दूसरा आदमी

jarya2005
वीमेन्स फिक्शन
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बरसों से शांत पड़ा मन कुछ अशांत हो रहा है। धड़कनें भी कुछ बेताब सी हैं और मन भी न जाने क्यों युवा हो झूम उठा है। वाशरुम से बाहर आते हुए एक बार फिर से शीशा देखने का दिल हो आया। उफ़! पचास की हो गई हूँ फिर मन क्यों बच्चा बन रहा है। उसपर से बालों की शरारत भी उफ़ान पर है। चंद गिने-चुने केश गुच्छों में से दो-चार सफेद मोतियों के छल्ले चेहरे पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा उम्र की याद दिलाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं।


"माँ! कहाँ खो गई..चलो एयरपोर्ट पर घूमते हैं..!"


"हाँ! चलो!" जैसे ही अचानक पलटी कि उल्टी ओर से आ रहे किसी भद्र पुरुष से जा टकराई।

"आइ एम सॉरी! मैंने देखा ही नहीं!" मेरे मुँह से निकला,

"गलती आपकी नहीं मेरी है!" परदेस में हिंदी बोलने वाला ये कौन है। मध्यम कदकाठी गोरा चेहरा और उम्र कुछ मेरे ही आस-पास का लगा तो ध्यान से देखने लगी और फिर एक पल के लिए सन्न ही रह गई।


"स…मी….ररररर..!"


"एट योर सर्विस मैम!"

मेरे हाथ से गिरे मोबाइल व चश्मे को उठाकर मेरी ओर बढ़ाते हुए बोला। उफ़! वही मजाकिया अंदाज,वही कसा हुआ चेहरा जैसे उम्र ने कोई असर ही न डाला हो। मेरी आँखों में देखते ही मुस्कुराया तो मेरे चेहरे पर भी अनायास ही लाली दौड़ गई। ओह! ऐसा होता है प्यार! समय,उम्र,स्थान के बंधनों से परे तभी पीछे से आती बेटी कह उठी।


"क्या हुआ माँ…तबियत ठीक नहीं लग रही…चलो कॉफी पी लो फिर घूमेंगे?"


"बेटा! इनसे मिलो..मेरे दोस्त समीर हैं और समीर ये मेरी बेटी मायरा।"


"और ये मेरा बेटा ॠषि…चलो कहीं बैठते हैं।"


और फिर हम सभी कॉफी कैफे में बैठ गए। हमारे पास वक़्त ही वक़्त है। आठ घंटे कुछ कम तो नहीं होते। टिकट लेते वक़्त ही बेटी से कहा था कि एमीरेटस ही क्यों कोई और एयरलाइंस की टिकट ले ले। मगर नहीं उसे दुबई एयरपोर्ट पर अपना बचपन याद करना था। मात्र नौ वर्ष की थी जब पहली बार आई थी तब भाग-भाग कर डॉल्स खरीद रही थी। अब बड़ी हो गई है। मास्टर्स की पढ़ाई के लिए जा रही है पर अभी भी बड़ी कहाँ हुई है। मन से पूरी तरह बच्ची ही है। निकलने के दो हफ्ते पहले ऐसा रोना-धोना मचाया कि आनन-फानन में मुझे अपना वीजा निकालना पड़ा जबकि मैं लंबे सफर के पक्ष में बिल्कुल ही नहीं रहती। शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। समीर से जो टकराना था।


"हाँ! तो तुमने बताया नहीं कि कहाँ जा रही हो?" ऐसे पूछ बैठा जैसे अब भी मुझपर हक़ रखता है।

"बेटी के दाखिले के सिलसिले में…अमेरिका जा रही हूँ और तुम?"


"मैं यूरोप जा रहा हूँ मगर बेटा यूएसए जाएगा।"


"कौन सी युनिवर्सिटी…"बेटी ने पूछा तो बच्चे आपस में बात करने लगे।


"बेटा! मेरे पैर जवाब दे रहे हैं। तुमलोग चाहो तो एयरपोर्ट घूम आओ!"


"हाँ माँ! हम एक घंटे में लौटते हैं!" कॉफी खत्मकर बच्चे साथ निकल पड़े।


एक मिनट के लिए अजीब बेचैनी सी महसूस हुई। लगा कि क्या बात करूँ तभी समीर ने ही टोका," तुम अचानक कहाँ गायब हो गईं थीं? आखिरी बार हमारी बात 2007 में हुई थी न और अब पंद्रह साल बाद मिली हो और वह भी इत्तेफ़ाक से.." जाने वह क्या जानना चाहता था।

मैंने टालते हुए कहा," छोड़ो वह सब..अपनी सुनाओ कैसी चल रही है..?"

"बस चल रही है!"

"क्यों तुमलोग साथ नहीं हो?"

"तीनों तीन कॉनटिनेंट में है तो साथ हैं और नहीं भी…और तुम?"

"मैं अकेली ही काफी हूँ!"

"क्या मतलब?"

"तुम्हें याद है कि आखिरी बार हम तीनों ने याहू पर कॉन्फ्रेंस में बातें की थीं।"


"हाँ! याद है!"


"तो ये भी याद होगा कि उसने कहा था मेरे एक बाजू में तुम और दूसरी में वह हो तो तुम्हें कैसा लगेगा…?"


