तालाबंदी और भूख

राजनीति
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' पकड़ो - पकड़ो! इसको , देखो ! भाग न जाए , मना करने पर भी ये साले मानते नहीं हैं | '

' साहब ये लोग ऐसे नहीं मानेंगे, इनको तीन चार दिन लॉकअप में रखना पड़ेगा | जम कर धुनाई होगी तो होश ठिकाने आयेगा | '

' सर्! मुकदमा ठोंक कर अंदर कर दीजिये; झंझट ही ख़त्म हो | '

पुलिस की जीप में बैठे रामचरण लाहौली शांति से सब कुछ सुन रहा था | जीप की पिछली सीट पर करीब दर्जनों लोग ठूँसे हुए थे और अपनी गर्दन झुकाए हुए जीप के फर्श को देखने की कोशिश कर रहे थे |

कोरोना की महामारी के कारण पूरे देश में लॉक डाउन चल रहा था | प्रमुख शहरों में धारा 144 और महामारी अधिनियम लागू कर दिया गया | भीड़ न बढ़े इसलिए पुलिस वाले लगातार गश्त पर थे |

आज लॉक डाउन का चौदहवां दिन है | भूख ने कानून का भय कम कर दिया और भोजन की तलाश में रामचरण लाहौली सीधे स्टेशन पहुंच गया | लेकिन नियति कहिए या कानून का शिकंजा , वह सीधे हवालात पहुँच गया |

सैकड़ों कुलियों की तरह रामचरण लाहौली सुबह से लेकर शाम तक पर्यटकों का सामान उनके होटलों तक पहुँचाता | लगातार बीसियों वर्षों से सामान ढोते ढोते उसकी कमर धनुष की तरह अर्द्ध चंद्राकर हो गयी थी |

रामचरण लाहौल और स्पिति ज़िले से करीब बीस साल पहले रोजगार के सिलसिले में एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन आया था और कुली का काम करने लगा। लाहौल स्पिति जिले के होने के कारण अपने दोस्तों के बीच वह लाहौली उपनाम से जाना जाने लगा |
इसी वर्ष मार्च के पहले सप्ताह से ही कोरोना महामारी के डर से पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आना शुरू हो गयी थी | इसका नतीज़ा लाहौली की कमाई में दिखने लगा | आमदनी अठन्नी हो गयी लेकिन ख़र्चा सोलह आने बना रहा | जब मार्च के अंतिम हफ़्ते में लॉकडाउन की घोषणा हुई तो वह कुछ निर्णय न कर सका कि वह अपने गाँव चला जाए या वहीं रुके ? इस उम्मीद में कि इक्कीस दिन बाद सब कुछ सामान्य हो जायेगा वह वहीं रुक गया |

रामचरण लाहौली शहर से थोड़ा दूर एक ऐसी जगह में रहता था जो न तो शहर था और न ही गाँव | कोरोना वायरस ने न सिर्फ़ महामारी को जन्म दिया बल्कि अफ़वाह और घृणा जैसी नकारात्मकता का भी ख़ूब प्रसार किया |

' तुम शहर रोज आते जाते हो न? शहर में ही तो फैली है ये बीमारी ; तुम महीने का किराया दो और कल एक तारीख़ से मेरा मकान ख़ाली कर दो | ' मकान मालिक ने दो टूक शब्दों में मकान खाली करने का आदेश दे दिया |

' अभी मैं कहाँ जाऊंगा, मेरे पास तो पैसे भी नहीं हैं | ' लाहौली ने विनती की |

' पैसे तुम भले ही बाद में दे देना लेकिन अभी तुरंत घर खाली करो| ' मकान मालिक

सुबह -सुबह वह अपना बिस्तरबंद लेकर शहर की तरफ़ पैदल निकल पड़ा | शहर के लगभग सभी बड़े-छोटे होटल मैनेजर लाहौली को जानते थे | करीब बीस एक किलोमीटर की यात्रा करके वह शहर के होटल पहुंचा जहाँ वह कभी-कभी यात्रियों का सामान ले जाया करता था तो मैनेजर ने कहा , ' लाहौली ! तुझसे अच्छा इस स्थिति को कौन जानता है ? पूरा होटल खाली पड़ा है | होटल मालिक ने चेतावनी दे दी है कि इस महीने मेरी सैलरी आधी कर देगा और अगले महीने तक स्थिति नहीं सुधरी तो निकाल देगा | तुम बेसमेंट में चाहो तो रह लो | '
' भगवान तुम्हारा भला करे मालिक! ' हाथ जोड़कर लाहौली ने दुआ दिया |
लॉकडाउन के शुरुआत में तो सहायता करने वालों की खूब भीड़ उमड़ी जिसकी वजह से दिन का खाना उसे मिलता रहा लेकिन तकलीफ़ रात के खाने के लिए उसे संघर्ष करना पड़ता | |अगले दिन प्रशासन द्वारा दो दिनों के कर्फ़्यू की घोषणा कर दी गयी | भूख के मारे रामचरण के मन में कानून का भय समाप्त हो गया | वह गली- गली होता हुआ वह स्टेशन पहुँचा जहाँ से उसकी रोजी रोटी मिलती | नतीज़ा - गिरफ़्तारी |

