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Nilesh Sankrityayan

Writer
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लिखे हैं मैंने ख़त तुम्हें वक़्त मिले तो पढ़ लेना

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 106 | Likes: 0

लिखे हैं मैंने ख़त तुम्हें वक़्त मिले तो पढ़ लेना इनमें हर पल की याद है,हर याद के हिस्से हैं कुछ मेरे होठों की बात है,  Read More...

Published on May 5,2020 07:53 PM

हम फिर एक नए युग की ओर बढ़ जाएंगे

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 117 | Likes: 0

देख रहा है दूर क्षितिज पर खड़ा सवेरा एकटक उपहास करती स्याह रात्रि को अब जल्द ढलना होगा, मुस्काएगी ज़िन्दगी दुबारा,   Read More...

Published on Apr 14,2020 12:10 PM

प्रेयसी

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 91 | Likes: 0

प्रेयसी की आंखों में काजल देख मैं भरमाया सब्र का बांध तोड़ मैं उतर गया, आंखों ही आंखों में, देख यह ललित दृश्य दूर बैठ  Read More...

Published on Apr 13,2020 05:57 PM

कमबख़्त झुमका

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 95 | Likes: 0

मन है बेचैन इस भीड़ में हमने खुद को तन्हा पाया है रुठ गई हो किस्मत जैसे, काले शैतान समान अंधेरा छाया है एक पल को सुनाई  Read More...

Published on Apr 13,2020 03:52 PM

महबूब

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 91 | Likes: 0

महबूब वो जो अपनी मनोरम मुस्कान से उसके सारे दुख मिटाए जो भीड़ में चलते हुए अपनी बांह की आड़ बनाए जो तपती दुपहरी में   Read More...

Published on Apr 12,2020 03:14 PM

तुम्हारा तिल

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 93 | Likes: 0

मंत्रमुग्ध हो गया हूं तुम्हारी अदाओं पर तुम्हारे हुस्न के,कुछ यूं चर्चे हज़ार हैं जो दूर रहो तो ध्यान भटकाती है, कर  Read More...

Published on Apr 12,2020 03:11 PM

सुख की परिभाषा

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 101 | Likes: 0

आंनद , सुख क्या है?  जैसे भोर में सुनाई दे पक्षियों की चहचहाहट, जैसे दिसंबर की सर्दी में धूप की गर्माहट, जैसे वसंत ऋत  Read More...

Published on Apr 12,2020 03:09 PM

एक बूढ़ा

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 99 | Likes: 0

शीत ऋतु की सर्द रात उस मोड़ पर बैठा एक बूढ़ा अर्धनग्न बदन लगभग सत्तर का वो होगा गमछा,डंडा हैं उसके धन ताकता कभी तारो  Read More...

Published on Apr 12,2020 03:05 PM

रुका नहीं हूं

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 97 | Likes: 0

तू पर्वत सा विराट खड़ा मैं अभिमान को तेरे देख डरा देख उठा के सर अपना ले नदी मैं बनकर तेरी ओर बढ़ा खोद सुरंग तेरे गुमा  Read More...

Published on Apr 12,2020 02:59 PM

हां,वह एक लड़का है

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 166 | Likes: 0

हां,वह एक लड़का है ख्वाहिशें तो हैं उसकी भी मगर बताने से वह डरता है समाज ने कहा कठोर बनो कभी ना टूटे वो डोर बनो तुम्ही  Read More...

Published on Apr 12,2020 02:53 PM

क्या हुआ?

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 104 | Likes: 0

क्या हुआ गर कोई तेरे साथ नहीं? क्या हुआ गर मंज़िल अभी पास नहीं? अकेले हीं निकले थे इस मार्ग पर कठिनाइयों से घबराते हो   Read More...

Published on Apr 12,2020 02:51 PM

निर्भया

By Nilesh Sankrityayan in Poetry | Reads: 105 | Likes: 0

       निर्भया के पिता आपसे कुछ कहना चाहते हैं। पूजा मैंने कई देवताओं को,धन-धान्य का दान किया तब जाकर देवी के रू  Read More...

Published on Apr 12,2020 02:43 PM

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