वस्त्र बदलने से धर्म नहीं बदलता

फंतासी
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बात सालों पहले की है
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जब राहे विरान और सुनसान हुआ करती थी।उन राहों की अन्तरात्मा उन्हे कचोटती ,उन्हें नोचती, आखिर क्यों कोई इन राहों पर अपना कदम नही बढ़ाता ,क्यों कोई भी पथिक गुजरता नहीं इन रास्तों से !

दिन गुजरा, लम्हों ने अपना करवट बदला एक सुबह झूमता नाचता, मुस्कुराता,अनजानी खुशियाँ बिखेरता ,फूलों से खेलता चिड़ीयौं से बातें करता एक पथिक बड़े साहस और आंखों में ढेरों सपने लिये उस राह पर कदम बढ़ाये चला आ रहा था।

राहे ज़िन्हे बडी बेसबरी से किसी पथिक का इंतेजार था उन्होने उस अनजाने पथिक पर निगाहें टीका ली और पहचान लिया ये मस्तमौला एक आशिक है ना जाने क्यों उन राहों ने अपनी भौहें तान ली और घूर कर उस आशिक की और देखने लगे। उन राहों ने खुद में कानाफुसी तेजी से की...

अरे ये तो आशिक है ज़िसने सब के अस्तित्व को अक्सर हिला दिया है।अगर आज ये हमारी राह से गुजरा तो फिर हमारी अस्तिव भी मिटा देगा।ये मोहब्बत के गीत गायेगा ,फूलों से खेलेगा ,हवाओं में फिर मोहब्बत की धुन बजेगी,सब कुछ बदल जयेगा सब कुछ ।

"नहीं ..नहीं हम ऐसा नहीं होने देंगे ,हाँ हमे इन्तजार है की कोई हमारे राहों पर अपना कदम बढाये पर वो आशिक नहीं हो सकता कभी नहीं .."

"अरे ओं आशिक ठहर जा किसकी इज्जाजत से तू हमारी राह पर मदमस्त पागल हाथी के समान बढा चला आ रहा है,लौट जा वापस जिधर से तू आया है ,तू पागल है ,आवारा है तू ,बदनाम भी है।
तेरे रहने से सबको परेशानी होगी क्यों अपनी खुशी के चाहत में दुसरे के लिये परेशानी खड़ा करता है जा हमारी राह को छोड दे हो सके तो तू दुनिया ही छोड दे भाग जा यहाँ से ......"

अपने लिये सुनी पहली बार इन बातों ने उस आशिक को विस्मित सा कर दिया ,कानों में लगातार उन रास्तो की बाते गुंजने लगी ।
दिल ना जाने क्यों बेतहासा मचलने लगा ,पांव ठहर गये खुद ब खुद दिशा वापसी की और मोड ली उसने,

पर अब तक हर राह ने सारी बातें सुन ली थी ।
अब तो हर राह ना जाने क्यों बगावत पे उतर आये। सारी राहों ने बेदर्दी से उसी बातों को दोहराना शुरू कर दिया ...
आशिक हर और भागता पर हर रास्ते उसे विस्मित,विचलित,बेचेन ही कर रहे थे !

"ऐसा क्यों"

आखिर कोई राह अपनी ना दिखने पर सामने बहती नदी को ही अपना राह बनाने पर उसे विवश होना पडा ...

नदी की धार के साथ वो बहने लगा यहां उसे बड़ा शुकुन मिला (माँ) की गोद सा। उस नदी ने बड़े प्यार से उसके माथे को चुमा ,उसे दुलारा
और कहा....

"मेरे प्यारे बच्चे मुझे कहते हुए बडा दुख प्रतीत हो रहा है कि तुम्हे मैं अपनी राह पर राह नहीं दे सकती कारण मैं भी किसी राह पर बहती हूँ और मेरी राह से तो ना जाने कितनी और भी ज़िन्दगीया जुडी है।तू तो आशिक है मुझे तुझ पर यकिन है तू अपनी खुद की एक राह बनायेगा !

नम आँखो से उसने नदी की राह से अलग होना ही ऊचित समझा।
सामने हरे घांस की मैदान थी ,खूब खेला करता था यहां बचपन में, ये मित्र थे उसके कभी।।

उसने उस मैदान को अपनी राह बनाया। मगर समय का पहिया प्रवर्तित हो चुका था अब वे भी उसे आशिक की ही नजरों से देख रहे थे ना की बचपन का मित्र।

उस मैदान से बहुत अनादर मिलने के बाद सामने खड़े पर्वत को देख आशा की छोर दिखी
चोटी पर चढ़ गया वो,
महसुस हुआ पिता के काँधों का सहारा मिला मगर काश की प्रभु ने आशिकों के कल्पनाओं को सच होने की शक्ती दी होती।

आखिरकार उसने थक हार कर ईश्वर को याद किया।।
ईश्वर - "है मानव, मुझे क्यों याद करता है जब लोगो में धर्म के कतार में लगने की होड लगी थी।(हिन्दू-मुसलिम-सिख-इसाई) तो तू अलग ही कतार बना रहा था (आशिकी ) की
और इस कतार पर तो मेरा भी जोर नहीं"

इस लिये मुझे खेद है की मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता ..।

निराशा के बादल उसके सर पर मंडरा रहे थे! उसके ज़ीवन का ये प्रवरतित काल उसे तनिक भी रास नहीं आ रहा था छन भ़र में सब क्यों परीवर्तित हो गया ,क्यों सब उसे अपना बैरी समझ बैठे ..क्यों? ..ऐसा क्यों ?

का कोई उतर ना मिलने से मौत को ही गले लगाना ऊचित समझा उसने ...और उस पहाड की चोटी से उसने छालांग लगा दी ,घास के हरे मैदान उसके रक्त से लाल होे उठे पर अफसोस की मौत ने भी उसे गले ना लगया ..कुछ दिनो तक बेशुध पडे रहने के बाद जब उसे होश आया तो उसने उठने की चेष्टा की उसके वस्त्र खुन से सने हुए थे मैदान की मीट्टी ,खुन से गीली हो वस्त्रों से चिपकी हूई थी घास के मैदान उसे बुरा भला कहने लगे ..

"देखो तुमने हमें गन्दा कर दिया, हरे रंग को लाल रंग की कोई दरकार नहीं अरे ओं बेशर्म अब तो चले जाओ"..

गिरता पड़ता वह
वहां से बस आसमान की और नीगाहे किये हुए चला जा रहा था !अंततह फिर एक बार वह वही पहुँच गया जहाँ से सब शुरु हुआ था , उन राहो ने उसे देख पहचान लिया और ठहाके लगाने शुरु कर दिये (हमने कहा था ना तुम अभागे हो,बुरे हो,दुख में जीने वाले हो...देखो खुद को ,क्या दशा हो गयी तुम्हारी,

अपने कपड़ो को देखो, हमने कहा था ना यहाँ ना आना तुम फिर भी चले आये
उस पल की दशा उस पथिक की ,
शायद कोई पथिक ही समझ पाये ।

आखिरकार उसने सोचा क्यो ना अपने वश्त्र को उतार दुँ शायद फिर ये उसे पहचान ना पाये और उसने अपने वश्त्र उतार के फेंक दिये।

पर अफसोस ..

"वस्त्र बदलने से धर्म नहीं बदलता"

राज सिद्धि

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