यक्ष प्रश्न-गलती किसकी?

यंग एडल्ट फिक्शन
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कहानी लिखना मुझे पसंद है और कहानी लिखने से कहीं ज्यादा कहानी सुनाना, तो दोस्तों मैं आप सभी लोगों को एक कहानी सुनाना चाहता हूँ दरअसल कहानी सुनाना नहीं, एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। बहरहाल प्रश्न से हटकर फिर से कहानी पर आते हैं। प्रश्न अंत मे पूछा जायेगा।

तो इस कहानी की शुरुआत हुई थी बंगलुरु मे, तब मेरी पोस्टिंग बंगलुरु मे थी। मैं बंगलुरु की एक मल्टीनेशनल कंपनी मे इंजीनियर के पोस्ट पर काम करता था। मैंने अपने रहने की जगह अपने कार्यस्थल के समीप चुनी थी ताकि आने जाने मे सुविधा हो और परिवार को भी कोई तकलीफ न हो, मेरा ऑफिस बंगलुरु के मारातहल्ली के पास था और वहीं पास ही मैंने अपना घर ठीक किया था। मेरे मकान मालिक एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी थे। उनका एक बड़ा सा घर था, जिसे उन्होने किराए पर दिया हुआ था। मैं ग्राउंड फ्लोर मे सपरिवार किराए पर रहता था तो फ़र्स्ट फ्लोर मे एक तमिल परिवार किराए पर रहता था। उस परिवार के पुरुष से मेरी अच्छी दोस्ती हो गयी थी क्यूँकि वह भी मेरी कंपनी मे काम करता था हालाँकि उसका विभाग अलग था और मेरा अलग, वह फ़ाइनेंस डिपार्टमेंट मे था और मैं प्रॉडक्शन मे। मेरे इस तमिल पड़ोसी नाम राजेंद्रन था। एक ही कंपनी मे काम करने की वजह से हमारे ऑफिस जाने और आने का समय कमोबेश समान ही था। अक्सर हम दोनों ऑफिस से एक साथ ही लौटा करते और शाम की चाय का मजा भी एक साथ लिया करते थे। उसके और मेरे परिवार के बीच मे भी काफी घनिष्टता हो चुकी थी। उसकी श्रीमती जी और मेरी श्रीमती जी भी पक्की सहेली बन चुकी थी वहीं मेरा बेटा और उसके बेटे मे दाँत काँटी दोस्ती हो चुकी थी। राजेंद्रन का एक अभिन्न मित्र सुरेंद्रन हमारी पीछे वाली बिल्डिंग मे सेकंड फ्लोर पर सपारिवार किराए पर रहता था। जिसके बारे मे अक्सर वह मुझे बताया करता था।

राजेंद्रन काफी बुद्धिमान और भावनाशील था। कई बार उसके प्रश्न मुझे चकित कर देते तो कई बार उसके दिए उत्तरों से मैं हतप्रभ रह जाता था, दुनिया को देखने समझने का उसका नजरिया अद्भुत और विलक्षण था। शाम की चाय के साथ अक्सर हम लोग देश, समाज, राजनीति और धर्म की बातें किया करते। लगभग सभी विषयों पर हमारी अच्छी खासी बातें या कहें बहस हो चुकी थी।

