ब्रेड 65

वीमेन्स फिक्शन
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ब्रेड 65

कितनी भी सुंदर आकांक्षा हो ,मन की बांबी से फुफकारते हुए निकलती है ।अनजाने सुख की तितिक्षा से भरी पोटली काँख में दबाए दौड़ता है हर मन !

मन के आंगन में अक्सर समय और स्मृति की प्रेमिल सगाई होती है ,गाहे-बगाहे इस उछाह से उर्जा संजोते पता नहीं चलता ,कब-किस बात से चार्ज हो जाए ये जीवन।

बैंगलोर में इतवार की सुबह उस दिन भी देर से जागी , हम जैसे कई युवा नींद का उत्सव मना रहे थे। पूरे हफ्ते का चार्जर था रविवार , मशीन में कपड़ों का अम्बार था ,किचन में बर्तनों का , हमारी चटकोरी जीभ को नये स्वाद का इंतजार .. सच, हम तीन लड़कियाँ माँ को और उनके बनाये पकवानों को ठीक इसी वक्त शिद्दत से याद करती थी। रविवार पिता का भी था , नाश्ता बाहर से आता और हमारी सुबह घर भर में नाचती-कूदती ।

शहर भी कहाँ छूटा , मान्या के शहर इंदौर के पोहे, मैं यानि रोमा के जयपुर की जलेबी और करिश्मा के दिल्ली के समोसे सब मिलते हैं यहाँ। आल टाइम करारा सांभर-इडली तो है ही। इस अजनबी शहर में अपने शहर का खानपान ढूंढते हैं पर अहसास नहीं, उन्हें परे छिटकना जाने-अनजाने हमारी आदत में कब शुमार हुआ और घर से आये फोन पर बातें छोटी होती गई । थका देने वाली इंटर्नशिप और तगड़े कम्पीटीशन वाली नौकरी हासिल करने के बाद इस सच को स्वीकार करने में बिल्कुल भी देर नहीं लगी कि अपना नीड़ छोड़कर उड़ रहे हम विराट आकाश में..

पर आज का रविवार किसी मध्यमवर्गीय परिवार के सोमवार की तरह था, सुकून गायब था।

हर छुट्टी वाले दिन की तरह आँख बंदकर अलसाई हुई करिश्मा ब्लूटूथ से मोबाइल पर लोकल न्यूज़ सुन रही थी ,अचानक वह चिल्लाई, उसके अगल-बगल पसरे मैं और मान्या खुलकर हँसे , कान में हैंडसेट होने पर वह हमेशा जोर से बोलती थी ,पर आज बेड पर हैंडसेट फेंकते हुए बोली- दो समुदायों में झड़प के कारण बैंगलोर में तीन दिन कर्फ्यू ।

सच कहूँ तो पहला ख्याल यही आया कि गोली मारो ऐसी जिन्दगी को ,हम यहाँ अपने करियर संवारने के जिंदगी के सबसे मुश्किल प्रश्न को हल करने की कोशिश में जुटे हैं और ये मुट्ठी भर लोग हैं कि जियो और जीने दो का सलीका तक नहीं सीख पा रहे। नाना कहते हमारे भीतर के जल को हरा करती बहती नदी हमारे जीवन की सबसे बड़ी ताकत । मान्या की दादी ने उसे एक ही मन्त्र दिया- धरती के कोने –कोने को उर्जा (चार्ज) सौंपता है जगच्चक्षु (सूर्य )और करिश्मा जीव सेवा को ही धर्म और अपनी शक्ति मानती है ।

कितनी सुलझी हुई हैं मेरी दोस्त ।

कर्फ्यू यानि दो दिन वर्क फ्रॉम होम होगा ,जिसमें पाजामा पहनने के सुख के अलावा बाकी बाल्टी भर दुःख हैं ,10 घंटे के बजाय 16 घंटे ऑफिस चलता है । आराम से नहाना -खाना –कसरत भूल जाओ ,समय सबकी बलि मांगता है। हाँ ,बैंगलोर में ऑफिस से दूर रहने वालों को ट्रैफिक के जंजाल से मुक्ति मिलती है .अपने शहर ,अपने घर रहने का अच्छा जुगाड़ है ।बैंगलोर में के आर पुरम( कृष्ण राजपुरम ) के टी सी पालिया (थम्बूचेट्टी पालिया ) की ये पॉश कालोनी ,जहाँ अपार्टमेंट के किराए ज्यादा थे पर सुरक्षा और ऑफिस से नजदीकी के कारण हम तीनों ने यह इलाका चुना था । इंटर्नशिप के दौरान हम तीनों की इसी ऑफिस में मुलाकात हुई थी ।

