JUNE 10th - JULY 10th
वह उस ऑटोरिक्शा में बैठ गई। एक अजब सा विश्वास महसूस हुआ उसे, जैसे कोई अदृश्य सी कृपा हुई हो। अस्पताल से बाहर निकलते ही उसे यह ऑटो दिखाई दिया। ऑटो के पीछे रामदरबार का भव्य चित्र बना था। उसे लगा जैसे ईश्वर उसके साथ है। अब सब ठीक हो जायेगा जल्द ही।
कैसा होता है ना इंसान का मन। विचलन के समय कोई न कोई सहारा ढूंढ ही लेता है चाहे वह कोई चित्र, कोई पत्थर की आकृति, धूल, राख, सिंदूर ही क्यूं ना हो। और कभी यही चीज़ें अलग अलग आयामों में विचलन का निमित्त भी बन जाती हैं।
डेढ़ महीने से ऊपर हो गया है भागादौड़ी करते। अकेले कर रही है वह। एक बेटा है। कॉलेज में पढ़ता है दूसरे शहर में। हॉस्टल में रहता है। थोड़े दिनों के लिए आया था पर इम्तेहान और पढ़ाई के चलते उसने उसे वापस भेज दिया। भाई के घर के आर्थिक हालात उससे छुपे नही हैं। बड़ी मुश्किल से एक छोटी मोटी सी नौकरी जुटी है। मां और भाभी की तबियत भी थोड़ी खराब ही रहती है। कैसे बुलाए उसे? वह अपने मन को आश्वस्त करना चाहती है। आज इस राम दरबार के चित्र ने उसे थोड़ा आश्वासन दे दिया है जैसे राम भगवान स्वयं चल कर आए हों उसकी मदद करने को। आशा, निराशा के झंझावत में उसके मन की नैय्या डोल रही है।
डॉक्टर टी फ्रांसिस के शब्द उसके कानों में अब भी गूंज रहे हैं, "देखिए, मैं आपसे कुछ छुपाना नहीं चाहता मिसेज अग्रवाल, आपके पति की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है। हमने बहुत कुछ करने की कोशिश की, अब भी कर रहे हैं लेकिन सुधार दिख ही नहीं रहा। दरअसल उनकी इच्छाशक्ति जवाब..."
"बस डॉक्टर साहब", सुनंदा अग्रवाल ने रूंधे हुए गले से कहा। "कोई तो उम्मीद..."
"उम्मीद तो उस ऊपरवाले से ही लगाई जा सकती है। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश में लगे हैं। आप हिम्मत मत हारिए और उनकी हिम्मत भी बढ़ाइए। देखिए मरीज की जिजीविषा बलवती हो तो चमत्कार हो सकते हैं। फिलहाल नितिन जी को नींद का इंजेक्शन दिया है। आप इस समय थोड़ी देर के लिए घर जा सकती हैं। हिम्मत रखिएगा और विश्वास भी। मिरेकल्स डू हैपन मिसेज अग्रवाल।" ऐसा कहकर डॉक्टर फ्रांसिस बाहर निकल गए।
सुनंदा ने नितिन के सिर पर हाथ फेर के कहा, "जल्दी से ठीक हो जाओ नितिन। तुम कर सकते हो। मैं थोड़ी देर में वापस आती हूं।" गहरा श्वास छोड़ कर सुनंदा भारी कदमों से अस्पताल के बाहर आ गई। डॉक्टर फ्रांसिस कितनी मदद कर रहे हैं उसकी। वे इलाज के साथ साथ विश्वास का मलहम देना भी नहीं छोड़ते और आज अस्पताल के बाहर आते ही उसे यह भगवान राम के चित्र वाला ऑटो भी मिल गया। सही कहते है डॉक्टर साब, मिरेकल्स डू हैपन।
"पहले मंदिर ही चलेंगी ना बहनजी," ऑटोवाले के इन शब्दों ने सुनंदा के भीतर चल रहे तूफान को तनिक विराम दे दिया।
"आ- आपको कैसे पता?", सुनंदा ने चौंक कर पूछा।
"पिछले कुछ दिनों से मेरे ही ऑटो में तो जा रही हैं आप मंदिर से होते हुए घर।"
"कमाल है", सुनंदा ने सोचा, "रोज इसी ऑटो से जा रही हूं और कभी पहले यह राम दरबार नहीं देखा।"
उसने गौर से देखा। हां आगे वही साईं बाबा की मूर्ति और कुछ ज्ञान उपदेश नीति वाक्य लिखे थे जिनपर उसका ध्यान उड़ती नजरों से ही गया था पर गया था जरूर।
"कर भला तो हो भला"
"रहम करे सो रहमत पाए"
ये सब रोज तो पढ़ती थी।
"अब कैसे हैं आपके पति?", इस बार सुनंदा के चौंकने से पहले ही ऑटो वाले ने सफाई देदी। "आप फोन पर बात करती थी ना, तो..."
