JUNE 10th - JULY 10th
"आप मेरी रिपोर्ट क्यों नहीं लिख रहे हैं।" सुनैना ने कहते हुए जोर से मेज पर हाथ की थाप दी। जिद्द तो ऐसी थी कि पूरा थाना हिला दे। किन्तु यहाँ विराजमान दो कांस्टेबल पर सब कुछ बेअसर था। एक कांस्टेबल जी हँसी के मारे बत्तीसी दबाये हुए हिल रहे थे तो दूजे जनाब सुनैना पर आँखे गढ़ाकर अपने गुस्से को शांत रखे हुए थे।
सुनैना की आँखों में ना केवल क्रोध की ज्वाला धधक रही थी अपितु साथ ही आँसुओ का सैलाब भी उमड़ रहा था। चेहरा लाल और आंसुओ से लथपथ था। उसकी आँख और नाक दोनों रो रही थी।
एक स्त्री आपके सामने रो रही हो तो यह दृश्य वाकई काफी दुःखद होता है किन्तु सामाजिक सुरक्षा का जिम्मा उठाये हुए कांस्टेबल केदार जी के लिए हँसी रोक पाना मुश्किल था।
सुनैना ने बहती नाक अपनी कोहनी ले जाते हुए आस्तीन से पोंछी। उसके सारे कपड़े गीले थे कोई भी देख यह बता सकता था कि वह अभी अभी किसी दरिया में नहाकर आई हो। "उसने मुझे धोखा दिया है। मुझे यह बर्दाश्त नहीं हो रहा है।" सुनैना फिर से चीखी।
“शांत रहिये मैडम ! पुलिस थाना है आपका घर नहीं। आपका वाक्या थोड़ा अजीब है साहब को आने दीजिए। वही आपकी रिपोर्ट लिखेंगे।“ एक सख्त लहजे में युवा कांस्टेबल राजवीर ने कहा।
"कहाँ है आपके थानेदार साहब?" सुनैना ने सुबकी लेते हुए पूछा। उसका गुस्सा धीरे धीरे शांत हो रहा था।
"वाइफ को शॉपिंग कराने गए हैं। कल बेबी शावर का कार्यक्रम है आप वहां आराम से बेंच पर बैठिये आते ही होंगे।" कांस्टेबल केदार जी ने अपना मुस्कुराता हुआ मुंह खोला।
सुनैना बेसहारा नजरों से दोनों कांस्टेबल को घुर्र रही थी। कांस्टेबल राजवीर ने नोटिफिकेशन की रिंग के साथ अपनी निगाहें मोबाइल पर फोकस की और केदार जी ने भी ध्यान हटाकर आदतन रूप से जर्दा रगड़ना शुरू कर दिया। किन्तु सुनैना को बेंच पर बैठना नागवार गुजरा। वह वहीं राजवीर जी के सामने खड़ी होकर दोनों को देखती रही।
"अरे केदार जी ये सामान लेना जरा।" थाने के बाहर से एक आवाज आई। "हाँ आया साहब" जवाब देते हुए केदार जी तुरंत बाहर की ओर गये।
राजवीर जी उठकर दूसरी कुर्सी पर विराजमान हो गए। यह थानेदार साहब की डेस्क थी। इसलिए अब जरूरी था कि राजवीर जी अपनी जगह लेंवे। कांस्टेबल राजवीर और केदार के लिए थानेदार जी की डेस्क के बगल ही दो कुर्सियां व टेबल लगी थी।
"राजवीर आज तो जेब खाली हो गई हम पुलिस महकमे वाले लोगों की जेब खाली करवा देते हैं और घरवालियां हमारी।" थानेदार जी ने दरवाजे से आते हुए राजवीर से बोला। उनके हाथों में कुछ पॉलीथिन बैग थे। साथ ही थानेदार जी के पीछे पीछे चले आ रहे केदार जी ने एक कार्टून हाथ में उठा रखा था।
"साहब जी बुजर्गों ने यूँ ही ना कहा ‘भूल गए राग रंग भूल गए छकड़ी, तीन चीजें याद रही नून तेल लकड़ी’।" कांस्टेबल केदार ने कार्टून को राजवीर की टेबल पर रखते हुए कहा।
