आँगन की नमी

itsmesarita78
वीमेन्स फिक्शन
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संभल संभल पग धारो
पधारो मंगल द्वारे
हे दुल्हिन रानी पधारो
जेठ महीने दुल्हिन उतारती गाँव भर की औरतें। ये धरमुपुर -कोयरियों के गाँव का एक घर था। गाँव में अधिकतर कोयरी कुछ कहांर और कुछ बाभन। कहने की ज़रूरत नहीं की फैसलों और ज़मीन पर अधिकतर हक़ बाभन टोले का होता। घर बाहर मिला कर सभी घरों में खाने भर को खेतीहर ज़मीन थी। घर के पुरुष खेती करते और स्त्रियाँ घर सँभालती। चक्की और हैंडपंप से कसरत इनकी दिन चर्या का हिस्सा था।
देश भले इंदिरा राज से राजीव राज में बदलाव की हवा पर बह रहा है लेकिन इस गाँव में शहर की आबो हवा के नाम पर कहीं कहीं ,बिजली का लट्टू, चूड़ी वाला नलका ,और दो एक घर में टी वी का प्रवेश हुआ था। बाकी रेडियो पर शाम ढले गीत माला ही बजता है। बिजली गांव तक आई है पर हर घर में गृहप्रवेश नहीं हुआ है।
इसी गांव के दो भाई ,बड़ा रामशरण और छोटा लछमन, बिलकुल राम लखन की जोड़ी । आगे पीछे कोई नहीं सिवा बूढी आजी और बड़की बहु रामपिरिया यानि "रामप्रिया" के ! इसी नामपर रीझ कर आजी चट मंगनी पट ब्याह कर अपने ही मायके की बिटिया को बहू बना लायी। रामपिरिया ने आ कर घर संभाल लिया। सुघड़ता हर काम में झलकती।खेत में वही गेंहू चावल चना पर अब नित नए पकवान । रोज़ रसोई से दलभरी कभी रसिआओ की गमक उठती! पास पड़ोस वालो की आँत भी कुलबुला जाती और मुँह में पानी भरता।
द्वार पर तख्ता बिछा करआजी आते जाते गाँववालों को देखा करती। आजी गाँव भर में बुजुर्ग थी तो पुरखिन अम्मा कह कर बाभन टोला के लोग भी मान देते थे।आज उसी घर के छोटे बेटे यानी रामपिरिया के देवर का ब्याह हुआ था। दुल्हिन को किराए की मोटर में बिठा कर बारात लौटी थी।
रामपिरिया का बड़ा मन था कि दरवाजे पर मोटर आये । मान मुनव्वल कर रामशरण को मोटर में दूल्हा दुल्हिन को लिवा लाने को मना ही लिया।
उसी मोटर के दरवाजे पर सूप,बेलन लोढ़ा सब लेकर खड़ी रामपिरिया।
नहीं नहीं मारने के लिए नहीं बल्कि देवरानी की परछन - नज़र उतार, स्वागत करने।
हो दुल्हिन रानी पधारो....
दुल्हिन यानी लछमन की नई ब्याहता- परबतिया यानि पार्वती!

मंगल गीत के बीच कत्थई बनारसी पहन दउरी में पैर धरती सिंघोरा सम्हाले परबतिया भीतर आई। कोहबर वाले कमरे में खेल ठिठोली तमाम भीड़ में उमस बढ़ती जाती थी। लछमन भी मटका सिलक का कुर्ता पहन अब गर्मी से बौराए पड़े थे।

"भौजी गाँठ खोला तो हम जाई बाहिर"

"कलिहां तो खूब गाजा बाजा के साथ गयिल रहला अब इत्ता अकातावल हौआ गाँठ खोले खरतीं "

"ए बाबू असल गाँठ तो रतिया के खुली!"