करिश्मा ने न्यूज़ स्पीकर पर लगाई और नई खबर मिली ,दो दिन इंटरनेट बंद ,हा-हा असली छुट्टी ,इंटरनेट के बिना ऑफिस भी बंद।

मान्या के मोबाइल पर माँ तुझे सलाम की रिंग टोन ये बताने के लिए काफी थी कि फोन उसके घर से आया है और ठीक दस बजे हैं। ये हमेशा की तरह मिस कॉल थी। करिश्मा ने स्पीकर ऑन कर फोन मिलाया ।

नी वू कड़ी मारे वे संख्य सद्यके च बिज़ी आगी दे (डायल किया गया नम्बर व्यस्त है ) - कन्नड़ भाषा में आपरेटर की आवाज़ इस एक साल में हमारे लिए अजनबी नहीं रही ,यह हमारे मन को भी बैंगलोर की धरती पर ले आती थी ,कुछ तो था इस शहर में ,ये शहर सोता नहीं था ,दिन-रात ट्रैफिक में दौड़ता ,रेंगता शहर,हमें जॉब देने वाला शहर।

मध्यमवर्गीय संवेदनाओं के तार काट कर उच्चवर्गीय समृद्धि के सपने दिखने वाला शहर !

हम तीनों के अधिकांश दुःख साझे थे और सुख भी, माता-पिता अपनी मेहनत से मध्यम वर्ग से उच्च मध्यमवर्ग की ओर बढने के लिए लालायित ।

करिश्मा दूसरे कमरे में पहुँच कर चिल्लाई- चार्जर कहाँ हैं.....

हम तीनों के मोबाइल भी दोस्त थे ,तीनों हमारी सर्चिंग -सर्फिंग से बेहोश होकर एक ही चार्जर से जिन्दा होते ,हमारी एकता की अदम्य मिसाल था नन्हा चार्जेर ,अब किसी को यह भी याद नहीं था कि मूलतः वह किस मोबाइल के साथ आया था । बाकी दोनों चार्जर की तार खराब हो गयी थी ,और वह इकलौता चार्जर गायब था जिसे दूसरे कमरे में करिश्मा बेसब्री से ढूँढ़ रही थी ।

मैने लेटे- लेटे अपने फोन की बैटरी देख तसल्ली कर ली और अपनी कल्पना में उस कमरे का जायजा लेने लगी ,प्लग दरवाजे के पास है, उसके पीछे पुरानी प्रेस और उसकी मेज । मान्या ने कल सुबह प्रेस लगाई थी,वह अपने कपड़ों की हर क्रीज पर बड़ी सचेत थी , प्रेस किये कपड़ों पर प्रेस फेरना, पहले-पहल मुझे ये पागलपन लगता था ,पर फिर मैने जाना ठीक उसी समय वह किसी विचार में थिर रहती थी। दिन की मुश्किलों से निबटने की हमारी तैयारी में निमग्न वैचारिक तन्द्रा ,यंत्रवत आदतों से जुडती जाती है,है ना !

चार्जर की खोज जारी थी...

चार्जर प्रेस वाली टेबल पर है .....

नहीं मिला .....

दो कमरों के इस अपार्टमेंट में कुछ सुविधाएँ हमें विरासत में मिली थी ,फिलहाल हम तीनों अपने इस ठिकाने में हमारे मोबाइल का जीवनदाता ढूँढ़ रहे थे ।

चार्जर तो मेरा मोबाइल भी मांग रहा ,मान्या के यह कहते ही मैने अपने मोबाइल को देखा, वहां भी राहत की सांस फूलने को थी ।

जल्द ही हम तीनों ने छुट्टी के दिन का मोर्चा सम्भाल लिया ,हर रविवार हमारी मदद के लिए आने वाली मेड आज कर्फ्यू की वजह से नहीं आ सकती थी ,मैंने मशीन में कपड़े लगाये और ब्रंच बनाने लगी । मान्या ने बर्तन सम्भाले ।करिश्मा ने डस्टिंग- झाड़ू सम्भाली और चौकस निगाह से चार्जर ढूँढ़ने लगी ।

इस रविवार का संगीत हमारी ज़िन्दगी से गायब हुआ तो लगा कि मेड ,इंटरनेट और चार्जर हमारे दिन की ख़ुशी का माकूल जवाब हैं ।