“सही फरमाए केदार, तु बढ़िया है जो कुंवारा ही रह गया। ये मैडम कौन है वैसे? बैठिये मैडम जी " थानेदार जी ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए कहा।
“फरियादी है " राजवीर ने जवाब दिया।
"सुन लीजिए आप भी" एक दबी हंसी में केदार राजवीर की ओर देखते हुए।
"हाँ तो मैडम !" थानेदार जी के सुनैना की तरफ देखने के साथ ही वह थानेदार जी के मेज के सामने बैठी। "केदार पानी ला इनके लिए, काफी डरी हुई सी लगती हैं।"
"जी जनाब" कहकर केदार उठा और मटके की ओर गया।
"सर उसने मुझे धोखा दिया है। आप मेरी रिपोर्ट लिखिये।" इस बार सुनैना शांत होकर बोली किन्तु गुस्सा उसके अंदर उमड़ रहा था।
"आपका नाम मैडम"
"सुनैना ......... सुनैना रस्तोगी"
"हम्म्म…अच्छा, किसने दिया धोखा?" कहते हुए थानेदार जी ने केदार की तरफ देखा वह पानी का गिलास लेकर मेज की और बढ़ रहा था।
“मेरे बॉयफ्रेंड ने" सुनैना रस्तोगी ने जवाब दिया और जवाब के साथ ही केदार जी की फिर से मुस्कान।
"ओह तो रस्तोगी जी। आपके विश्वास का खून किया है किसी ने। क्या नाम है आपके इस बॉयफ्रेंड का ?"
"विश्वास" सुनैना ने जवाब दिया और पानी का गिलास रखते हुए केदार जी का हाथ हिल गया उनके मुंह से फिर हँसी फुट पड़ी। मेज पर पानी हो गया।
"ध्यान से केदार, और मेरे लिए पानी कौन लेकर आयेगा" थानेदार जी एक तानाशाही अंदाज़ में।
"धोखा खाने की कहानी और भी इंटरेस्टिंग है सर जी" राजवीर बोला। "ये कपड़ा लो केदार जी" राजवीर ने मेज के पानी को पोंछने के लिए एक कपडा केदार की ओर उछाला।
"हाँ तो मैडम क्या हुआ थोड़ा खुलके बताइये"
"सर उसने और मैं ने साथ मरने की कसम खाई थी" सुनैना के कहते ही थानेदार जी ने एकाएक ध्यान से सुनैना के चेहरे को देखा। "और हम नर्मदा ब्रिज पर पहुँच गए। नदी का बहाव तेज था।"
"कितनी बजे की बात है ?"
"सर उस समय तक़रीबन सुबह के 4 बजे थे, ब्रिज सुनसान था। ब्रिज पर लगी लाइट्स से नीचे की गहराई व उफनते पानी को देखा जा सकता था।"
"क्या ऊँचाई रही होगी रस्तोगी जी ?"
"सर 30 से 40 फ़ीट है माँ नर्मदा से पुल की ऊँचाई " सुनैना के जवाब देने से पहले ही कांस्टेबल राजवीर बोला।
"सर नदी के शोर से ही डर लग रहा था फिर भी मैं अपने वादे पर अटल थी। हम दोनों ब्रिज की दिवार पर चढ़ गए। नीचे देखने पर एक भयावह रूप माँ नर्मदा का था सर। किन्तु उस कुत्ते ने ......... " कहते हुए सुनैना सुबकने लगी। उसकी आँखों से आंसूओं की धारा बह निकली।
“पानी लीजिए" दिलासा भरे अंदाज़ में थानेदार जी ने पानी का गिलास सुनैना के करीब खिसकाया। सुनैना कुछ पल रुकी और पानी पिया।
“हाँ तो क्या किया उस कुत्ते ने आपके साथ ?" थानेदार जी ने पूछा
"सर हम जब ब्रिज की दीवार पर थे तो मैंने फिर से उसको पूछा। कि वह मेरे साथ आत्महत्या करने को तैयार है ना। वह कूदेगा ना मेरे साथ। उसने मुझ से वादा किया।"
"फिर क्या हुआ ?"