हँसी की खिलखिलाहट फैल गई कमरे में। कोई मुँह दबा के तो कोई आँख मटका के इशारे में हँसता।

दूल्हा बने लछमन को गाँव भर की औरतें छेड़ रही थी। कुर्ते की आस्तीन से पसीना पोंछते हुए हुए वो बोला,

"हे भौजी इनके बाऊ पंखा दिहें है लगाय दीन जाय तो"

दुल्हिन के कमरे में पंखा लगेगा क्योंकि ब्याह के पहले ही लछमन ने अपने घर में बिजली की व्यवस्था कर ली थी। तार खींच कर बिजुर बत्ती वाला लट्टू भी लगा दिए थे।दोनों भाई गांव भर की नज़र में थे। हालाँकि बाभन टोला में सब घर में तार खिंच गयी थी तो ज्यादा बतकही नहीं हुई।

"है दादा अभाइने से एत्ता दुलार!!"

"रामपिरिया तुहार पत्ता कटल!" ठिठोली और मीठे तानो के बीच ,"ना करो हो। जा भैया सब रसम पूर भईल।" पिली साड़ी और हाथ में बखीर का कटोरा लिए ये थी रामपिरिया- घर की बड़की दुल्हिन।

"एतना छेड़ा जाता है कहीं बोलो तो ?सीधा पायी हो सब लोग वरना बाहर बैठे मरद लोग मजाक पर उल्टा मजाक करते और जमीन में धँस जाती तुम सब।"

"चलो सब जल्दी जल्दी मुँहदिखाई करो फिर आराम करे दुल्हिन।"

"कोई जनि ड्योढ़ी से पंखा ले आओ! मालूम होत हैय गर्मी से प्राण सूख जाई!

पंखा लगा। हवा चली। घूँघट हिला। भर चूड़ी वाले हाथ से घूँघट संभालती दुल्हिन की मुँहदिखाई हुई।परबतिया के नैन नक्श तीखे थे और रंग कुछ दबा हुआ। हाथ पैर खूब सलोने। आँखें मानो आम की फाँक और चिकनी मिट्टी सी देह।

"भाग खुले लछमन के का हो आजी ठीक कहत हई न?"

"रामपिरिया छाँट के लय आये है आपन देवरान।"

"दूधो नहाओ पुतो फलो"

आशीर्वाद के खूब बोल बोले गए। शादी की रस्मे चुहल हँसी ठिठोली दो दिन तक यूँ ही रही। उसके बाद घर में वही पंचपरमेश्वर - कुल जमा पाँच लोग।

नई दुल्हिन कुछ दिन बस घर और रिश्ते को समझे, रीत अनुसार परबतिया बस घर और रिश्ता समझ रही थी। किवाड़ के कुछ पीछे आड़ ले कर वो देखा करती कि सुबह नहा धो कर आँगन में अगियारी रख रामपिरिया हैंडपंप चला कर बाल्टियां भरती। बरतन कपडे साफ होते और साथ ही बटुली में चढ़ती चाय।

चाय की ये रीत परबतिया को पसंद थी उसके मायके में चाय बस आने जाने वालों के लिए होती या कहा जाता "साँवर रंग अउरो करिया होइ जाबू " .
यहाँ जेठानी प्यार से बनाती और दोनों साथ ही आँगन में बैठ चाय पीती। बहुत गर्मी वाले दिन में वो रामपिरिया को खींच कर अपने कमरे में ले आती बिजुरी वाले पंखे के आगे। बिजुरी बहुत काम की चीज़ है। पसीने की हर सूखती बूँद कह जाती।
कभी कलाई की कम चूड़ियों को देख रामपिरिया छेड़खानी में हंस देती और परबतिया का सांवला रंग चम्पई हो जाता। ऐसे में लछमन आ जाता तब तो उसकी नज़र ही न उठती। दिनभर रामपिरिया घर बाहर गाय गोरु देख मुस्कराती डोलती। इस पूरी दिनचर्या में एक ही फाँस थी - हैंडपंप का पानी!

दिन भर के कम से कम तीस से चालीस बाल्टी!