अपने अगले कदमों की भूमिका काफी के आखिरी घूँट में नापकर सबसे पहले मेरे मोबाइल से हम तीनों के घर मैसेज किया कि हम ठीक हैं ,यह इलाका सुरक्षित है ,हमारे पास एक हफ्ते का राशन है ,पाउडर मिल्क है, चिंता करके फोन न करें, क्योंकि लाइट जा -आ रही है , चार्ज होते ही फोन करेंगे । फिर सम्भावित कोने ढूंढे ,जहाँ चार्जर मिल सकता था ।

हम सब उन कोनों में थे जहाँ हमारे शहर- घर का सामान रखा था। एक पल में स्मृतियों का जितना जखीरा झटक सकते थे ,उतना ही छुटकारा मिला ,पर चार्जर नहीं मिला।

अचानक करिश्मा ने अपना ऑफिस बैग टटोलते हुए कहा -आई एडमिट माई मिस्टेक,

चार्जर ऑफिस में छूट गया ।

हम दोनों ने उसे खा जाने वाली नजरों से घूरा ,वह बुद्ध की तरह फर्श पर बैठी थी । सबसे ज्यादा बार वही गाने -न्यूज़ सुनती और अपना फोन चार्ज करती थी ।

जिस बिल्डिंग में हमारा अपार्टमेंट था, वहाँ ऊपर के कमरे में दो लम्बे बालों वाले नशेड़ी जैसे दिखते लड़के रहते थे और नीचे इस घर के मालिक का परिवार ,हमारे आसपास के कमरे खाली थे,मालिक मकान कल सुबह ही परिवार सहित छुट्टियाँ मनाने तिरुपति व् रामेश्वरम गये थे । सामने वाला घर जिस क्रिश्चन फैमिली का था ,वे अक्सर पूरा घर बंद करके गोआ चले जाते थे ,जहाँ उनका दूसरा घर था । थोड़ी और आगे मैदान था और मैदान के पार एक स्कूल, जिसकी बिल्डिंग के उस पार हमारा ऑफिस था,जहाँ चार्जर था।

तय हुआ कि तीनों मिल कर ऊपर वालों से चार्जर मांगते हैं ।दस मिनट तक घंटी बजाने के बाद भी कोई बाहर नहीं आया तो हम थके क़दमों से नीचे उतर गये । आसपास दुकाने बंद थी ,कम आबादी वाली इस जगह के खाली मैदान की हरियाली अब चुभ रही थी । हम अपने शहर के पड़ोस को याद में खोये मान्या की बात सुन रहे थे,इंदौर में सारे घर सटे हुए थे ,हलवे की महक से लेकर बच्चों को डांटने की आवाज़ें आवाजाही करती थी ,हाँ कुछ बदला भी ,हलवे की जगह भाजी और बूढों के खंखारने भर पर उन्हें बच्चों द्वारा टोकने की आवाज़े आने लगी । तीखा शोर वाला म्यूजिक चलेगा ,बुजुर्गों के बेहिसाब ठहाके नहीं। क्या यार ,हम चार्जर ढूँढ़ रहे हैं ,बुजुर्ग हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी का जरूरी चार्जर हैं ,माँ पापा भी, जिनके बालों में चाँदी हमारी व्यस्तता और तनाव देख बढ़ती जा रही। बहन, भाई, दोस्त अब मोबाइल पर मिलते । ये मोबाइल कब हमारी जिन्दगी का चार्जर बन गया भई ।

गुम लोग,खोये हुए विचार जब मिल जाते हैं तब बेरंग जिंदगी में इन्द्रधनुष छाने लगता है।करिश्मा इंटर्नशिप की नोट्स डायरी में अपने हाथ से लिखा वह कोड ढूंढ रही थी,जिससे बिना चार्जर के मोबाइल चार्ज हो सके ,और मान्या खिड़कियाँ खोल, जी भर कर सिंदूरी शाम को निहार रही थी।

हम अपना ब्रंच खाने लगे, उस दिन मैंने ब्रेड 65 बनाया था ,जिसमें गिनती की पैंसठ चीजें नहीं थी,पर फिर भी वह चटपटा था ।

जिन्दगी का कुछ भी नाम रख दो यारों ,पर गिनना नहीं ,कुछ तो छूटेगा ही !

हरेक दिन अपनी मुट्ठी खोलेगा और रात एक प्रश्नचिन्ह नीले भरम पर टांक देगी !!

सोनू यशराज

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