JUNE 10th - JULY 10th
"बेगूसराय हुआ कोरोना मुक्त"
"क्या इस बार केतकी पूर्णिमा मैं लौटेगी फिर से रौनक?"
हिंदुस्तान अखबार के फ्रंट पेज पर २ साल के अंतराल के बाद ऐसी कोई ख़बर छपी थी जिससे बेगूसराय जिले स्तिथ धरमपुर गाँव के रहिवासी बहुत हर्षित हुए थे। "बुरहि गन्दक नदी" के तट पर बसा यह धरमपुर गाँव पूरे बेगूसराय जिले में कुश्ती के खेल के लिए जाना जाता था। हर साल यहाँ पर केतकी पूर्णिमा के दिन दंगल का आयोजन होता था, जिसे देखने दूर दूर से लोग आया करते थे।
आज केतकी पूर्णिमा है और जिस तरह ही तैयारियाँ चल रही है, उससे प्रतीत होता है लॉकडाउन के चलते पिछले २ साल जो कुश्ती नहीं हो पाई उसकी भरपाई हो जायेगी।
धरमपुर के सबसे जाने माने और सबसे दिग्गज पहलवान हुए हैं वीरभद्र ठाकुर, जिन्हें सब "भाईकक्का" कहते हैं। अब थोड़ा बूढ़ा ज़रूर गए हैं, पर आज भी दो-चार को उठा के पटक ही सकते हैं। भाईकक्का, शैला के नाना जी है। शैला ने इसी वर्ष मैट्रिक की परीक्षा दी है, पढ़ने में बहुत होशियार है और खास दंगल देखने नानी गाँव आयी है।
दंगल का अभ्यास ज़ोर-शोर से चल रहा था, भाईकक्का गाँव के लड़कों को दाँव-पेच सीखा रहे थे। किसी से थोड़ी भी भूल-चूक होती तो भाईकक्का उसको डाँट-फटकार, गाली, यहाँ तक कि थप्पड़ लगाने से भी पीछे नहीं हट रहे थे। शैला यह सब बड़ी दिलचस्पी से, हंसते हुए देखे जा रही थी। बस नानाजी जब किसीको मारने लगते तो वह अपनी पलकें बंद कर ले रही थी।
इस सब के बीच शैला का घ्यान आँगन में हो रहे एक विचित्र प्रकार की तैयारी पर गया। उसने देखा कि आँगन में बहुत सारी लाठियाँ आई हैं, दोनों मामा-मामियाँ, नानी सब लाठियाँ उठा उठा के कुछ जाँच-परख कर रहे हैं। शैला समझ नहीं पा रही थी की दंगल में भला लाठियों का क्या प्रयोजन, सो उसने छोटे मामा से पूछ दिया,
"ये लाठी किसलिए है मामा"?
"तुझे पीटने के लिए", मामा ने उसके सर पर झूट-मुट मारने की क्रिया करते हुए कहा।
"सच्ची बताइये न"
"दंगल के बाद जो मारा-मारी होगा, उसमें काम आएगा,"
"जाइये मत बताइये" शैला ने चिढ़कर कहा।
"लो, इसको झूठ लग रहा है, तुम चलने वाली है ना, चलना देखना"
मामा ने मारा-मारी वाली बात इतने आराम से कही थी, जैसे ये कोई साधारण सी बात हो। शैला को भले ये बात साधारण न लगी हो पर सच तो सोलह आने थी। धरमपुर और सिकंदरपुर गाँव के पहलवानों के बीच दंगल के बाद मारा-मारी का इतिहास था। ऐसा कोई भी दंगल आयोजन अब तक नहीं हुआ था जिसके अंत में दोनों ओर से लाठियाँ न चली हों।
