JUNE 10th - JULY 10th
यहाँ तो छोटे से ज़मीन के टुकड़े पर मकान तले ऊपर बनते और बढ़ते जा रहे है। और करे भी क्या? ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को अपने अंदर समा लेने का यही एक तरीक़ा है। साँप जैसी गलियां जिनकी चौड़ाई तो घटती जा रही और लम्बाई मानो गहरी खोह। फिर भी बंद कमरों और सिकुड़ती गलियों में सूरज की रौशनी और मदमस्त हवा कोशिश करके अपना कुछ हिस्सा पहुँचा ही देती। बिना खिड़की और रौशनदान के बस एक दरवाज़ा जिससे आप भी आएं, रौशनी और हवा भी साथ ही कीड़े-मकौड़े, छिपकली, चूहे भी। वैसे यहाँ सब को साथ रहने की कुछ आदत ही है। छिपकलियां कीड़े-मकौड़े खाती रहती है और उमस, सीलन में वह लगातार पैदा होते रहते है। यानि जीवन चक्र चल रहा है।
चूहे, चूहे अच्छे लगते है। कहीं भी कुछ भी पड़ा मिलता है तो आगे के दोनों पैरो से पकड़कर कुतर-कुतर खाने लगते है। बिल्कुल गिलहरी जैसे प्यारे-प्यारे। एक काम यह ठीक करते है। जब पुराने कपडे कुतर देते है तो नए कपडे बनवाने के रास्ते खुल जाते है। लेकिन कभी-कभी तो यह ज़्यादा ही आतंक मचा लेते है। कॉपी किताबे कुतर देते है। यह किताबे तो बेहतर ज़िन्दगी की उम्मीद है इनका नुकसान कैसे झेलूँ।
पल भर में चूहा फुदकता हुआ पैरो पर से कूद कर निकल गया। उफ़्फ़..! हमसे तो इन्हें कोई डर नहीं। उल्टा हमें ही डरा देते है। हमारी तो मजबूरी है इन गली कूँचों में रहना। यह खुली जगह में जाकर क्यों नहीं रहते। इन्हे कौन रोकेगा। कम्बख़्त यहीं मरेंगे। जीव विज्ञान का पहला चैपटर इसी चूहे ने खाया था। खैर वह तो मुझे अच्छे से आता था। हिंदी की किताब से महादेवी वर्मा की गिल्लू कहानी भी चट कर गया। उसके लिए भी माफ़ किया। गिल्लू तो पूरी तरह मेरे ज़हन में छपी है। तू तो मेरा दुश्मन है फिर भी अच्छा लगता है। पिछली बार इसे चूहेदानी में पकड़ कर दूर मैदान में छोड़ आयी थी। वापस कैसे आया यह..?
“तुझे कैसे पता यह वही है।”
“मार्कर का निशान है इसकी खोपड़ी पर, मैंने लगाया था।”
कैसे !”
“जब यह चूहेदानी में कैद था।”
“उफ़्फ़ ! यह लड़की, ऐसे तो दो चूहे और घूम रहे। उन्होंने तो तेरा कुछ नहीं बिगाड़ा? सुबह से चूहेदानी लगा रखी है कोई पकड़ नहीं आ रहा।”
“लाओ कुछ बढ़िया खाने की चीज़ रखूँ।खुशबू सूंघ कर अंदर जायेंगे।”
“दो दिन बाद गणित का इम्तेहान है तेरा, उस पर ध्यान लगा। यह काम मुझ पर छोड़।”
“अम्मी.. यह सालाना इम्तेहान गर्मी में क्यों होते है? इसके पीछे क्या राज़ है?”
“ऐ हमें नहीं मालूम। अपना काम कर राज़ मत खोज।”
“कैसे पढ़ूँ? बिजली नहीं आ रहीं।”
“बिजली का क्या भरोसा..आये, ना आये । इम्तेहान तो परसो ही होगा।”
“बाहर दरवाज़े पर बैठ जा, थोड़ी रौशनी और हवा दोनों मिलेगी। नहीं तो दिन ढलते ही गुप् अँधेरा..।”
“और जो यह पसीना बहे जा रहा है उसका क्या।”
“पानी पीती रह और पसीना बहाती रह।”
गणित, गणित तो ख़तरनाक है। गणित की कॉपी किताबे उठी और घर के एक मात्र दरवाज़े के चौखट पर पहुँची। “अंकगणित तो भूत है…. हौवा…। वह कॉपी कहाँ है जिसमे मैंने ब्याज वाला चैपटर किया था? सबसे कठिन…. अभी भी ढंग से समझ नहीं आया।”
“वही देख मेज़ के नीचे रैक पर, तेरी कॉपी किताब वही है।”
“हाँ, मिल गयी….यह.. !!”
“क्या….?”
“ओह…..!”
“क्या….?”
आँखों से आँसू नहीं टपक पाया। उससे पहले गले से निकला रूदन दूर तक पहुँचा।
“क्या हुआ? बोलो भी?”
“यह….।” बस उँगलियाँ बीच के बुरी तरह कुतरे हुए पंद्रह बीस पन्नो पर टिक गयी। अब आँखें बहने लगी और रूदन की दहाड़ कम हुई।
अम्मी ने कॉपी के साथ-साथ, हाथ पकड़ लिया। कुछ देर बाद भरे गले से धीमी आवाज़ फूटी, “साधारण ब्याज, चक्रवर्द्धि ब्याज।”
आँखें पोछने की नाक़ाम कोशिश हुई।
“मूलधन मिश्र धन…..!”
