिंदुर यानि लाल गुलाल भरी माँग भी दिखाई जो उसके अनुसार पंकज मिश्रा ने ही भरी थी।

“ऐसा कैसे कह दिया उस दुमकटी बिल्ली ने?, ब्याह ऐसे नी हुआ करते। बैंड-बाजा बजता है, दावत-शावत होती है, बारातियों-घरातियों में दस तरह के लड़ाई-झगड़े होते हैं, तब जाकर ब्याह होता है।” अमित बंसल बोला।

“पर वो तो कहती है, मांग भरते ही ब्याह हो जाता है, सात जनमों वाला।” पंकज मिश्रा का लिपा-पुता नीला, जामुनी चेहरा खौफ़ज़दा था।

“हाँ यार! मेरी मम्मी भी कहती है, हम तो प्रदीप की बहू को माँग भरके ले आये थे, उसके घरवालों पर तो बारात जिमाने तक को पैसे ना थे...जब मेरे मामी केवल माँग भरने से मामा की बीवी बन गई तो रजनी भी तेरी...”

“चुप कर ओय! वो सबकी मर्जी से हुआ था, मेरे से तो अनजाने में हुआ।” अरूण ने रजनी की बात में वजन क्या डाला, पंकज उस पर बरस पड़ा।

“अरे तो तुझे क्या जरूरत थी, होली पर उसे लाल गुलाल लगाने की? वो भी सिर पर.... नीला लगा देता, हरा लगा देता! कम से कम ब्याह तो ना माना जाता वो”, अमित ने किसी बड़े-बुर्जुग की तरह डाँटा।

“अबे, जामुनी गुलाल लगाया था, सिर पर पूरी थैली उलट दी थी। कहती है जब नहाकर आई तो वो जामुनी से लाल हो गया और उसकी माँग में भर गया। सब सहेलियाँ कहने लगी एक बार जो माँग भरी तो समझो पक्के वाला ब्याह हो गया। उसकी सहेलियाँ उसे ‘पंकज की भऊ’ भी कहने लगी।”

“अबे डर मत, किसी के कहने से कुछ नी होता...”

“वो कह रही है आज शाम मेरे घर आएगी और मम्मी-पापा को बताएगी की वो उनकी बहू है, होली पे हमारा ब्याह हुआ है।” पंकज रोने को पक्का था। “पापा बहुत मारेंगे मुझे…मेरे दूर के चाचा ने यूंही एक लड़की की खून से माँग भरी थी और उसे लेकर भाग गये थे, पापा ने ढ़ूंढ के मारा था उन्हें....चप्पलों से...मुझे भी वैसे ही धुनेंगें...”

“बात तो सही है यार। बात खुलने पर बड़ी बदनामी होएगी अंकल जी की। लोग कहेंगें, बामनो का लड़का त्यागियों की लड़की ब्याह लाया...क्या पता उसके घरवाले भी आ जाए तुझे पीटने...पता है, चार भाई हैं उसके!” अरूण की इस ख़बर से पंकज के होश उड़ा दिये।

“हाँ यार! कोई और होती तो ठीक था, चार भाईयों वाली बहन की माँग कभी नी भरनी चाहिए....” अमित भी सहमत था।

“तो फिर मैं क्या करूं भाई? कुछ भी हो, वो घर नी पहुँचनी चाहिए”

रूआंसे पंकज ने दोस्तों की ओर बड़ी उम्मीद से ऐसा सवाल उछाला था जिसका जवाब उन मासूमों के पास नहीं था। फिर भी अमित दिमाग़ के घोड़े दौड़ा रहा था। वो घर में मम्मी के लिए आने वाली सभी महिला पत्रिकाओं को चाट जाता था, ‘आपकी समस्याएँ’, ‘दुखवाँ का से कहूँ’ कॉलम तो विशेषकर… उसका व्यवहारिक ज्ञान, बाकी दोस्तों से बेहतर था।

“भई मिल गया आइडिया! मैंने सखी-सहेली पत्रिका में ऐसी ही कहानी पढ़ी थी, जिसमें जबरन शादी हो गई थी”

“फिर क्या हल निकला था उसका?” पंकज और अरूण की आँखों में उम्मीद के जुगनु टिमटिमाए।

“तलाक! हर जबरिया ब्याह का एक ही हल है- तलाक! बहुत चल रहा यो आजकल...”

“मगर कैसे?”

