रोशनी

बाल साहित्य
5 out of 5 (3 रेटिंग्स)
कहानी को शेयर करें

हमेशा की तरह आज भी मै अपनी बहन जो क्लास 5 की छात्रा थी उसे लंच बॉक्स देने गयी। मैंने आज फिर उस लड़की को देखा जो क्लास में अकेले अपने में मग्न थी। ये बात तबकि है जब मै क्लास 10 में पढ़ती थी ।

मै और भी तेज तरार लड़कियों से मिलीं थी पर उसकी मासुमियत मुझे अपने बचपन की याद दिलाती थी,और शायद यही कारण था की मैं हर रोज़ लंच बॉक्स देने के बहाने उसे देखने और उससे बात करने जाया करती थी ।

मैंने एक दिन मौका देखकर उससे उसका नाम पूछा वो बहुत शर्मीली थी इसलिय थोड़े देर बाद उसने हल्की मुस्कान के साथ अपना नाम बताया, 'रोशनी'। मैंने उसकी पलकें झुकने से पहले बोला, बहुत प्यारा नाम है। इसके पहले मैं कुछ और बोलती वो वहाँ से चली गयी।

मैंने उसके बारे में और जानने की कोशिश की तो पता चला उसकी दोस्त जो एकलौती लड़की थी जिससे वह कभी - कभार बातें किया करती थी, वो भी क्लास की तेज - तरार लड़कियों के साथ रहती थी। इसलिए मैंने भी उसे अधिकतर समय अकेला पाया था।

मेरी बहन ने बताया की रोशनी क्लास में सबसे शांत और शर्मीली लड़की है। कुछ लड़कियाँ उसे " डम्बो " कहकर बुलाती हैं।

आये दिन रोशनी की मासूमियत ने उसे मेरी आँखों में अनोखा बना दिया । अब शायद मैं उसकी दोस्त बनना चाहती थी कही न कही शायद वो भी अपने के खोज में थी जिससे वह अपनी शिकायतें , अपनी प्रॉब्लम्स और अपनी पसंद के बारे मे बता सके। मैंने उससे दोस्ती करने की ठान ली ।

मै उससे हर रोज़ थोड़ी थोड़ी बातें किया करती थी मैंने उससे जानने की कोशिश की कि वो इतनी शांत क्यूं रहती है पर अफ़सोस मुझे ये जानने के लिए थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ा । एक दिन रोशनी ने मुझसे पुछा, " दीदी ,आपका नाम क्या है ? "


बिना देर किये हुए मैंने उसे बताया कि मेरा नाम 'अंशिका' है। हमेसा की तरह उसने एक हल्की सी मुस्कान दी । अब शायद उसे समझ में आ चूका था की मैं उसकी वही दोस्त बनना चाहती हूँ , जिसकी तलाश में वो है ।

रोशनी पढाई में भी एक औसत छात्रा थी तो मैंने उसे अपनी बहन के साथ पढने का ठाना । रोशनी मेरे और मेरी बहन के काफी करीब हो चुकी थी , वह मुझे प्यार से अंशी दी कह कर बुलाती थी । स्कूल के बाद मै उसे पढ़या करती थी ,वह जिज्ञासु और समझदार छात्रा थी उसने सब कुछ जल्दी सिख लिया साथ ही अपने कक्षा की मेधावी छात्रा हो गयी थी ।

इसके अलावा वह और लड़कियों से बाते करने लगी थी , ये सब देख कर मुझे ख़ुशी हुई । साल के अंत में हुए वार्षिक परीक्षा में रोशनी ने अच्छे अंक प्राप्त कर कक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया ।

रोशनी मेडल प्राप्त करने के बाद सबसे पहले दौड़कर मेरे पास आयी और अंशी दीदी थैंक यू कहकर गले लग गयी । आज से पहले मैंने उसे इतना खुश कभी नहीं देखा था । आज रोशनी के चेहरे की रोशनी साफ़ झलक रही थी । मुझे बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे किसी मशहूर आर्टिस्ट की सबसे अनोखी अधूरी पेंटिंग पूरी हो चुकी थी। मेरी अनोखी पेंटिंग " रोशनी " थी ,जो अब पूरी हो चुकी थी ।

MORAL OF THE STORY


हमारे आस पास ऐसे बहुत बच्चे है , जिनकी प्रतिभा / हुनर कहीं न कहीं दब के रह जाती है। जिनको सामने लाने के लिये बच्चों को थोड़े प्यार और थोड़े हिम्मत की जरूरत है| जो सिर्फ हम बड़े उन्हें दे सकते है। सोचिए अगर आप मेरी जगह होते तो आप क्या करते ? आप उसे किसी भी बच्चे पे आजमा सकते हैं ।

यदि भविष्य में आपको रोशनी जैसे कोई भी बच्चा या बच्ची मिले तो आप उसे निश्छल और अपनेपन के भाव से जरूर देखे शायद, ऐसे बच्चे अपनों से प्यार पाने में असमर्थ होते है। उन्हें भी किसी अंजान व्यक्ति के प्यार और सहानुभुति कि तलाश होती है । शायद रोशनी जैसे कई बच्चें आपका इंतेज़ार कर रहे है ।

हमारे देश में कमी बच्चों के प्रतिभा में नहीं अपितु उनकी प्रतिभा को पहचानने वालों में है। हर व्यक्ति एक हुनर लेकर पैदा होता हैं, उस हुनर को दुनिया के सामने लाएं। आप अपने बच्चों का हुनर उनके प्यारे दोस्त बनकर जान सकते हैं ।

आपको ये तो जरूर पता होगा की , हुनर तो सब में होता है, बस फर्क इतना है, किसी का छिप जाता है, किसी का छप जाता है!

जैसे आज मैंने रोशनी का हुनर इस सच्ची घटना से आपके सामने लाया है , आप भी जरूर किसी बच्चे का हुनर सामने लाये ।

आशा है मेरी कहानी कहानी आपको अच्छी लगी होगी , अपना महत्वपूर्ण समय देकर इसे पढ़ने के लिए "धन्यवाद"

अंशिका त्रिपाठी
16 वर्षीय
ईमेल - anshikatripathi049@gmail.com

कहानियां जिन्हें आप पसंद करेंगे

X
Please Wait ...