"फिर मैंने नदी में छलांग लगा दी?"
"यह छलांग आपने अकेले लगाई?"
"हाँ सर, लेकिन जब मैंने ऊपर देखा तो विश्वास वहीँ खड़ा था मैं बहाव के साथ पुल के एक तरफ से दूसरी तरफ बहती चली आई। मैंने देखा विश्वास उस समय तक भी नहीं कूदा था। बल्कि वह भी ब्रिज के दूसरी ओर से आकर मुझे देखने लगा। मैं पानी के बहाव के साथ बहे जा रही थी और वह मुझे बस देखे जा रहा था।"
"तो मैडम आप को साथ में हाथ पकड़ के कूदना चाहिए था ना, गलती आपकी भी है। साथ मरने के लिए साथ में हाथ पकड़ के कूदना चाहिए था।" कॉन्स्टेबल केदार ने ऐसे कहा जैसी की बहुत समझदारी वाला तर्क उसने रखा हो। थानेदार जी केदार को देखने लगे।
"यह क्या नॉनसेन्स है केदार जी, राजवीर समझा इनको यार। हाँ तो मैडम फिर आपको बचाया किसने ?" थानेदार जी गंभीरता लेते हुए।
"सर में कुछ दूरी तक बहने के बाद तैर कर बाहर आ गई ?" सुनैना ने मासूमियत से जवाब दिया।
राजवीर और केदार की दबी हुई हंसी पुलिस थाने में सुनी जा सकती थी। थानेदार जी ने अपना माथा पकड़ लिया। "तो मैडम आप को तैरना आता है।"
"हाँ सर"
"और आपके बॉयफ्रेंड विश्वास को "
"नहीं उस नमूने को आता ही क्या है? ढंग से प्यार तक नहीं कर सकता वो "
"और आप उसे मरना सीखा रही थी "
"पानी में मैं कूदी हूँ सर, दिल मेरा टूटा है, उसका क्या फिर मिल जाएगी कोई नई, लेकिन क्या मैं अब किसी से प्यार कर पाऊँगी, मेरे उस भरोसे का क्या, जो मैं ने विश्वास पर जताया था।"
"आपका बॉयफ्रेंड विश्वास आपके साथ मरने का इच्छुक था ?"
"साथ जीने मरने की कसम खाई थी उसने मेरे साथ सर। हमेशा बोलता था तेरे लिए जान भी दे सकता हूँ। लेकिन देखो उस कायर को साथ में जब जान देने की बारी आयी तो डर गया।"
"आप मेरी रिपोर्ट लिखिए सर, मेरा रोम रोम गुस्से से उबल रहा है। मुझ से यह चीटर बिलकुल बर्दाश्त नहीं हो रहा है। इसने मुझे धोखा दिया है मेरे प्यार का अपमान किया है। झूठे वादे किये और मुझे अपने नकली प्यार में फंसाया है।"
"राजवीर !" थानेदार जी ने आँखों के ईशारों से कॉन्स्टेबल राजवीर की राय जानना चाहा।
"मामला तो गंभीर है मैडम "
"तो विश्वास के खिलाफ आप मेरी रिपोर्ट लिखिए"
"नहीं हम उसके खिलाफ रिपोर्ट नहीं लिखेंगे।"
"व्हाई ? आप यहाँ के थानेदार है आपका फ़र्ज़ बनता है फरियादी की बात सुनना और उसकी शिकायत को दर्ज करना। आप ऐसा कैसे कर सकते हैं ?" सुनैना रस्तोगी ने कुछ जोर से कहा।
"मैडम आप पहले शांत रहिये और सुनिए। बात यह है कि इस मामले में विश्वास से ज्यादा गंभीर चार्ज आप पर तय होते हैं। पहला तो यह कि किसी को खुदखुशी को उकसाने के लिए IPC की धारा 306 है जो कि आप पर साफ साफ लागू होती है। आपने अभी खुद बताया विश्वास से सुसाइड के लिए वादा करवाया और उसे नर्मदा के ब्रिज तक लेकर गई। दूसरा आत्महत्या की कोशिश करना यह धारा 309 के तहत आता है जिसके तहत वैसे ही एक साल की जेल व जुर्माना है। और किसी को मारने का षड़यंत्र भी यहाँ साफ़ साफ़ बनता है जो की IPC की धारा 308 के तहत आता है।"