दोपहर चढ़ते ही, समूचा धरमपुर गाँव बुरहि नदी के तट पर आ पहुँचा था। कोने कोने पर खाने-पीने की दुकानें लग गईं थी, जिनमें गरम-गरम समोसे, लिट्टियाँ छन रहीं थी, झाल-मुरही, भुजा भी लोग ख़ूब खा रहे थे। सृंगार का सामान जईसे चूड़ी, लिपिस्टिक, टिकली सब भी बिक रहा था। आधा दर्जन भर दरोगा भी थे जो नदी के पुल पर से ही दंगल के प्रक्रिया पर नज़र गड़ाए हुए थे। शैला को नदी तट की रौनक अच्छी तो लग रही थी पर कहीं न कहीं मारा-मारी वाली बात उसके भीतर चिंता पैदा किये हुए था।
अखाड़ा का भूमि पूजन हुआ, जिसके पश्चात शंख बजा और शंख के गर्जन के साथ ही दंगल शुरू हो गया। ठीक इसी तरह का संख संध्या के समय भी बजेगा, दंगल के समापन के संकेत के तौर पर। उसके बजने तक जिस गाँव के पहलवान सबसे अधिक प्रतिध्वंदी को उठा के पटक पाएँगे, उस गाँव को विजेता घोषित कर दिया जाएगा। इस दंगल में कोई इनाम या धनराशि नहीं होती थी, यह दंगल गाँव की इज़्ज़त के लिए खेली जाती थी।
दंगल के शुरू होते ही शुरू हुई "संजय ठाकुर" की कमेंटरी। संजय ठाकुर शैला के ही नानी गाँव का रहिवासी थे, जो कि अपनी मज़ेदार और मनोरंजक कमेंटरी से दर्शकों को हँसा हँसा के पस्त कर देता था। इसलिए उसके आस पास भीड़ का जमावड़ा सबसे अधिक था। जिस तरह महाभारत का आँखों देखा हाल, संजय ने ध्रितराष्ट्र को सुनाया था, दंगल का आँखों देखा हाल यह संजय सुनाने लगे, अपने चिर-परिचित अंदाज़ में।
जब कोई परास्त हो जाता तो संजय ठाकुर कहता,
"मिट्टी में निमक, हल्दी, मिरचाइ सब ठीक तो पड़ा था न"
"बचपन से ही इसको मिट्टी खाने का बड़ा शौक है"
"करने चले थे पहलवानी, आ गयी याद नानी,"
"कोई बात नहीं, दो तीन दिन दंतमंजन नहीं करना पड़ेगा,"
"इसका लंगोट ही खुल गया, सब जन आँख बंद कर लो रे"
जब कुश्ती नहीं चल रही होती तो संजय ठाकुर इधर उधर की बात कहने लगता,
"ए मुरारी, थोड़ा खैनी इधर भी बढ़ा हो,"
"मनोहर, सुना है तेरा शादी तय हो गया, बरियाती में बुलायेगा न, तब ठीक है"
"समोसा तो बड़ बढियाँ गमक रहा है मब्बी वाली चाची"
जब कोई उसे अंग्रेज़ी में कमेंटरी करने के लिए निवेदन करता, तो संजय ठाकुर कहता,
"आई एम संजय, हु यु आर - मारींग द लाठी, फोरिंग द कपार"
शैला को दंगल देखने में बहुत आनंद आ रहा था, खासकर संजय की कमेंटरी सुनने में।
जैसे ही कोई हारता, जीतनेवाले पक्ष के गाँव वाले ख़ूब शोर मचाने लगते, तालियाँ बजाने लगते। परास्त हुए पहलवान को उठा कर "बोलो गँगा मैया की जय" का जयकारा लगाकर नदीं में डाल दिया जा रहा था। अभी अभी शैला के गाँव के तीन पहलवानों को सिकंदरपुर के "मरखा पहलवान" के हाथों परास्त होने पर नदीं में धकेला गया था। मरखा पहलवान को उठा के पटकना तो दूर की बात, उसके नाम मात्र से प्रतिध्वंदी के पैर काँप जाते थे।
अब उससे मुक़ाबला करने ख़ुद शैला के नानजी "भइकक्का" अखाड़े में आ चुके थे। दंगल देखने आए सभी श्रोतागण का ध्यान इस वक़्त अखाड़े पर केंद्रित था। यह टक्कर का और बहुत रोमांचक मुक़ाबला होने वाला था। शैला दंगल देख भी रही थी और रह रहकर पीछे भी घूम जाती।