मजिस्ट्रेट के सामने जब सबकी पेशी हुई तो सबने आगे से ऐसी गलती न करने का वादा किया | मजिस्ट्रेट ने सभी अभियुक्तों को दस दिन की सांकेतिक सजा सुनाया और उन्हें जेल के सभी कैदियों के लिए मास्क बनाने का आदेश दिया | काम से किसी को आपत्ति नहीं थी बशर्ते काम तो मिले | सबसे ज़्यादा खुश रामचरण था क्योंकि उसे यहां दो वक्त का भोजन तो मिल रहा था | दो दिन की भूख की तड़प ने जेल को अच्छा बना दिया | रामचरण को उम्मीद थी कि जब वह जेल से निकलेगा तो लॉकडाउन ख़त्म हो जायेगा और फिर से उसे काम मिलने लगेगा |
जेल से निकलने के बाद रामचरण उस होटल पहुंचा जहां के बेसमेन्ट में उसे शरण मिली थी | इधर लॉक डाउन की अवधि बढ़ जाने के कारण होटल की तालाबंदी हो गयी थी | दिन भर होटल के बाहर उसके खुलने के इंतज़ार में ही बीत गया | शाम को तेज़ भूख लगी तो उसे कुछ नहीं सूझा | वह पुलिस से बचते बचाते चर्च व मंदिर की तरफ पहुंचा लेकिन वहां भी उसे तालाबंदी मिली |
अगली सुबह उसे सूचना मिली कि सरकार की तरफ से सभी गरीबों को खाना मुहैया कराया जा रहा है | सूचना सही थी लेकिन वास्तविकता थोड़ी सी अलग | सामाजिक दूरी के सिद्धान्त के पालन की वजह से करीब दस किलोमीटर तक लंबी लाइन लग गयी थी | पहाड़ों की धूप भी बहुत तेज़ होती है और यह धूप और भी कड़ी लगती है जब पेट ख़ाली हो | ख़ैर करीब चार घंटे के बाद रामचरण को खाना नसीब हुआ वो भी आधा अधूरा पेट |

' चचा! पूरा खाना चाहिए तो पहले आना होगा | ' कश्मीर से आये एक और कुली जिसे लोग खान के नाम से जानते थे ने रामचरण को बिन मांगी सलाह दी |

' और हाँ! रात का खाना पूरा चाहिए तो थोड़ी देर बाद वहां के गोले वाली जगह में अभी से बैठ जाओ | ' पूर्वी भारत के एक अन्य आप्रवासी मज़दूर ने रामचरण को सलाह दी |

वह पास के एक बंद सरकारी कार्यालय की सीढ़ी पर लेटा और बेसुध होकर सो गया |वह उठते ही उस जगह पहुँचा जहां दिन में उसे खाना मिला था | इस बार लाइन तो सुबह से भी ज़्यादा लंबी थी | रामचरण को लाइन में खड़े होने और इंतज़ार से कोई दिक्कत नहीं थी; बस डर था कि कहीं दिन वाली स्थिति का फिर से शिकार न हो जाये |

रात ग्यारह बजे जब उसका नंबर आया तो बस सब्जी -सब्जी ही बची थी | क्या किसी का सिर्फ़ सब्जी से पेट भर सकता है ? लेकिन नहीं से तो बुरा नहीं |

(भीड़ में गपशप)
' सुना है यह बीमारी बहुत खतरनाक है | चौदह दिन तक इसका असर रहता है | इस दौरान बच गए तो ठीक नहीं तो राम नाम सत्य |'

' तभी तो सरकार ने इतनी सख़्ती की है | ' एक दूसरे मज़दूर ने कहा |

' क्या भूख की बीमारी से भी बड़ी है ये बीमारी? ' एक दूसरे मज़दूर ने आर्त स्वर में यह सवाल पूछा

' भूख से बढ़कर कोई बीमारी नहीं | ' रामचरण ने रोते हुए अपना दर्द बयाँ किया |

रामचरण लाहौली की बातें सुनकर बहुतों को लगा कि ये उन्हीं की बात कर रहा है |
'फिर क्या किया जाये?' भीड़ ने एक साथ रामचरण से सवाल पूछे |

चलो अभी काफ़ी रात हो गयी है | सभी लोग आराम करो | कल सुबह कुछ सोचा जायेगा |
जब भी झपकी लेता तो उसे रोटी ,दाल ,सब्जी और चावल से भरी थाली का सपना आता और वह व्याकुल होकर जग जाता | वह बार बार सोचता कि वह कहाँ था ?