"मतलब आप रिपोर्ट दर्ज नहीं करेंगे "
"जी नहीं, किन्तु आप अपनी फरियाद लेकर आई है तो हम निश्चित रूप से विश्वास के द्वारा माफ़ी मंगवा सकते हैं। इससे ज्यादा हम कुछ करते हैं तो फिर आप भी परिणाम के लिए तैयार रहें " केदार इनके बॉयफ्रेंड के नंबर ले और फ़ोन लगा के यहाँ बुला उसको।" सुनैना चुप रही वह विषय की गंभीरता को समझ चुकी थी किन्तु उसको विश्वास से बदला चाहिए था।
केदार ने विश्वास के नंबर लिए और विश्वास को फ़ोन किया और एक तड़ी वाले अंदाज़ में तुरंत थाने आने को कहा और नहीं आने पर घर पर पुलिस के घर आने की बात कही। आधे घंटे के इंतज़ार के बाद विश्वास थाने में हाजिर हो गया। थानेदार साहब ने बड़े ही जबरदस्त अंदाज़ में विश्वास को अपशब्द कहे और सुनैना से सॉरी बोलते हुए तक़रीबन 50 उठक बैठक लगवाई। विश्वास की आँखों से दिख रहा था कि वह अपने आप को बहुत ही अपमानित और ठगा हुआ महसूस कर रहा था। कानून का एक तरफ़ा रवैय्या उसे बिल्कुल रास नहीं आ रहा था।
"हाँ तो विश्वास बाबू आज के बाद तु किसी लड़की की तरफ देखेगा भी नहीं।" थानेदार साहब ने एक गर्वीले और गुस्से भरे अंदाज़ में कहा। विश्वास की आँखे नीचे झुकी हुई थी। उसने बस अपनी गर्दन हाँ में हिलाई। "अब चल दफा हो यहाँ से।" थानेदार जी के कहने के साथ ही विश्वास तुरंत वहां से निकल गया। उसने पलकें ऊपर उठाकर ना सुनैना को देखा ना ही थानेदार जी को।
"तो मैडम ये लीजिए आज के बाद कोई विश्वास आपके विश्वास का खून नहीं करेगा और करेगा तो सबक सिखाने और शांति बनाये रखने के लिए पुलिस है।" थानेदार ने कहा और एक विजयी मुस्कान के साथ सुनैना थैंक्स बोलकर थाने से बाहर चली गई।
कुछ घंटे बाद फ़ोन की घंटी बजती है। कांस्टेबल केदार फ़ोन उठाता हैं और वह सामने वाले की बात बस सुने जा रहा था उसके आँखे फटी की फटी थी। मानों एक भयावह दिवास्वपन वह देख रहा था।
"क्या हुआ ऐसा चौंका हुआ क्यों है केदार?"
"साहब गुमान सिंह जी (थानेदार जी), काण्ड हो गया। कांस्टेबल हरी सिंह बोल रहा था यहाँ न्यू विहार में एक लड़के ने सुसाइड कर लिया है यह लड़का वही बताया जा रहा है जिसे आज पनिशमेंट दिया था। विश्वास ...... विश्वास ने सुसाइड कर लिया। हाथ में एक सुसाइड नोट मिला है घरवालों इसे सुसाइड नहीं विश्वास का खून बोल रहे हैं।"
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Good story best wishes
vikramsingh0823939
arorasachin111
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