दूसरे छोर से मरखा पहलवान की बेटी "बुलबुल", अपने पिताजी के लिए ज़ोर ज़ोर से ताली बजा रही थी। अखाड़े में भइकक्का ने फुर्ती का परिचय देते हुए देखते ही देखते मरखा पहलवान को पीछे से उठा कर धड़ाम से पटक दिया। शैला ये देखते ही उछल पड़ी, बुलबुल को दिखा दिखा कर ताली बजाने लगी, चिल्लाने लगी।
दंगल लगातार चल रहे थे, दोनों गाँवों में काँटे की टक्कर चल रही थी। संध्या के शंख बजने में अब मुश्किल से १५ से २० मिनट का समय शेष रह गया था। तभी दोनों पक्षों में किसी बात को लेकर अनबन हो गई, देखते ही देखते अखाड़े के समीप असंख्य भीड़ इकट्ठा हो गयी। लाठियाँ, पत्थर जिसे जो मिला उठाये हुए था।
दरोगा जो अब तक पुल पर खड़े थे, यह गतिविधि देखकर लोगों को रोकने के बजाय, जीप घुमाकर गाँव से पलायन कर गए। अब तलक मारा-मारी वाली बात जो शैला को कहीं न कहीं झूठ लग रही थी, सच होती नज़र आ रही थी।
"ये क्या हो रहा है, अरे बापरे, अरे दैव रे"
"ऐसा न करो, ऐसा न करो"
"क्रोध में मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है"
ये भूमि, कहीं बन न जाये कुरुक्षेत्र की रणभूमि" संजय ने एक ही साँस में यह सब कुछ कह दिया।
दिन भर से हो रहे दंगल के नतीज़े में धरमपुर और सिकंदरपुर दोनों गाँवों के अंक बराबर थे, सब पहलवान कुश्ती खेल चुके थे, तो अब कौनसे गाँव को विजय घोषित किया जाए इसीको लेकर बाद-विवाद था। जब लग रहा था कि अब तो लाठियाँ चल ही जाएँगी, एन वक़्त पर शैला ने ये प्रस्ताव रखा कि एक दंगल लड़कियों का हो, इसमें जो जीतेगा उस गाँव को दंगल का विजेता घोषित कर दिया जाए। दोनों पक्षों ने गहन बात-विमर्श के पश्चात इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
"धरमपुर के इतिहास में पहली बार हम सब देखेंगे लड़कियों का दंगल।
धरमपुर से कक्का की नतनी शैला, और सिकंदरपुर से मरखा पहलवान की बेटी बुलबुल दंगल लड़ेगी," संजय ने घोषणा की।
सारे दर्शक पहली बार इस तरह का दंगल देखनेवाले थे।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन", "फल की चिंता छोड़कर कुश्ती लड़ों लड़कियों" संजय द्वारा गीता के इस श्लोक के पढ़ते ही दंगल शुरू हो गया।
फल की चिंता कैसे नहीं करे कोई, अखाड़े में खड़ी शैला सोचने लगी। लड़ाई केवल स्तघित हुई थी, टली नहीं थी। दंगल लड़ने तक का समय था उसके पास, कुछ ऐसा सोचने का जिससे कि दोनों पक्षों में झगड़ा न हो, लाठियाँ न चलें। वहीं दूसरी और बुलबुल उसे उठाकर पटकने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। इस बार जब वो शैला को काँधे से उठा कर पटकने गयी, शीला ने कैसे उसकी बाँह जकड़ली।
शैला ने उससे पूछा, "क्या चाहती हो? जीतना चाहती हो कि अपने गाँव वालों को मार खाते देखना चाहती हो?"