“देख अगर तू मुसलमान होता तो आसान था। तीन बार कह दो, तलाक तलाक, तलाक, बस हो गया तलाक। मगर हिंदुओं के यहाँ बड़ी समस्या है।”

“पंकज ने आसमान को ऐसे गुस्से से घूरा जैसे भगवान से शिकायत कर रहा हो, क्यों गलत घर में पटक दिया! चार घर छोड़ के उस्मान चचा के यहाँ भेज दिया होता तो आज ये दिन तो ना देखना ना पड़ता!”

“अबे! ज्यादा होशियारी ना झाड़, ये हिंदु बच्चा क्या कर सकता है, वो बता? हल जानने को अरूण बेसब्रा हो जा रहा था।

“पापा कहते हैं, हिंदुस्तान में जो काम सीधे ना बने, उसे रिश्वत दे के बनवा लो”

“मतलब?”

“तू उसे कुछ रिश्वत दे दे तो वो ब्याह से मुकर जावेगी” अमित ने ज्ञान बघारा।

“क्या दूँ रिश्वत में?”

“जो उसे पसंद हो।”

“हम्म... पर मेरे पास तो पैसे ना हैं उसे कुछ देने के लिये”

“कोई नी तू फिकर ना कर, हम चंदा जुगाड़ लेवेंगें…तू बस एक कागज पे तलाक की लिखा-पढ़ी ज़रूर कर लियो और उस पे लड़की के साइन ले लियो, कभी बाद में मुकर जाए। ब्याह भले कच्चा हो, तलाक पक्का होना चाहिए” अमित किसी वकील की तरह बोल रहा था। वैसे भी ‘हम सहेलियाँ’ पत्रिका में ‘कानूनी समस्याएँ’ कॉलम पढ़-पढ़ कर वो आधा वकील बन चुका था।

तीनों ने मिलकर तय कर लिया, क्या करना है। स्कूल की छुट्टी के बाद पंकज मिश्रा ने डरते-डरते ‘शि...शि...’ की आवाज़ से अपनी तथाकथित पत्नि रजनी त्यागी को स्कूल के बाहर लगे पेड़ के पास बुलाया। वो लाल रीबन से गुथी दो लंबी चोटियों को हिलाती, घुमाती, फुदकती आ खड़ी हुई। जैसे जानती थी उसे यहां क्यों बुलाया गया है। पेड़ के पीछे खड़े अमित और अरूण, पंकज मिश्रा को मोरल सपोर्ट दे रहे थे।

“सुन”

“बोल”

“मैंने मम्मी से पूछा था। वो बोली, अभी मेरी उमर नहीं है बहू लाने की, बाद में देखेंगे...”

“तो?”

“तो अभी तलाक लेना पड़ेगा…”

“मगर तलाक के लिए तो मेहर देना पड़ता है।”

“अच्छा, तो क्या चाहिए उसमें?”

“मुझे साइकिल सिखानी होगी...अपनी साइकिल पे...”

“क्या!!!” सुन कर पंकज की आँखें चौड़ा गईं। साथ में पेड़ के पीछे दुबके अरूण और अमित की भी। पंकज ने कभी उन्हें भी अपनी तारों वाली साइकिल छूने नहीं दी थी।

“तू एक महीने तक रोज मुझे काला चूरन खरीद कर देगा, इमली के कटारे भी...”

“हें!!!”

“बस एक और, अगले महीने जो मेला लगेगा ना, वहाँ से एक जोड़ी पायल और दर्जन भर चूड़ियाँ भी दिलवायेगा।” पंकज ये डिमांड सुन बुरी तरह हड़बड़ा गया।

“मगर मेरे पास इत्ते पैसे ना हैं!”

“वो तू देख! तलाक तुझे लेना है, मुझे नहीं।”

“अच्छा ठीक है, बस और कुछ नहीं ना...लेकिन तुझे पहले तलाकनामे पर साइन करना पड़ेगा...”

“पता था तू ऐसा ही बोलेगा, इसलिए मैं लिख के लाई कि तू मुझे क्या क्या देगा।” रजनी त्यागी ने पहले से तैयार तलाकनामा निकाला जिस पर दो पक्के गवाहों के सामने सर्शत दस्तख़त लिये गये। पापा की जेब से धीरे धीरे पैसे साफ़ कर मेहर अदा कर किया गया और इस तरह होली पर पंकज मिश्रा के ऊपर जो राहू-केतू की महादशा चढ़ी थी, अंततः उतर गई। पंकज मिश्रा का ज़िंदगी के पहले ‘हनी ट्रेप’ से पीछा छुटा।