सुबह उठा तो उसे संकेत मिल चुका था | अपने मज़दूर साथियों को बताया, ' इस लॉक डाउन में लॉकअप से अच्छी कोई जगह नहीं है | '

भीड़ से एक मज़दूर की तुरन्त प्रतिक्रिया आयी ,' वहां तो हमारी आज़ादी छिन जायेगी | '

' किस आज़ादी गुरुर है तुम्हें? उसी से जिससे तुम भूख शांत करने के लिए दर बदर भटक रहे | ' रामचरण|


' हर चीज़ की कीमत होती है और आज़ादी की भी है लेकिन आज़ादी कीमत क्या भूखे रहकर चुकानी पड़ेगी? ' लाहौली ने भीड़ के सामने बोला|

दर्जन की भीड़ में से कुछ पुलिस ,जेल व हवालात आदि के डर से इधर उधर खिसक लिए | बाकी बचे खुचे मज़दूर रामचरण लाहौली के पीछे पीछे चल दिये | अभी वो कलेक्टरेट के पास पहुँचे ही थे कि पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया | लॉक-अप में जब पुलिस डंडे ताबड़तोड़ पड़ना शुरू हुए तो बहुतों के मन से जेल का ख़्याल भाग खड़ा हुआ |

(मजिस्ट्रेट कक्ष )

अभियोजक , ' माई लॉर्ड ! इसने दूसरी बार लॉकडाउन का उल्लंघन किया है | '

मजिस्ट्रेट ,' क्या यह सच है ? '

रामचरण ,' जी | '

मजिस्ट्रेट ,' ऐसा क्यों? इस ज़ुर्म की वजह से तुम्हें सजा भी हो सकती है ? '

रामचरण, ' भूख ने मुझे मज़बूर कर दिया साहब ! मुझे पता है साहब महामारी का ख़तरा लेकिन हुकूम को शायद भूख का डर और ख़तरा नहीं पता | '

मजिस्ट्रेट गुस्से में सरकारी वकील से , क्या मज़दूरों के लिए प्रशासन भोजन उपलब्ध नहीं करा रहा है ? '
अभियोजक ,' आई एम सॉरी माई लॉर्ड ! पिछले तीन हफ़्तों में अब तक सैकड़ों टन खाद्यान्न प्रशासन ने बाँटा है | '
मजिस्ट्रेट ,' मैं तो कई दिन से स्थानीय समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर गैर सरकारी द्वारा मज़दूरों को भोजन वितरित करने के फ़ोटो देख रहा हूँ | क्या आपको किसी ऐसे एनजीओ ने कभी भोजन नहीं दिया ? '

रामचरण ,' बाँटते हैं ऐसे लोग | लेकिन इनका ध्यान सहायता पर कम दिखावे पर ज़्यादा रहता है | चार रोटी पर चालीस फ़ोटो खिंची जाती है साहब !मुझ मज़बूर के लिए खाना मिले तो फ़ोटो से क्या दिक्कत ? दिक्कत तो उन्हें है साहब कि उन्हें रोज अलग-अलग गरीब और मजबूर की फ़ोटो चाहिए जब वो भोजन बाँटे | शहर में इस समय इतने ग़रीब और मज़बूर हैं कि उन्हें भोजन बाँटते समय रोज अलग-अलग फ़ोटो मिल जायेगी लेकिन उन्हें कौन समझाए कि एक ही गरीब मज़दूर को दिन मैं दो बार भूख लगती है वो भी हर रोज़ | '
(कोर्ट का माहौल भावुक हो जाता है )

थोड़ी देर की शांति के बाद ,

अभियोजक,
' सर ये एक हैबिचुअल ओफेंडर है,इसको कम से कम छः महीने की सजा मिलनी चाहिए | '
मजिस्ट्रेट ,' तुम्हें पता है कि तुम भूख की वजह से तुम अपनी आज़ादी से समझौता कर रहे हो | अपनी सफ़ाई में तुम्हे कुछ कहना है | '

रामचरण निशब्द है |
मजिस्ट्रेट ,' रामचरण लाहौली को लॉक डाउन के आदेशों के उल्लंघन के ज़ुर्म में छः महीने की सजा दी जाती है | '

रामचरण लाहौली एक विजयी मुस्कान के साथ पुलिस की गाड़ी में बैठकर जेल की तरफ चल देता है | बार बार उसके कानों में जज साहब की आवाज़ ' भूख की वजह से तुमने आज़ादी से समझौता कर लिया ' गूँज रही थी |

जेल में उसकी पहली रात द्वन्द्व में कटी |

'आज़ादी कौन सी थी पहले भी? दिन भर सुबह से शाम तक कमरतोड़ मेहनत के बाद क्या मिलता था ? अगले दिन फिर वही कमर तोड़ बोझ ढुलाई ! यहां भी तो काम ही करना है ; काम से कौन भाग रहा है ? यहां जैसा भी हो दो जून की रोटी तो मिल रही है | बाहर काम भी तो नहीं है अभी और कब तक मिलेगा पता भी तो नहीं ! किस चीज़ की आज़ादी साहब ? भूख की वजह से दर बदर भटकने की ? नहीं जज साहब ! मैंने अपनी आज़ादी से कोई समझौता नहीं किया बल्कि अपनी कागज़ी आज़ादी को फाड़कर अपनी भूख से आजादी पायी है | ' इसी बुदबुदाहट के साथ रामचरण की जेल की पहली रात कट गयी |


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