"फिक्र ना करें, माता रानी भली करेंगी। लीजिए मंदिर आ गया। आप दर्शन कर आइए। मैं यहीं खड़ा हूं।"
और दिन सुनंदा बाहर से ही हाथ जोड़ देती थी। आज दर्शन करने मंदिर में गई। आज विश्वास आस्था की सीढियां चढ़ रहा था। उसके साथ आज कोई था।
बाहर आकर प्रसाद में मिली मिश्री के कुछ दाने उसने ऑटो वाले की चौड़ी हथेली पर धर दिए।
बिना कुछ कहे सिर से लगा ऑटो वाले ने प्रसाद मुंह में डाला और ऑटो स्टार्ट कर दिया।
पिछले कई दिन से यह क्रम था। मुश्किल समय में लोग सहायता को आगे आते हैं, आज इस सच पर हस्ताक्षर हो गए थे।
यह क्रम जारी रहा।
नितिन की हालत कभी सुधरती कभी बिगड़ती। ऑटोवाला रोज पूछता। रोज़ ढांढस की मिश्री देता। रोज़ मातारानी की महिमा का विश्वास देता। हर दिन सुनंदा उससे अपने सुख दुख साझा करती। बीच में एक बार बेटा भी आया। और वापस भी चला गया। पर ऑटोवाला वहीं था दुख सुख बांटने को। मंदिर, घर, अस्पताल लाने- ले जाने के अलावा, फल, जूस, दूध, सब्जी, दवाई भी ला देता।
नितिन के ऑफिस के दोस्त, पड़ोसी तो थे ही मदद को पर ऑटोवाला! वह बहुत करीबी था। वह नितांत अजनबी था। पैसे लेता था। पर जैसे वह सुखदुख साझा करता कोई न करता। वह सुनंदा का विश्वास था।
वह कभी पीर बाबा की मजार की विभूति ला देता तो कभी, गणपति जी का लाड़ू। बजरंगबली जी को चोला चढ़ा देता तो कभी मजार पर चादर।
मिरेकल्स डू हैपेन। मिरेकल हुआ। डॉक्टर की कोशिशों से हुआ, नितिन के हौंसले से हुआ, ईश कृपा से हुआ, सुनंदा की भागदौड़ से हुआ, उसके विश्वास और आस्था से हुआ, नितिन एक दिन बिल्कुल ठीक हो गया। अगले दिन उसे अस्पताल से छुट्टी मिलनी थी। सुनंदा का बेटा भी आ गया। एंबुलेंस में बेटा पिता के साथ आया। सुनंदा ऑटो वाले के साथ मंदिर होते हुए घर पहुंची।
अब तक संबोधन "भैय्या" था। आज प्रसाद की मिश्री लेने के लिए ऑटो वाले भैय्या ने हाथ आगे किया तो एक क्लांत मुख पर गुलाबी मुस्कान के साथ सुनंदा ने कहा, "अब ये बिलकुल ठीक हैं।" अपने और फिर राम दरबार की ओर इशारा कर सुनंदा ने कहा, "आपके रामजी ने ही ठीक किया है इन्हें।"
"मैंने कहा था ना बहनजी, मातारानी सब भली करेंगी।"
भावुक सुनंदा ने हाथ जोड़ कर सिर हिला दिया। खुद को संयत करते हुए बोली, "आपका नाम क्या है भैय्या?"
"रहमत रज़ा"
सुनंदा ने रहमत भाई के दोनों हाथ पकड़ लिए।
इस बार भावुकता का निर्झर रुक ना पाया। रहमत की हथेलियां सुनंदा के अश्रुजल से भीग गई। रहमत पीछे को खिसकने लगा। "बहन जी क्या कर रही है? सब देख रहे हैं मैं तो बहुत छोटा आदमी हूं।" पर सुनंदा ने उन हाथों को और कस के पकड़ते हुए कहा।
"आप और छोटे आदमी?"
"आप तो राम जी की रहमत हैं मेरे भैय्या।"
रहमत भाई ने बिना कुछ कहे सुनंदा के सिर पर हाथ फेर दिया।
और उस दिन सावन की पहली बारिश हुई।
©गरिमा जोशी पंत
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