ऐसे ही एक दिन बातों ही बातों मे उसने अपने मित्र सुरेंद्रन का किस्सा सुनाया, सुरेंद्रन केंद्रीय विभाग मे ऊंचे पद पर था और उसकी पत्नी बंगलोर के ही नामी सोफ्टवेयर कंपनी मे काम करती थी। परिवार की एक दो साल की बच्ची थी। बाहर से सुरेंद्रन का पारिवारिक जीवन काफी खुशहाल नजर आता था पर अंदर से उसके जीवन मे शांति नहीं थी। पति पत्नी मे तालमेल का पूर्णतया अभाव था अक्सर मियाँ बीबी मे लड़ाई होती रहती थी। और लड़ाई का कारण था एक दूसरे की बातों से असहमति, और इसी असहमति के कारण उनका पारिवारिक जीवन नरक बन चुका था और नरक की यह आग उनकी बेटी को भी झुलसा रही थी। हालाँकि पहले पहल सुरेंद्रन और उसकी पत्नी काफी खुशहाल जीवन जी रहे थे तभी उसकी पत्नी को ऑफिस के काम से आस्ट्रेलिया जाने का मौका मिला। दरअसल सुरेंद्रन की पत्नी विदेश मे ही रहकर काम करना चाहती थी और ये नया असाइनमेंट हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी वैसे भी आस्ट्रेलिया मे काम करने के लिए कंपनी पैसे भी काफी अच्छे दे रही थी। सुरेंद्रन की पत्नी हर हालात मे आस्ट्रेलिया जाना चाहती थी। सुरेंद्रन भी पत्नी के आस्ट्रेलिया जाने से काफी खुश था, वो भी आस्ट्रेलिया देखना चाहता था। दोनों पति पत्नी ने सलाह मशविरा कर इस काम को स्वीकार कर लिया था। तय ये हुआ कि सुरेंद्रन की पत्नी अकेले ही आस्ट्रेलिया जायेगी और हर तीसरे महीने सुरेंद्रन अपनी बेटी के साथ आकर उससे मिलता रहेगा। और जैसा कि तय हुआ था कुछ महीनों तक ऐसा ही चलता रहा। ऐसे ही एक साल बीत गया, आस्ट्रेलिया देखने की सुरेंद्रन की चाह भी पूरी हो गई, अब ऑफिस का काम छोड़कर बार-बार बेटी को लेकर आस्ट्रेलिया जाना उसके लिए संभव न था। और दो साल की बेटी को अकेले संभालना भी उसके लिए काफी कठिन था। शुरू के कुछ महीनों मे उसकी माँ और बहन उसके घर आकर दो तीन महीने रुकती थी और बेटी की देखभाल करती थी पर ऐसा कब तक होता जहाँ बहन की शादी हो चुकी थी और उसका अपना परिवार था तो वहीं माँ विभिन्न रोगों से ग्रस्त थी और बुढ़ापे मे आराम चाहती थी तो दोनों ने ही कुछ समय बाद सुरेंद्रन के घर जाना बंद कर दिया था। ये बड़ी विकट परिस्थिति थी। सुरेंद्रन भी अकेले बेटी को संभालने मे असमर्थ था घर और ऑफिस दोनों मे सामंजस्य बनाए रखना काफी मुश्किल हो गया था। इसलिए सुरेंद्रन ने उसकी पत्नी को ट्रान्सफर लेकर भारत वापस आने को कहा परंतु उसकी श्रीमती जी ने साफ-साफ मना कर दिया। वह अपना फलता फूलता करियर किसी के लिए भी दाँव पर लगाने को तैयार नहीं थी। उसने उल्टा सुरेंद्रन को ही नौकरी छोड़कर आस्ट्रेलिया आने को कहा। गौरमतलब है कि सुरेंद्रन की पत्नी की आय उससे कई गुना ज्यादा थी और वो अकेले ही पूरे परिवार का भरण पोषण करने मे सक्षम थी। सुरेंद्रन की पत्नी के अनुसार सुरेंद्रन को भी नौकरी छोड़कर आस्ट्रेलिया मे ही नौकरी की तलाश करनी चाहिए थी। उसके लिए आस्ट्रेलिया किसी स्वर्ग से कम न था। उसने सुरेंद्रन पर नौकरी छोड़ने के लिए पूरी तरह से दबाव डाला। वहीं सुरेंद्रन न तो नौकरी छोड़ना चाहता था न भारत! वह पत्नी को समझा-समझा कर थक गया, अंतत उसने हथियार डाल दिए और नौकरी से त्यागपत्र देकर आस्ट्रेलिया चला गया। कुछ दिन तो बड़े मजे से गुजरे फिर जब सुरेंद्रन ने आस्ट्रेलिया मे नौकरी की तलाश शुरू की तो उसे आटे दाल का भाव पता चल गया। काफी कोशिश के बाद भी उसे कोई नौकरी नहीं मिली। आखिर सुरेंद्रन कब तक मुफ्त की रोटियाँ तोड़ता ये उसके आत्मसम्मान पर गहरी चोट थी। आखिर लोग क्या कहते यही ना कि सुरेंद्रन के पास कोई काम नहीं है और वह बीवी के टुकड़ों पर पलता है। यह बात उसके लिए असहनीय थी, उसने खूब सोच विचार किया और अपनी पत्नी को मनाने की पूरी कोशिश की ताकि वह उसके साथ भारत आ सके पर उसकी पत्नी इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। सुरेंद्रन ने पत्नी को उसकी बेटी के प्रेम का वास्ता दिया उसे उससे अलग करने की बात भी की पर वो अपने निर्णय से टस से मस ना हुई और यही कारण था कि दोनों पति पत्नी मे अक्सर झगड़े होने लगे और इन झगड़ों का उनकी दो साल की बेटी पर काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा था। अंतत: हार मानकर सुरेंद्रन अपनी बेटी को लेकर भारत वापस आ गया और भारत आकर उसने तलाक लेने की प्रक्रिया की शुरूवात की। उसकी पत्नी को तलाक से कोई आपत्ति नहीं थी हालाँकि उसने बेटी के उत्तराधिकार के लिए जरूर कोर्ट से माँग की । वर्तमान मे दोनों तलाक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे, जहां सुरेंद्रन की पत्नी आस्ट्रेलिया मे ही कार्यरत थी, वहीं सुरेंद्रन को भारत मे भी अच्छी जॉब मिलना मुश्किल हो गया था और अभी वो किसी इंजीनियरिंग कॉलेज मे पार्ट टाइम पढ़ाकर अपने और अपनी बेटी का जीवन निर्वाह कर रहा था।