"क्या मतलब?" अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करती हुई बुलबुल बोली।
"मतलब ये की हम में से जो भी हारेगा, उसके गाँव वाले ज़्यादा ग़ुस्सा होंगे और ज़ाहिर सी बात है यह गुस्सा वह सामने के गाँववालों पर निकालेंगे।
बुलबुल ने ख़ुद को छुड़ा लिया और अब उसने शैला को कमर से जकड़ लिया था।
"सोचो न तुम अगर जीत भी गयी, फिर मारा-मारी हुआ जिसमें तुम्हारे बाबुजी बुरी तरह से चोटिल हो गए, ऐसी जीत का क्या फ़ायदा" शैला उसे समझाते हुए बोली।
शैला की बात सही ही थी, जीतने से लाभ कम और हानि ज़्यादा थी, किसी भी लड़ाई के बाद लोगों ने पीड़ा ही सही है। युद्ध वही अच्छा लगता है जिसमें आपके प्रियजन शामिल न हो।
बुलबुल को शैला की बात समझ आने लगी, वह पिछले दंगलों में अपने पिताजी तो चोटिल होते देख चुकी थी शायद, इसलिए उसने झट से शैला पर अपनी पकड़ ढ़ीली कर दी और उससे पूछी,
"तो हम क्या करें"।
शैला और बुलबुल में फिर न जाने और क्या बात हुई, लेकिन जो भी बात हुई उसका नतीज़ा ये हो रहा था कि दर्शक समझ नहीं पा रहे थे क्या हो रहा है। ऐसा लगता लगता कि अब ये पटक देगी की दूसरे का पलड़ा भारी हो जाता, अगले दस मिनट तक दोनों ने यही सिलसिला जारी रखा।
तभी शंख की आवाज़ हुई, शैला और बुलबुल ने इतना तो सुनिश्चित किया कि दोनों में से कोई न जीते, कोई न हारे। पर क्या वह लड़ाई रोकने में सफल हो पाए थे?
दोनों गाँव के लोगों के हाथों में आगे बढ़ती लाठियों को देखकर तो ऐसा नहीं लग रहा था। लग तो रहा था कि नदी के पानी का रंग आज लहू का हो जाएगा। तभी बुलबुल ने शैला को कस के गले लगा लिया और अगले ३ से ५ मिनट तक गले से लगाए रखा। उन दोनों को इस तरह प्रेम से एक दूसरे को गले लगाते देखते हुए, हाथों में उठी लाठियाँ उठी ही रह गईं, चल ही नहीं पाईं। शैला के आँखों से आँसू झर आये। नफ़रत को जीतना है तो शास्त्र, हथियार नहीं, प्रेम ही कारगार साबित होता है।
संजय ठाकुर ने प्रफुल्लित होकर कहा,
"ये तो चमत्कार हो गया, धरमपुर भी जीता, सिकंदरपुर भी जीता, किसी का माथा भी नहीं फूटा।"
यह सुनकर लोगों ने ठहाका मारा। भइकक्का ने मरखा को गले लगया, बाकी भी दोनों गाँव के लोग एक दूसरे से गले मिले, पूर्णिमा की एक दूसरे को बधाइयाँ दी।"
संजय ठाकुर ने ज़ोर से सबसे जयकारा लगवाया।
"गँगा मैया की,
गँगा मैया की
गँगा मैया की"
बेगूसराय कोरोना मुक्त ही नहीं, बल्कि हिंसा मुक्त, द्वेष मुक्त भी हो चुका था।
शैला और बुलबुल ने घूम-घूम कर ख़ूब चूड़ियाँ खरीदी और ख़ूब समोसे खाये। यह सब होते हुए संजय ठाकुर की आवाज़ लगतार गूंजती रही।
"ऐसा चमत्कार मैंने अपने जीवन में नहीं देखा,
" रण का मैदान बना जश्न का मैदान"
"यदि युधिस्ठिर और दुर्योधन स्त्री होते तो महाभारत कभी न होती
स्त्री ही शक्ति है, स्त्री ही पूजा है
इन स्त्रियों को संजय का प्रणाम"
मेला ख़त्म हो चुका था, रात हो चुकी थी, लोग घर जा चुके थे। दारोग़ा की जीप नदी के पुल पर आई, वह सब अचरज़ में पड़ गए थे, यहाँ तो कायापलट हो चुका था।
चूँकि पूर्णिमा की रात थी, नदी अत्याधिक चमक रही थी, और नदी के तट पर चमक रहे थे उठा के पटकी हुईं, त्याग की हुई लाठियाँ।
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tagorekalabpl
कोरोना का ज़िक्र नहीं होता तो भी कोई लोड नहीं था। स्त्री से इतर बात बच्चों पर लाकर ख़तम की जाती तो जायदा असरदार मामला होता। प्लाट बहुत अच्छा है और सुन्दर दृश्य भी बने हैं।
sumitkati
Kahani ho toh aisee ho... Very well articulated, with excellent flow of thoughts clubbed with various emotions and penned down with most thoughtful words... Excellent piece of writing
anujkadam984
Very impressive
Description in detail *
Thank you for taking the time to report this. Our team will review this and contact you if we need more information.
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