सवा महीने हुए भी दो महीना बीत गया था लेकिन परबतिया घर काम में तुरत फुरत नहीं दिखती थी। ऊपर के काम , रसोई पकाने या आजी के पैरों में मालिश में कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन कपडे बर्तन के पास जाने में उसकी साँस फूलती। रामपिरिया को अकेले देख बुरा लगता और अपने हाथ देख ज़्यादा बुरा। आठ बाल्टी पानी में झलका पड गया था!
नए नए ब्याह के दिन और गृहस्थी के दिन एक नहीं होते।
"परबतिया थोड़ा हाथ मजबूत करो। नवा ब्याह न रहा अब तो गृहस्थन बनिके पड़ी।"
जेठानी से ऐसी बात परबतिया के दिल को लग जाती। घर द्वार जेठ जिठानी का दुलार आजी का लाड और लछमन का प्रेम सब थे पर हैंडपंप सौत सी खटकती थी।
फाल्गुन की दस्तक, पूस का अलाव सब से दूर परबतिया का मन इसी जुगाड में रहता कि कैसे आए आँगन में चूड़ी वाला नलका।
एक दिन पूछ ही लिया ,"हम लोग नलका काहे नहीं लगवा लेते? बिजुरी है मोटर से पानी चढ़इहें और बस दिन भर की छुट्टी"!
"गांव ज्वार देखे पड़ी। बहुत कुछ है यहां और पइसा भी बचावे के सोचो ", दिन की तीस बाल्टी भर चुकी रामपिरिया खीज कर बोली और चली गयी। परबतिया, झलका सहलाती रही। पहली बार जीठानी की बात चुभी थी।
जहाँ दोनो भाई जी-तोड़ मेहनत कर अब ट्यूबवेल की व्यवस्था में लगे थे वहीँ परबतिया को उसके मायके में लगा नलका याद आता। झट से चूड़ी घुमाओ और पानी हाजिर ,बड़के बाउ बम्बई रहते थे। सबसे पहले वही लगवाए थे।

यहाँ भी तो बिजली है फिर पंखा हमारे बाउ दिए है एक नलका ही तो मांग रहे हम।
"हम लोग नलका क्यों नहीं लगवा लेते ?" लछमन के कंधे पर सर रखते हुए बोली। आज फिर हाथ में झलके पड़ गए। उसे यकीन था लछमन खुद मोटर और नलका लगवायेगा। ये सवाल लछमन को पूछते हुए उसने एक और कोशिश की।
"नलका? काहे?"
"देखो न झलका पड़ गया है।"
"प्रैटिस नहीं करती हो इसलिए।करोगी तब होगा काम। भौजी भी तो चलाती है न।ई फालतू पंचायत रात के न बतियाओ"

आजी ड्योढ़ी में बैठ देखती सुनती रहती।चूड़ी वाला नलका रिश्ते भी घुमा रहा था। कभी तो परबतिया सारे घर काम के लिए पंप से पानी भरती और अगले दो दिन ,छाले से दुखी रहती और कभी मुंह ढ़ापे सोई रहती।
रामपिरिया समझती थी पर पानी की मोटर और उस पर टंकी कौन लाएगा और लगेगा कैसे!
रामशरण भी गाँव के बड़ों की झिड़की सुन चुके थे, "हे रामशरण मेहरारू लोगन के सर ना चढ़ाओ वर्ना नचिहें!"
बेचारा रामशरण यूँही झेंप गया था अब टंकी!
"छोटकी से कहो बेकार जिद न करे", एक दिन रामशरण ने लछमन से कह डाला ।
"जी भैया "
लछमन के लिए इतना ही बहुत था की किसी बात के लिए बड़े भैया को कहना पड़ा लेकिन परबतिया ,....
इधर फालगुल की आहट हुई उधर रामपिरिया के दिन चढ़ गए। अहा कैसी तो रंगत पर सारा दिन थकान रहती । परबतिया भी सब देख समझ कर ढलने की कोशिश में लगी थी।
"जीजी नलका होत तो"
"छोटकी तोहरे जेठ जी ,आजी इहा तक के लछमन कुछू नाय बोलिए पर समझा कर गाँव वाले हैं और बाभन टोला के दो घर छोड़ मोटर कहीं नाय है "
"तो का हमरे घर का सब फैसला गांव उ टोला करी?न लगे मोटर पर इ न कहा जाये जीजी "
"अच्छा मान ले हम बोल दिहे की हां नलका लगी तब? मोटर के पईसा टंकी ऊ सब??"
"आप बोला जाए बस! हम सब करवाए लिहें।मुँहदिखाई रखे है बटोर के और.... "
"न छोटकी हम न कहब "

