JUNE 10th - JULY 10th
गांव के पुराने घर के ठीक बगल लगभग सटा हुआ आम का पेड़। जिसकी फल से लदी डालियां जमीन को छूती थीं। उस वक्त कुछ भी इतना सुंदर नहीं था(मेरे लिए) कि उसे, उस पेड़ से अधिक निहारा जा सके। उस पेड़ में आम छोटे-छोटे ही होते थे ज्यादा बड़े नही थे। फल लदी डालियां बच्चों के कौतुक का विषय ही था। छोटी चीजें कितनी सुखद और आत्मिक जान पड़ती थीं उससे जुड़ने में अधिक समय न लगता। छोटे छोटे खिलौनों से भी ज्यादा आत्मीयता होती थी बड़े खिलौनों की अपेक्षा।
पेड़ पर आम गुच्छों में निकलते और झुकी डालियों को एकदम जमीन पर लिटा देते थे। बच्चे होने की वजह से हमारे पहुंच के दायरे में थे इस वजह से आधिकारिक रूप से हम उसके मालिक थे, जितना उस पर हक था उससे अधिक उससे लगाव।
कुछ दृश्य आँखों में ठहर जाते हैं। थिर, आँखों के अंतिम बिंदु तक, उसके जल में तिरते रहते हैं जैसे किसी फोटो फ्रेम में पीछे कोई बेहद प्रिय तस्वीर का पड़े रहना जबकि बदलते वक्त के साथ-साथ बाहरी तस्वीर बदलती रहती है, एक वही पुरानी तस्वीर जस की तस पड़ी रहती है।
वक्त भी कैसा क्रूर न्यायी है या यूं कहें अन्यायी है। कहना मुश्किल है।
किस अपराध के चलते उस पेड़ के निशान तक को वहां से मिटा दिया गया होगा। या तो पेड़ की गलती की सजा उसे मिली होगी कि उसमें छोटे और खट्टे फल क्यूं कर आते हैं जैसे किसी औरत को बेटे न जनने के लिए अपराधी करार दिया जाता है। या फिर बच्चों की उद्दंडता का फल उन्हें मिला हो जो भरी दुपहरी में भी घर के अंदर तर न रहकर लू में जलते रहते हैं उस पेड़ के नीचे खटिया बिछाकर वहीं खेलने लग पड़ते हैं। उन्हें छूकर महसूसते हैं, वक्त के पहले ही तोड़ते हैं, तोलते हैं। कच्चे अमियां की चोपी के दाग हाथों और चेहरों पर पहने घूमते हैं।
ये कैसा दुख है जो अब भी नहीं जाता है। पुराने घर के आम के पेड़ का प्रेत पीछा नहीं छोड़ता। मैं उसे नहीं भूलूंगी पर याद भी तो वहां जाने पर ही करूंगी। कहूंगी तो सिर्फ अपना दुःख कि अब वो सिर्फ यादों में हैं, नन्हीं यादें छोटी छोटी गिट्टियों की तरह हृदय के समुद्र तल में ठसी हुई हैं, पर पेड़ का दुख, उसके समाप्त हो जाने की उसकी पीड़ा अब वो इस तरह ही कह सकता है।
सुनो! उस गुमशुदा आम के पेड़ की आवाज़।
जामुन के पेड़ की याद भी कहां बिसरती है, पेड़ के नीचे बड़ा सा सूखा तालाब जिसमें कभी पानी नहीं देखा।
हर साल तालाब उतना ही गहरा, उतना ही बड़ा लगता एकदम जस का तस।
कभी कभी उसमें बारिश से कीचड़ भर जाता तो कभी तल पर पानी रहता पर कभी पानी ऊपर तक भरा नहीं पाया।
पानी, पत्तियां और कीचड़ ।पेड़ से जामुन पट - पट करके गिरता ही रहता, तालाब का मुंह कभी बंद न होता
हमेशा मुंह खुला का खुला।
ऊपर से गिरता जामुन बैंगनी रंग और गूदे में बदल जाता, कहीं सिर्फ जामुनी रंग के छींटे ,कहीं जामुन के बीज, ऐसे चूसे हुए लगते मानों तालाब ने खाकर फेंके हों। जामुन बीनने के लिए बड़ी सावधानी से सरक सरक के जामुन को फाड़े में रखना होता, जिधर से खिसकना शुरू करते अच्छे और समूचे जामुन हमेशा उसके दूसरी तरफ ही दिखाई पड़ते। निर्णय किसी भी तरफ से उतरने का लिया हो, हमेशा उस दिशा के विपरीत ही अच्छे जामुन दिखाई पड़ते। ये भी हो सकता है ये आंखों का कोई भ्रम हो जो दूर की चीजों को हमेशा अच्छा पाता है।
गाँव जाने पर जामुन के पेड़ के पास जाना बेहद जरूरी हो जाता था, बहुत पुराना पेड़ था और उससे पुराने उसके किस्से। उसी पेड़ के नीचे सोते हुए चाचा को अक्सर घुंघरू की आवाजें सुनाई पड़ती थी तो कभी कोई औरत जामुन के पेड़ पर सफेद साड़ी में दिखाई देती थी।
गहरा नाता होने के कारण उससे मिलना जरूरी था।
गहरे बड़े विशाल गड्ढे में एक तरफ टेढ़ा जामुन का पेड़। कभी ध्यान से देखने पर कमर में दर्द होने लगता कि पता नहीं कितने वर्षों से ऐसे टेढ़ा खड़ा है कितनी व्यग्रता होती होगी या शायद वही अवस्था आराम की अवस्था बन गई होगी जैसे सोते समयकभी- कभी टेढ़ी-मेढ़ी मुद्रा भी आरामदेह बन पड़ती जिससे तनिक भी हिलने पर, मुद्रा बदलने पर पुनः आराम मिलेगा कि नहीं ये भ्रम हो जाता है।
कभी लगता मानो किसी का हाथ हो जिसने अपने हथेली में पेड़ उगा रखा हो और पेड़ भाव विभोर होकर उसकी हथेली जामुनी रंग से रंगता जा रहा हो।
समय के साथ गांव जाना कम हुआ, एक लंबे अरसे के बाद जाना हुआ तो पाया कि तालाब पूरा पटा हुआ है, दूर-दूर तक सिर्फ चिकना, सपाट, सतही, ऊपर ऊपर तक ठोस, कीचड़ मिट्टी और उसमें सनी पत्तियों से आश्रय छीनने वाली कठोर भूमि।
जामुन का पेड़ भी कहां पहले सा रह गया, ठूंठ सा लग रहा। जहां तहां कुछेक जामुन पट-पट गिर जाते हैं, उनका रंग अब हल्का जामुनी है। कच्चे जामुन भी गिर जा रहे हरे-हरे, जैसे टप-टप गिरते कच्चे स्वप्न।
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