यह सारी कहानी सुनाकर राजेंद्रन ने मुझसे पूछा कि इस सारे घटनाक्रम मे गलती किसकी थी? मैंने बिना एक पल गंवाये जवाब दिया, सुरेंद्रन की पत्नी की, क्यूँकि मेरे हिसाब से सुरेंद्रन ने परिवार बचाने के लिए काफी त्याग किया था। पत्नी आस्ट्रेलिया जाकर नौकरी कर सके इसलिए उसने बेटी का अकेले लालन पालन करना मंजूर किया बाद मे जब परिस्थितियाँ बदली तो उसने पत्नी की बात मानकर परिवार की खातिर अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर आस्ट्रेलिया जाना भी स्वीकार किया हालाँकि उसकी आस्ट्रेलिया मे नौकरी नहीं लगी और किसी भी इज्जतदार मर्द के लिए पत्नी के टुकड़ों पर पलना असंभव होता है यह बात सुरेंद्रन के साथ भी थी इसलिए उसने पत्नी को भारत आने को कहा, तो मेरे विचार से सुरेंद्रन ने अपने परिवार को बचाने के लिए काफी त्याग किया था और इस चक्कर मे अपनी लगी लगाई नौकरी से भी हाथ धो बैठा था। वहीं उसकी पत्नी का व्यवहार एक मतलब परस्त स्त्री का था जिसे अपनी नौकरी और स्वतंत्रता अपने पति और बेटी से ज्यादा प्यारी थी उसे न अपनी बेटी से प्रेम था न पति से, उसे प्रेम था तो सिर्फ अपनी नौकरी और पेशे से। तो मेरे हिसाब से तो पूरी गलती सुरेंद्रन की पत्नी की थी।

यह सुनकर राजेंद्रन मुझसे बोला "तो तुम्हारे हिसाब से पूरी गलती सुरेंद्रन की पत्नी की है?"

मैंने कहा "हाँ।"

तब राजेंद्रन बोला "यह तो बस सोच सोच की बात है। ठीक है, एक काम करते हैं। मैं दोनों का लिंग परिवर्तन कर देता हूँ। "

राजेंद्रन की बात सुनकर मैं चकराया। मुझे आश्चर्यचकित देखकर राजेंद्रन ने समझाते हुए कहा कि "तुम सुरेंद्रन को निर्दोष और उसकी पत्नी को दोषी इसलिए बोल रहे हो क्यूँकि सुरेंद्रन पुरुष है और उसकी पत्नी स्त्री, और हमारे समाज के कानून के हिसाब से स्त्री को घर की चारदीवारी मे रहना चाहिए, बच्चा संभालना चाहिए, पति की हर बात मानना चाहिए। क्यूँ ठीक कहा ना! आदर्श भारतीय नारी को त्याग की मूर्ति होना चाहिए उसकी पहली प्राथमिकता परिवार होनी चाहिए और करियर ओरिएंटेड महिला इस साँचे मे फिट नहीं बैठती। इसलिए मैंने कहा कि अब मैं दोनों का लिंग बदलता हूँ। देखो अभी भी परिस्थितियाँ वही है बस इतना अंतर है कि अब सुरेंद्रन पुरुष न होकर स्त्री है और उसकी पत्नी स्त्री न होकर पुरुष है। अब बताओ गलती किसकी है?"

मैं लाजवाब हो गया। मेरे मित्र राजेंद्रन की इस बात ने मुझे चकित कर दिया था। अगर सुरेंद्रन स्त्री होता तो उसके द्वारा नौकरी छोड़कर बच्चे के साथ अपनी पत्नी जो कि अब पुरुष है के पास जाना और बिना किसी नौकरी के उसके साथ रहना कोई असामान्य घटना नहीं मानी जाती बल्कि इन हालातों मे तो अगर सुरेंद्रन नौकरी न होने और पत्नी पर निर्भरता को आत्मसम्मान का प्रश्न बनाकर भारत वापस लौटता और तलाक की मांग करता तो उसे अनुचित और नीति विरुद्ध माना जाता। क्यूँकि हमारे समाज मे स्त्री और पुरुष के लिए दोहरे मापदंड हैं और हमेशा रहेंगे। यह सब सोचकर मैं गलती का सारा ठीकरा सुरेंद्रन के सर फोड़ना चाहता ही था कि इस वार्तालाप मे हम दोनों की पत्नियों की भी एंट्री हो गयी सारी बातें सुनकर जहां मेरी पत्नी ने सुरेंद्रन का पक्ष लिया तो राजेंद्रन की पत्नी ने सुरेंद्रन पत्नी का। वहीँ एक और बात हुई जब हम सबने राजेंद्रन से उसकी राय पूछी तो उसने परिस्थितियों को दोषी बताया।

स्थिति बड़ी असमंजस की थी अब इस बात को कई दिन बीत चुके हैं और मैं अभी भी सोच विचार में डूबा हुआ हूँ। यक्ष प्रश्न की तरह यह प्रश्न मुझे आगे बड़ने नहीं दे रहा है। मेरी बुद्धि कुंठित हो चुकी है। मुझे आज भी यह बात समझ नहीं आ रही है कि गलती किसकी थी? और अपनी अल्प बुद्धि से मैं इस प्रश्न का उत्तर शायद कभी न दे सकूं इसलिए मेरा पाठकों से सनम्र निवेदन है कि वह मेरी समस्या का समाधान करें और तर्क के साथ बताएं कि आखिर गलती किसकी थी?

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