“हाँ.. हाँ..” कहते हुए अम्मी ने गले लगाया।
फिर दर्द भरे गले से आवाज़ निकली, “दर, समय.. सब खा गया।” हिचकी बंध गयी।
हिचकी के बीच से फिर आवाज़ निकली, “बहुत मुश्किल से किया……“था”। हिचकी के बीच जुमले टूट रहे थे।
हिचकी उभरती और डूबती रही आँखें बहती रही। “इसी से समझकर….“प्रैक्टिस करती”।
“अब कौन…..“कराएगा”।
खट्ट…..कान आवाज़ की तरफ़ मुड़ गए। “अब क्या?” आँसू, हिचकी, रूदन सब बंद। चेहरे पर ख़ुशी और गुस्सा एक साथ उभरे और लाल-लाल आँखों और जुदा सी रूप रेखा वाला चेहरा पूरे जिस्म की ताक़त के साथ कमरे के दूसरे कोने की तरफ़ लपका।
“आह मज़ा आ गया…..”
“क्या….?”
“वाह……”
“क्या हुआ?”
“यह……।“ उँगलियों ने चूहेदानी की तरफ़ इशारा किया। मार्कर के निशान वाला चूहा।
“फिर क्या?”
“इसी का काम।“
“कैसे कह सकती हो।“
“इसकी आँखों से मेरे लिए दुश्मनी टपकती है।“
“पागल! छोड़, तू चक्रवर्द्धि ब्याज कर यह मुझे दे।“
“नहीं, अब तो इसका मिश्र धन करना है।“
दो गालियाँ पार की। मैदान पर सूरज चमक रहा है। चूहा चूहेदानी में भी फुदक रहा है।
‘कुछ पल की क़ैद से भला क्या दिक़्क़त।‘ वह निश्चिन्त है कि अभी कुछ पल में आज़ाद हो जायेगा और शाम तक वापस ठिकाने पर पहुँच जायेगा। यह तो हर दूसरे दिन की कहानी है।
मैदान पर नज़र दौड़ाई फिर चूहे को देखा। चूहा ग़ुनाह क़ुबूल करते हुए दुबक कर कोने में हो गया।
‘खुले मैदान में छोड़कर क्या फ़ायदा। यहाँ से तो यह खूब रास्ता पहचानता है। पहले भी तो यहीं छोड़ा था लौट आया।‘ मैदान ख़त्म होने लगा। चूहा उचककर चूहेदानी की जाली में से झाँका और दुबक गया।
‘इस बार ग़लती बड़ी हो गयी । सज़ा तो मिलेगी।‘
आगे मैदान के सामने पक्की सड़क बन रही है। बनती हुई सड़क के किनारे - किनारे आगे बड़ी। अबकी बार कहाँ छोड़ू जहाँ से यह वापस घर ना आये। कंक्रीट धड़ा-धड़ गिराया जा रहा है। रोलर में डामर अच्छी तरह मिक्स हो रहा है। उसमे से गरम-गरम भपका सा आ रहा है। कदम थम गए और अगले ही पल बिना कुछ सोचे चूहेदानी का मुँह रोलर के अंदर बढ़ाकर खोल दिया। चूहा आज़ाद होने की उम्मीद के साथ कूदा और रोलर में घूमते डामर में जा गिरा। गिरते ही डामर में धसने से बचने के लिए उसके नन्हे-नन्हे पैरो ने कोशिश करनी शुरू कर दी। तेज़ी से घूमते रोलर में गाढ़ा-गाढ़ा डामर और इस मुसीबत से लड़ता नन्हा सा चूहा। अचानक ही आयी मौत से ज़िन्दगी बच निकलने की जद्दोजहद में लग गयी। उस नन्ही सी जान के आगे ज़िन्दगी और मौत बराबर आकर खड़ी हो गयी और वह पूरी शिद्दत से ज़िन्दगी को पकड़ने की कोशिश करने लगा।
दिल की गहराई में एक टीस उठी। कुछ ही पल में कई बार उसने घूमते रोलर के अंदर डूबने से बचने की हर मुमकिन कोशिश की। घूमते रोलर के हर एक घुमाव के साथ पूरा घूम जाने के बावजूद भी वह लगातार पैरो को ऊपर खींच रहा था, जो बराबर डामर में चिपके जा रहे थे।
दिल से उठी आह को सुनते ही हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ने बढ़ी ही थी कि उसने मौत के सामने घुटने टेक दिए। हारकर अपनी थूथनी और दो आगे के पैर ऊपर किये हुए लाल-लाल आँखों से मुझे देखते हुए वह डामर में डूब गया। गरम डामर, गरम आसमान और गरम हवा। आँखें डबडबा गयी। पूरे जिस्म से अचानक ही गर्मी निकली और हाथ पैर ठन्डे लगने लगे। रोलर का डामर कंक्रीट पर फैला दिया गया। मौत और ज़िन्दगी के बीच की लड़ाई के कुछ ही पलों ने मुझे ज़िन्दगी का चक्रवृद्धि ब्याज समझा दिया।
डबडबायी आँखें और उदास चेहरा देखकर, “अब क्या हुआ? कहाँ चली गयी थी? कितनी देर कर दी? रानी आयी थी वह तेरी कॉपी में चक्रवृद्धि ब्याज के तीन चार सवाल कर गयी है। उसी को देख कर समझ ले। अब पढ़ने बैठ जा बिजली भी आ गयी है। मूलधन और मिश्र धन सब समझ ले। कुछ बोलती क्यों नही?“
चेहरा उठाकर ऊपर देखा, “मूलधन तो डूब गया।“ आँखों से आँसुओ की लड़ी बह गयी।
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saikakalam29
Nice story
Arvindprajapati.bu
Beautiful and compassionate, this is a very good way to tell the story, the stories based on our life experiences, inspire us too. Keep it up Di..
mohdshaqib.bu
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