JUNE 10th - JULY 10th
एक तेज गड़गड़ाहट के साथ आसमान में बिजली चमकी और सारा जंगल दूर दूर तक रोशन हो गया.। उसने देखा कि वह घने जंगल के बीच पेड़ की मोटी शाखा पर अकेली बैठी है। तेज बारिश हो रही है, ठंड से उसका बदन कांप रहा है । वह सिर से पांव तक पानी में भीगी हुई है। वो यहाँ तक कैसे आई, उसे कुछ भी याद नही आ रहा था।
तभी पास ही जोर से किसी जानवर के घुर्राने का स्वर आया तो उसकी नजर नीचे गयी। वहाँ एक भेड़िया उसकी तरफ मुँह किये गुर्रा रहा था । उसके आसपास उसके समूह के अन्य भेड़िये भी उसके गिरने की ताक में थे। उसका बदन कांपने लगा। तभी सामने से सर सर की आवाज आई। एक सर्प अपना फन फैलाये उसे डसने को तैयार था।
उसके रोंगटे खड़े हो गए। आज निश्चित ही मौत सामने खड़ी थी। उसने आँखें बन्द कर ईश्वर को याद किया। किसी भी पल वह सांप उसे डस लेगा और वो उन भूखे भेड़ियों का भोजन बन जायेगी। सोचकर ही उसकी चीख निकल गयी। अगले पल वह सांप गायब था। तभी उसके कंधे पर उसे किसी का हाथ महसूस हुआ। वह दोबारा चीख पड़ी।
उसने मुड़कर देखा तो एक युवक तीर कमान लिए बैठा था, वह उसके पास की दूसरी डाल पर था। वेशभूषा से वह कोई राजकुमार लग रहा था। मगर राजकुमार और अकेला...!! वह भी इस तूफानी रात में जंगल में क्या कर रहा है , सोचते ही उसका बदन पसीने से भीग गया जबकि वातावरण में अच्छी खासी ठंड थी उसने कुछ पूछना चाहा पर उसके होंठ हिल कर रह गए। उसके गले से आवाज नही निकली।
तभी उसने सुना, "डरो मत। मैं भी तुम्हारी तरह अकेला हूँ। आज शिकार पर निकला था और रास्ता भटक गया। साथी छूट गए।
मैं यहाँ फंस गया। "
उसकी जान में जान आई।
"मेरा नाम उद्भव है , तुम कौन हो ? "
"मैं निकुंजा हूँ। " उसके मुँह से निकला।
"अभी यहाँ जो सांप था, उसे आपने... "
"हाँ, " कहकर उद्भव ने उसे एक तरफ इशारा किया उसने देखा कि सांप काफी नीची डाल पर सरसराता हुआ दूसरी तरफ जा रहा था। निकुंजा आश्चर्य से देखने लगी । यह युवक क्या जादूगर है, उसके मन में प्रश्न उठा।
तभी उसने देखा कि नीचे जो भेड़िये खड़े थे, वे अचानक वापस जा रहे थे जैसे उनको कोई आज्ञा मिली हो। सब के सब नीचे सिर किये जंगल में गायब होते जा रहे थे। निकुंजा ने उद्भव की तरफ देखा तो वह मुस्करा रहा था।
"ये सब ऐसे कैसे जा रहे हैं? " निकुंजा के मुँह से निकला।
"ऐसे कैसे! मतलब आप क्या चाहती है, वे हमारा शिकार करें। उसके बाद जाएं। " उद्भव हल्के से हँसा।
"नही, वो.. अचानक कैसे? क्या हुआ था? मेरा मतलब उनको किसी ने मारा भी नही, फिर भी वे अपने आप वापस चले गए। " निकुंजा ने रुक रुक कर अपनी बात पूरी की।
उद्भव ने रहस्यमय स्वर में कहा, "उन्हे मारते, तो वह हमें भी नही छोड़ते...! उन्हे कहीं और जाने की इच्छा हो गयी, शायद हमसे अच्छा शिकार मिल गया होगा। " और इतना कहकर वह जोर से हँस पड़ा।
मगर निकुंजा को हंसी नही आई। वह मूर्खों की तरह उसे देख रही थी। उसे लगा यह जो लग रहा है, वह है नही। फिर यह है कौन। कैसे पता चलेगा।
उसे सोच में पड़ा देख उद्भव ने कहा, " आप तो ऐसे दुःखी है जैसे वे भेड़िये नही बल्कि आपके मित्र थे। जबकि आपको तो खुश होना चाहिए कि जान बच गयी, कुछ ही देर में बारिश रुक जायेगी, जल्दी ही मेरे मित्र मुझे ढूढ़ लेंगे।। "
उद्भव का विश्वास देख कर निकुंजा को भी शक्ति मिली।
कुछ ही देर में बारिश भी रुक गयी। तेज हवाएं धीरे धीरे शांत पड़ गयी। वातावरण ऐसा सुहाना हो गया जैसे यहाँ तूफान कभी आता ही नहीं हो।
तभी उनके सामने तेज रोशनी दिखाई दी।
जो धीरे धीरे पास आती जा रही थी। जब वह बिल्कुल पास आ गई तो पता चला कि वे ढेर सारी मशालें थी।
बीच में आठ दस घुड़सवार थे। उन्होंने उद्भव के पास आकर मशालें नीची कर ली थी। उनके बीच से एक घुड़सवार आगे आया और उसने उद्भव को देख कर सिर झुकाया।
उद्भव ने हाथ उठाकर उसका अभिवादन स्वीकार किया फिर निकुंजा की तरफ देखा और बोला, "मित्र, ये भी हमारी तरह विपत्ति में फंस गयी हैं। हमेँ इन्हे इनके निवास तक पहुँचाना है। "
