JUNE 10th - JULY 10th
अनोखा रिश्ता
पूस का महीना और रात का आप जान सकते हैं ठंड की स्थिति कैसी होगी। मोहन हमेशा की तरह इस बार भी अपनी ट्रेन की यात्रा कर रहा था। किसी छुट्टी में घर लौट रहा था। वह एक सभ्य परिवार का था। उसके पिता एक आर्मी से रिटायर व्यक्ति थें। उसकी मां नहीं थी एक लंबी बीमारी से कुछ ही दिन चल बसी थी। वह 15 दिनों पर घर आता जाता था।
हां, तो रात के 9 बज रहे थें, ठंड भी काफी थी। शीत लहरी भी अपनी चरम सीमा पर थी। स्टेशन पर काफी भीड़ थी। मैं प्लेटफार्म पर ट्रेन का इंतजार कर ही रहा था कि अचानक ट्रेन की आने की सूचना दी जाने लगी। इसी बीच उसकी दृष्टि स्टेशन के पुल पर पड़ी, एक लड़की जैकेट पहनी हुई तेजी से सीढ़ी उतर रही थी। मैने सोचा इतनी तेजी से उतरने की जरूरत क्या थी, ट्रेन तो अभी स्टेशन पर आई नहीं है। अगर गिर गई तो चोट लगेगी । इसी बीच ट्रेन भी आ गई। मैं हमेशा की तरह अपना डब्बा खोजा और गेट पर पहुंचते रिजर्वेशन लिस्ट में अपना नाम खोजा तथा अपने बगल के सीट में कौन है उसकी भी जानकारी ले ली। वैसे यह मेरी पुरानी आदत है। बगल के व्यक्ति का पता जरूर करता हूं। वह एक उम्र दराज व्यक्ति था। कोई लेडी होती तो सायद सफर आसानी से कटती। खैर मैं अपने सीट पर जा कर बैठ गया। वह लड़की अभी भी बाहर तेजी से इधर उधर घूम रही थी जैसे वह भी अपनी बोगी खोज रही हो। इतने में ट्रेन सिटी दी और खुल गई। थोड़ी देर बाद देखा वह लड़की इसी बोगी में गेट के पास खड़ी थी। लगता था कि उसने टिकट रिजर्वेशन नहीं कराई है।
ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ ली थी। ठंड के कारण वह भी परेशानी में थी। मैं उसकी परेशानी का कारण पूछना चाहा पर हिम्मत नहीं हो रही थी। पता नहीं कैसी लड़की होगी। क्यों खड़ी है। कुछ देर बाद मैंने उससे पूछ बैठा कि आपने रिजर्वेशन नहीं लिया है क्या ?
उसने कहा,”नहीं, नहीं मिला जल्दी में चली आई। मां की तबीयत खराब है। इसलिए मुझे जल्दी में जाना पड़ा।"
मैंने कहा,” कम से कम टिकट तो ले लेना चाहिए था।" पर उसके पास टिकट था।
”यहां आप क्या करती क्या हैं"?
“मैं यहां पढ़ती हूं”।
उसे जहां जाना था वहां मुझे भी जाना था। इसलिए मैं उसे अपनी सीट पर बैठने को कहा। वह तैयार नहीं थी पर बाद में मान गई और बैठ गई। इसी बीच टी टी भी टिकट चेक करने आ गया। उसके पास रिज़र्वेशन नहीं था इसलिए उसे फाइन किया गया। उसके पास उतना पैसा नहीं था अतः मुझे देना पड़ा। टी टी भी उसकी परिस्थिति को समझ रहा था। पर उसकी ड्यूटी थी। अच्छा हुआ कि टी टी मान गया ।
ट्रेन अपनी गति से चल रही थी। रात का समय था चारों ओर सन्नाटा था इसलिए ट्रेन की खट खट की आवाज आ रही थी। मैं आराम करना चाहा पर एक लाचार लड़की ठंड में बैठी हो और मैं आराम करूं।
मैंने कहा कि,”आप आराम करें मैं बगल में बैठ रहा हूं”। काफी कहने पर ओ मान गई और सो गई जैसे थकी हुई हो । मुझे उस पर दया आ गई और मैं अपना चादर उसे दे दिया।
मैं अपनी किताब पढ़ते हुए समय बिता रहा था, कभी उसे देख रहा था कभी डब्बा के लोगों को देख रहा था कि सभी घोर नींद में सोए हुए हैं।
धीरे धीरे समय बिता, घड़ी देखा ४बज चुके थें । ट्रेन लखनऊ पहुंचने वाली थी। मैंने उससे कहा,“स्टेशन आने वाली है”। वह झट से उठी और बैठ गई।
" इतनी जल्दबाजी नहीं है।“
ट्रेन थोड़ी देर में लखनऊ स्टेशन पर रुक गई। हम दोनों ट्रेन से उतर गए।
स्टेशन पर सन्नाटा था। कुहासा छाया हुआ था। उससे पूछा, "आपको कहां जाना है और कैसे जाएंगी "। उसे गुमती नगर जाना था। वह किसी आटो से जाना चाहती थी।
"अभी सन्नाटा है आप अकेले कैसे जाएंगी समय ठीक नहीं है। आपको डर नहीं लगता ?”