ये बात वो तब नहीं समझता था मगर सालों बाद दिल्ली जाकर समझ आया कि स्याला, आजकल अखबारों में जिसके हल्ले मचते हैं, जो फिल्म स्टॉर, पोलीटीशियनों के साथ ख़ूब होता है, वो तो हमारे साथ बचपने में ही हो गया था, ‘हनी ट्रेप’।

उसके बाद वो कभी किसी ट्रेप में नहीं फंसा। हुस्न को दूर से ही पिया करता था, आँखों आँखों में...अपनी दूसरी बीवी के अलावा कभी किसी के पास नहीं फटका।

पंकज मिश्रा जब अतीत की चौखट से लौटा तो सामने बैठी रजनी रेल के सफ़र की जरूरी ऱवायत, “अखबार के टुकड़ों पर पूरी-आलू परोसना” निभा रही थी। पंकज मिश्रा के दिल में शरारत जागी। ‘आज मौका मिला है, ले लूं बदला! कर लूं सारी उधारी चुकता! दो चार आड़ी-टेढ़ी बात करूंगा, पति के मन में शक के बीज पनपेंगे, हो जाएगा बदला पूरा...मगर लगता है इसने पहचाना नहीं। शायद उम्र के साथ शख़्सियत में थोड़ी शराफ़त घुल चुकी है, तभी तो सामने बैठे पराये मर्द को एक बार नज़र उठाकर नहीं देखा।

पंकज मिश्रा शायद भूल गया था, वो रजनी त्यागी थी! एक जमाने में अच्छों अच्छों को धो दिया था उसने! मगर अब शादीशुदा थी। मर्यादाओं में बंधी भारतीय नारी। वो भोलेनाथ से मन ही मन कितनी प्रार्थनाएँ, कितने जाप कर चुकी थी कि सामने बैठा पंकज मिश्रा उसे किसी भी तरह पहचान ना पाए...उसकी नज़रें धुंधला जाए, यार्दाश्त चली जाए। वो भीतर ही भीतर काँप रही थी, सहम रही थी मगर बाहर से अनजान बनी बैठी थी।

“तुम, रजनी त्यागी हो ना? नकुड़ वाली..पहचाना मुझे? पंकज मिश्रा ने जिस तेवर से सवाल उछाला, वो सकपका गई। कोई जवाब देते नहीं बना। उसका पति कभी उसे तो कभी पंकज मिश्रा को घूर रहा था, जैसे बंद लिफ़ाफे से ख़त का मज़नून भाँपने की जुगाड़ में लगा हो।

“ओ हाँ...याद आया, भाईसाब स्कूल में हमारे साथ थे...बच्चों मामा को नमस्ते करो” इधर रजनी झेंपी सी हँसी हँसकर बच्चों से नमस्ते कहलवाने पर तुली थी उधर ‘मामा’ सुनते ही पंकज मिश्रा के तन-बदन में आग लग गई। ‘मामा!!! इसके बच्चों का मामा!!! अपनी पहली बीवी के बच्चों का मामा कैसे हो गया मैं यार!!!’ लगता है अपने पहले पति को भूल गई’

‘तुम्हें याद है ना, होली पर हमारी...”

“हाँ हाँ... होली पर हमारी परिक्षाएँ थी और आपकी तबियत ख़राब थी। मैंने आपकी बहुत मदद की थी, उसके लिए आज शुक्रिया कहने की क्या ज़रूरत है?” वो काँपती आवाज़ में खिसियाई। होंठ जबरन हँसने की कोशिश कर रहे थे मगर आँखों में पहली बार घबराहटें हिलौरें ले रही थी। इशारों-इशारों में उस पार, भर-भर के माफ़ीनामें भेजे जा रहे थे, सौ-सौ मिन्नतें दुहराई जा रही थी...ज़ुबान बंद रखने की।

उन शेरदिल आँखों में पहली बार डर देखना अच्छा लगा था पंकज मिश्रा को....वो उस बचपन के ब्याह पर हँस पड़ा और मन ही मन बोला, ‘मेरी पहली पत्नि! जाओ, माफ़ किया। मेहर में आज तुम्हें माफ़ी भी दी।’

“फिर भी बहनजी, शुक्रिया कहना तो बनता है ना...तब मौका नहीं मिला, अब कह रहा हूँ...वैसे मैं दिल्ली में रहता हूँ, कभी लाइएगा बच्चों को, उनके मामा के घर....” एक हँसी इधर खिली, एक सुकून उधर पसरा...ज़िंदगी की रेल यादों के पुल से, बिना किसी ऐक्सीडेंट के हौले-हौले गुज़र गई।

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