निकुंजा और भी आश्चर्य से उसे देख रही थी। उसने कोई सहायता नही मांगी थी। उसे अकेली देख उद्भव ने स्वयं हाथ बढ़ाया था। क्या उसे ये सहायता स्वीकार नहीं करनी चाहिए। उसके भीतर से आवाज आई। ' तुम उद्भव और उसके मित्रों का विश्वास कर सकती हो। '
और फिर वह भी उद्भव की सहायता से पेड़ से उतर गयी। उद्भव अपने मित्रों से मिला कुछ देर तक वे कुछ चर्चा करते रहे। फिर उद्भव ने अपने होंठ गोल किये और तेज सीटी बजाई,एक ऊँची काठी का सफेद घोड़ा उद्भव के पास आया ,उसने उसे सहलाया और उसकी रास पकड़ कर निकुंजा के पास आया "आइये,आपको आपकी बस्ती तक छोड़ देते हैं " वह बोला।निकुंजा के हाँ में सिर हिलाने के बाद उसे अपने घोड़े पर बिठा कर उद्धव उसके पीछे बैठा। उसके दाएँ बाएँ से उसकी एक एक भुजा ने घोड़े की लगाम पकड़ी और धीमी चाल में वह सब चल पड़े। आगे एक घुड़सवार चल रहा था, उसके पीछे उद्भव था और उनके पीछे अन्य सब।
मशाले बुझा दी गयी थी क्योंकि आसमान साफ हो गया था और पूर्णिमा का चाँद पूरे यौवन पर था।
निकुंजा को सब सपना सा लग रहा था। कहाँ थोड़ी देर पहले तूफानी बारिश में वह अकेली भयभीत सी मौत के साये में थी और कहाँ अब उसके आसपास एक सुरक्षा कवच बना हुआ था । जो मौसम कहर बरपा रहा था अब वही सुकून दे रहा था।
अभी उन्हे चले हुए एक घड़ी भी न बीती थी कि आगे वाले
घुड़सवार ने रुकने का इशारा किया , उसकी चाल धीमी हो गयी, सभी लोग सतर्क हो गए।
एकाएक आसपास के पेड़ों के पीछे से भेड़िये निकलने लगे और घात लगाकर खड़े हो गए। मशाल की आग के कारण वे पास नही आ रहे थे पर उनके हाव भाव देख कर लग रहा था कि मशाल की आग उन्हे अधिक देर रोक नही पायेगी। उद्भव ने हाथ उठाकर जाने क्या इशारा किया, उसके साथ आये घुड़सवारों ने अपने भाले सामने तेजी से फेंके जो जाकर उन भेड़ियों के पास के वृक्षों में धस गए। तुरंत उन भालों के पिछले हिस्से से विस्फोट होने लगे। भेड़िये अचानक हुए इस हमले से बौखला गए कुछ आगे की तरफ भागे और कुछ पीछे की तरफ भागे। आगे वाले भेड़ियों ने उद्भव के साथियों पर हमला कर दिया। उद्भव के साथ जिन लोगों ने मशाल थाम रखी थी, वे भी सैनिक थे इसलिए वे भी तलवार लेकर उन पर टूट पड़े। बड़ा ही खौफनाक दृश्य था। एक भेड़िया उद्भव और निकुंजा की तरफ दौड़ा आ रहा था। उद्भव ने तुरंत अपने हाथों को उसके सामने लाकर मुट्ठी बनाकर उस पर कुछ फेंका और आँखों को चौन्धियाने वाली तेज रोशनी निकली। निकुंजा की आँखे बन्द हो गयी।
जब उसने आँखे खोली तो सामने न भेडिया था, न कोई अन्य। केवल वे दोनो एक विशाल पहाड़ के सामने खड़े थे।
एक चट्टान के समीप जाकर उद्भव ने थपथपाया और देखते ही देखते चट्टान सरकने लगी शायद वह कोई दरवाजा था । मगर अंदर धुप्प अंधेरा था। उद्भव निकुंजा हाथ पकड़कर उसे भीतर ले गया। जैसे ही वे भीतर गए। निकुंजा को लगा चट्टान नीचे की ओर सरक रही है, उसने उद्भव को कसकर पकड़ लिया। उद्भव ने उसे छोटी बच्ची सदृश अपने सीने से लगा लिया और सिर सहलाया।
और निकुंजा की आँखे खुल गयी। उसने देखा कि वह अपने बिस्तर पर है और उसका भाई उसका सिर सहला रहा है। उसके पास उसके माता पिता खड़े थे जो चिंतित दिखाई दे रहे थे।
"कैसी है नीति?" उसकी मम्मी बोली।
उसने सिर हिला दिया।
"अभी तू जोर जोर से चिल्ला रही थी। कोई डरावना सपना देखा था क्या? "उसका भाई बोला।
" हाँ, भैया! बहुत ही डरावना था सपना! "नीति बोली औररोने लगी।
' क्या था ये? उसे ऐसा सपना क्यों आया?उसने अपना नाम निकुंजा क्यों बताया? उद्भव कौन था? वह सोचने लगी।
"चल पानी पी ले । "उसकी मम्मी ने उसे पानी दिया। उसके पापा ने हँस कर कहा- " और पढो़ हॉरर कहानियाँ!
तू ये हॉरर कहानी पढ़ते पढ़ते सो गयी थी। " उन्होंने अपने हाथ की किताब दिखाई।
वह पुस्तक 'वर्षा श्रीवास्तव' की 'बहुरूपिया 'थी जिसे पढ़ते पढ़ते नीति सपनो में खो गयी थी।
समाप्त
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