उधर रामपिरिया का पांचवा महीना चल रहा था उधर अनाज की बोरियां मंडी ले जाने के लिए तैयार थी। घर में भी काम बढ़ गया था. परबतिया सब करती लेकिन खीज जाती।
मंडी में अनाज की ही कीमत नहीं बल्कि बहे पसीने से पोसे गए सपनों की कीमत मिलती है। तीन दिन अनाज की गाड़ी लिए दोनों भाई मंडी की लाइन में लगे रहे।
"बढ़िया फसल हुई भइया !आये वाला बच्चा बहुत भागवान है "
"हां सबकी अपनी किस्मत "
"भैया अबकी एक कोण आलू जादा बोय दीन जाए परबतिया खूब बढ़िया पापड़ कचरी बनाय जानत है।"
"अच्छा? हम्मम रास्ते से जलेबी लिए चलो ,सब मुँह मीठा करे" ठहाकों के बीच वापसी की बस का हॉर्न दूर से ही सुनाई पड़ा।

घर से कुछ दूर दाई अम्मा को घर से निकलते देख दोनो के कदम तेजी से घर की तरफ बढ़े। बहुत दिन बाद घर में खुश खबरी आयी है कहीं... सशंकित मन से दोनों भीतर आये और ड्योढी में आजी और रामपिरिया को देख जान में जान आई।
तो फिर दाई? किसके लिए?
"बधाई हो घर में दुइ ललना एक साथ आवे वाला है" आजी ख़ुशी में चहकती हुई बोली।
रामपिरिया की ओर देखते हुए रामशरण ने आँखों ही आँखों में सवाल पूछा और जवाब पा कर प्रसन्न हो उठा।
"ललना ललनि जोन हो आजी!!" ख़ुशी से आजी को तख़्त से गोद में उठा नाच पड़ा लछमन।
"छोड़ हमके गिर जाब हे लछमन छोड़!", आजी को दो घुमड़ैया दे कर लछमन नीचे उतार कमरे की और लपका और आँगन में...... चूड़ी वाला नलका और ठीक ऊपर दू छत्ती पर टंकी ?
"ये? भौजी ये नलका?"
"..... "
"ई मेहरारू बहुत जिद्दी हैय। बड़े भैया का कहा काट दिहिस। ई ठीक नइ। केसे पूछ के इतना खर्चा और पइसा "
ड्योढ़ी से झांक कर रामशरण ने भी आश्चर्य से देखा।
ख़ुशी की चमक लछमन के चेहरे से यूँ गायब हुई जैसे जलते तवे पर पानी। खीज और गुस्से से आगे बढ़ कर किवाड़ खोलता उससे पहले ,"तो हैंडपंप तु चलइता की हम??"
ये आजी की आवाज़ थी।
"हमार दोनों नतोह माँ बने वाली हैं दाई मना किहिस भारी काम करे से और पइसा हमरे पास रहल। हम काहे पूछी मलकिन हैं एह घर की। लगवा लेहली।"
लछमन रामशरण रामपिरिया तीनो आजी को देख रहे थे ।
"अब मुंह न देखा। जा मिल परबतिया से। बधाई दे लाड कर गुस्सा चौखट पर छोड़ दिहे "
किवाड़ खुला और बंद हुआ। रामशरण भी बिना सवाल मुँह हाथ धोने चला गया। रामपिरिया और आजी वहीँ तखत पर बैठी रही।

"बड़की दुल्हिन ड्योढ़ी में बैठे वाली औरत पर जिम्मेदारी बहुत बड़ी होत है। बाहर की बदलाव की हवा छान छान के घर में आये। बेधड़क घुसे तो बिखरे का डर रहत है और न घुसने दो तो कब्बो कब्बो रिश्ते में नमी गायब होये जात है। इस आँगन के फूल सींचने के लिए नमी तो चाही न? यही से नलका गड़ना ज़रूरी था।"
दो मिनट में बाल्टी नलके के पानी से भर गयी। हाथ मुँह धो कर रामशरण की थकान उतर गयी। किवाड़ खुला। लछमन आँगन में और परबतिया आँचल संभाले आजी के पास खड़ी हो गयी। तीन औरतें एक दूसरे को देख आश्वस्त हुईं। नयी हवा छन कर आएगी और आँगन की नमी सूखने नहीं पायेगी।

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