वैसे वह कुछ सहमी हुई थी ।
बोली,"चली जाऊंगी"।
"मेरी गाड़ी आई हुई है आपको छोड़ देता हूं चुकी मुझे भी उसी तरफ जाना है इसलिए बोल रहा हूं।"
वह डर रही थी।
"डरने की कोई बात नहीं है। आप मुझे अपना बड़ा भाई हीं समझे।"
वह राजी हो गई और कार में बैठ गई। वह पीछे और मैं आगे बैठ गया चारों तरफ कुहासा था। मैंने बोला,” देखी कितनी कुहासा है आपको डर नहीं लगता?“
वह चुप थी। इतने में उसका घर भी आ गया। सुबह के ५ बज चुके थें। उसने अपने पिता जी से परिचय करवाया। मैं पिता जी से उसकी मां का समाचार पूछा। वह हॉस्पिटल में थी। मैं वापस जाने लगा कि अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और “भैया बोल कर चाय पी कर जाने को कहा”।
“भैया” शब्द उसके दिल को छू लिया, क्योंकि उसकी बहनें नहीं है।
चाय पी कर जाने की बात पर मोहन कहता है कि,” फिर कभी, अभी मां से भेंट कर लो”। वह वापस घर की ओर लौट गया। मोहन को भैया शब्द सुन कर काफी अपनापन लगा। वह घर पहुंच कर अपनी ट्रेन यात्रा के विषय में सभी को बताया। उसके परिवार के लोग खासकर पिता जी काफी खुश हुए। एक अकेली लड़की को सहायता कर उसे उसके घर तक पहुंचाने के लिए।
दूसरे दिन मोहन सभी के साथ नाश्ता कर रहा था तो उसके पिताजी ने कहा कि,” बेटा जिसको तुम स्वयं कष्ट में रह कर सहायता किए, उसकी मां का हाल तो पता कर लो कि वह कैसी है।“उसने कहा,” नंबर नहीं लिया है कैसे पता करूं।“
पापा-” एक भाई होकर एक बहन का पता नहीं कर सकते। कम से कम उसके घर जाकर तो पता कर सकते हो।“
मोहन, "ठीक कहते हैं पापा जी।“ वह तुरंत बाइक उठाया और उसके घर जा पहुंचा।
घर पहुंच कर कॉल बेल बजाया। उधर से उसके पिताजी दरवाजा खोलते हैं, मोहन को देख काफी खुश होते हैं और शीला को पुकारते हैं और कहते हैं कि देखो कौन आया है। शीला दौड़ कर आती है वह भी उसे देख कर खुश होती है।
मोहन मां के विषय में पूछता है उसे पता चलता है कि वह क्रिटिकल हाल में है। वह भी हॉस्पिटल जाना चाहता है। वह हॉस्पिटल का पता पूछता है। फिर पिताजी के साथ हॉस्पिटल जाता है।
दोनों हॉस्पिटल पहुंचते हैं। मोहन को उसकी मां की स्थिति देख कर अफसोस होता है। इस समय उसे अपनी मां याद आ जाती है। मोहन शीला के पिता जी से बात कर रहा था तबतक शीला भी हॉस्पिटल आ गई। सभी बाते करने लगे, इतने में मोहन की दृष्टि एक डॉक्टर पर पड़ी। उसे लगा कि उसे कहीं देखा है। वह कोशिश किया जाकर उससे भेंट करने को, पर जैसे ही उसके नजदीक पहुंचा वह अचानक बोला अरे, “रमेश तुम यहां”।
“हां मैं यहीं हूं।“
मोहन,” कितने दिनों से"?
डा.रमेश,” करीब दो सालों से।“
डा.रमेश –“तुम यहां कैसे?”
मोहन –“मेरे एक दोस्त की मां एडमिट है और हालत खराब"। वह शीला के पिता जी से बात करवाता है। उसे पूरी हालत बता दिया जाता है।
डा.रमेश –“उनकी हालत तो ठीक नहीं है पर मैं कोशिश करता हूं। ईश्वर चाहें तो ठीक हो जाएंगी।“
डा.रमेश उसकी मां को देखने लगा और भगवान की ऐसी कृपा हुई कि सप्ताह बाद उसकी मां ठीक हो गई। शीला के पिता जी को डा. रमेश का व्यवहार काफी मिलनसार लगा ।
शीला की मां घर आ गई।
शीला ने मां को पूरी कहानी बता देती है जिसे सुन कर वह काफी खुश होती है।
मां बोलती है,“वह तो एक भगवान की तरह तुमसे मिला है। उसे बुलाओ मैं मिलना चाहती हूं।“
शीला मोहन को खबर करती है मोहन भी खुश होता है। वह आने का आश्वासन देता है।
दूसरी छुट्टी में वह शीला के घर जाता है। शीला मोहन का परिचय कराती है।
शीला बोलती है -" मां, लो तुम्हारे भगवान आ गए।“
मां मिलकर बहुत खुश होती है
मां बोलती," बेटा तू भगवान बनकर आए हो।“ खूब आशीर्वाद देती है।
मोहन भावुक हो जाता है और बोलता है," मेरी मां नहीं है उसकी कमी को मैं समझता हूं, इसलिए कोशिश किया।“ भाग्य की बात थी कि डा. रमेश मिल गया। अब आप अपने सेहत पर ध्यान दीजिए।“
सभी साथ मिलकर चाय पीते हैं। एक खुशी का माहोल बन जाता है।
इस तरह शीला का परिवार एक मां की कमी से बच जाता है। मोहन और शीला काफी खुश होते हैं। अब सभी खुशी खुशी रहने लगे।
इस तरह भाई - बहन का रिश्ता कामयाब हो जाता है।
लेखक:-
ए.एम.कुमार
पटना
#188
3,913
580
: 3,333
12
4.8 (12 )
Raj Premanjit
Awesome
b.kumar0604
sinhaaindu
Super very nice
Description in detail *
Thank you for taking the time to report this. Our team will review this and contact you if we need more information.
10
20
30
40
50