"हाँ! यह पढ़कर ही मैं कॉन्फ्रेंस से बाहर हो गया था।

"और मैं उसकी जिंदगी से..!"


"पर क्यों…अच्छी-भली जिंदगी अपने हाथों खराब कर डाली तुमने।"


"खराब कहाँ..भली चंगी तो हूँ।"


"देखो! कोई भी पति पत्नी के पूर्व प्रेमी से बात करता हुआ बहक सकता है। उसकी भावनाओं को समझकर उसे माफ कर देती तो खुश रहती।"


"मैंने भी यही सोचा था समीर! उसे देवता बना दिया था मगर देवता होने के लिए देवत्व भी होना चाहिए न! उसे तो इंसान बने रहना था। उस घटना के बाद मुझसे अलग-अलग रहने लगा। साथ होता भी तो कुछ सोचता रहता।"


"तूने पूछा नहीं? खुलकर बात करती।"


"मेरे कुछ बोलते ही तुम्हारा नाम लेने लगता और यह सब बच्ची के विकास के लिए ठीक नहीं था। सबसे पहली बात कि मैंने शादी के बाद ही उसे सारा सच बता दिया था। उसे तभी मुझे छोड़ देना चाहिए था। तब मैं भी अपनी जिंदगी जी लेती पर उसने सोचा कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा और जब मैंने 2007 में तुम्हें गुगल सर्च कर ढूँढ निकाला तो वह सकते में आ गया। मैंने उससे कुछ न छिपाया पर उसका दो रूप है समीर। पहला दिखाने का और दूसरा जिसे वह ढक कर रखता है जो उस रोज खुलकर बाहर आ गया था। उस दिन के बाद से वह खुद को दूसरा आदमी समझने लगा था और अपना बदला लेने के चक्कर में वह मुझे भी जलील करने की कोशिश करने लगा।"

"मैं कुछ समझा नहीं!"


"पहले तो मैं भी नहीं समझी थी पर वह दूसरे मित्रों की पत्नियों पर नजर रखने लगा था। वह चाहता था कि मैं उसके मित्रों के और वह उनकी पत्नियों के साथ…तुम समझ रहे हो न मैं क्या कहना चाह रही हूँ।"


"कौन पति अपनी ही पत्नी को ऐसे सरेआम बदनाम करता है। फ्रस्ट्रेशन में आ गया बंदा।"


"बदला लेना चाहता था। जो दर्द मैंने अंजाने में दिया वह मुझे जानबूझकर देना चाहता था और जब यह सब मुझे नागवार गुजरने लगा तो उससे किनारा करना ही बेहतर लगा। पापा को अपनी इज्जत इतनी प्यारी थी कि तुम्हारे जैसे सूयोग्य के स्थान पर अपने जाति के उच्चकुल के युवक को चुना तो भला पापा की बेटी अपने दामन पर दाग कैसे लगने देती..मैं उसे छोड़कर हिंदुस्तान वापस आ गई और फिर कभी लौटकर नहीं गई। वह समय-समय पर आता है अपनी बेटी से मिलता है। दुनिया की नजर में हम भले पति-पत्नी हैं पर अब हम साथ नहीं हैं।"


"बड़े दुख की बात है! तुम्हारे साथ इतना कुछ घट गया और तुमने बताया तक नहीं!"


"क्या और किस हक़ से बताती? यह निर्णय तो मेरे परिवारवालों का था। उन्होंनेे राम को ठुकराकर रावण चुना था। उन्हें भी क्या कहती। इसे अपना नसीब मानकर स्वीकार कर लिया और बेटी के भविष्य के सपने बुनने में लग गई।"


"पर अब अकेली क्या करोगी?"


"माता-पिता की देखभाल करूँगी।"


"मेरी मानो और अपने पति के पास लौट जाओ!"


"लौटने का मतलब समझते हो? वह दूसरा आदमी मुझे दूसरी औरत बनाने के चक्कर में मानसिक रूप से बीमार कर देगा। मैं अकेली मस्त हूँ। मेरी चिंता मत करो। तुम भी अपने जीवन में खुश रहो और मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए।" कहकर किसी सिद्ध साध्वी के समान गहरी साँस ली।


इतने में बच्चे भी आ गए और समीर के फ्लाइट की बोर्डिंग शुरु हो गई तो वह बेटे ॠषि को समझा-बुझाकर अपने गेट की ओर निकल पड़ा। उसके रहते अपने जिस दुख का अहसास तक न होने दिया था। खुद को जज्ब कर संभाल रखा था वह उसके जाते ही डगमगाने लगा। आँखों से ओझल होने तक ही खुद को संभाल सकी फिर कुछ बूँद नैनों से उतरकर सीधे हृदय से जा मिले तो अहसास हुआ कि अब भी मेरे अंदर उसके लिए प्यार जिंदा है। उसका यूँ अनायास मिलना और बिछड़ना ऐसा था जैसे कोई खुशी मिली और फिर छिन भी गई। चंद पलों का साथ जिसने अंजाने में ही कुछ अरमान जगा दिए थे वह फिर से रूठकर कहीं और चल दिए और हमेशा के लिए मुझको पत्थर कर गए।

आर्या झा

मौलिक व अप्रकाशित

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