बेशकीमती

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बेशकीमती

"डाकटर साहेब ऐजे बैठतऽ हीं की?

एक कड़क देसी आवाज सामने से आती है।

जवान, चेहरे से जटिल दिखने वाला एक पुरुष, एक गर्भवती, उम्र में खुद से छोटी और पसीने से लथपथ महिला के साथ खड़ा था।

सामने से जबाव आता है- " यह पूरी लेन हीं डाॅक्टरों की लेन है। आपको कौन से डाॅक्टर से मिलना है? "

"अजी, तुहऽ त देखिइये रहल हो, हमर घरवाली पेट से हके, से ऐकरे दिखावे के हे | जे कौनो अइसन जनी डाकटरनी होए जे माय आउ बुतरउआ दोनहुं के एलाज आउ जांच कर देतऽ त जरी ओकर पतवा बता दऽ। बतला देवऽ त मेहरबानी होतइय, हमनीं बडी दूर से अइलिये हऽ।"

"हाँ, यहाँ से आगे जाकर बायें पर एक स्त्रीरोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ महिला डॉक्टर बैठतीं हैं।"

"जी,धनवाद ।"

पुरूष महिला को लिए बताये रास्ते की तरफ बढ़ा।

दोनों एक निजी क्लिनिक के सामने पहुँचें।
"डाकटर शालिनी.. स्त्रीरी रोग एवम परसूति विसेसगग..।" पुरुष कहता है।

बगल में एक और बोर्ड लगा था जिसपर लिखा था-
'यहाँ किसी भी प्रकार की गैरकानूनी भ्रूण लिंग जाँच नहीं होती है।'

पुरूष ने वो बोर्ड नहीं देखा और उसके साथ खड़ी महिला शायद पढ़ी-लिखी नहीं थी या फिर वो अपनी बैचैनी की वज़ह से किसी भी चीज़ पर ध्यान देने में असमर्थ थी।

दोनों अंदर जातें हैं। पुरुष महिला को सामने वाली कुर्सी पर बिठाकर काउंटर के आगे खड़ी लाईन में शामिल हो जाता है।

महिला कुर्सी पर बैठ तो जाती है किंतु वो अभी भी बहुत व्याकुल प्रतित हो रही थी।

पुरूष भी कुछ देर बाद उसके पास आकर बगल वाली कुर्सी पर बैठ जाता है।
"नंबरवा लग गेलो हऽ। बारी अइतऽ त इसबन हमनीं के खुदे बुलइऽ थीं। आउ तू चिंता न कर, लड़कावे होतइए। बडी हाथ जोड़लीइय हऽ देओतन के आगे। आउ लड़की होतइए त फिन का चारा हऽ, गिरावा अइयहं ऊ बगिल वाले नर्सिंग होमा में।"

महिला कोई जबाव नहीं देती है।

इधर-उधर ताकने के बाद पुरूष फिर कहता है-"तू ऐजे बैइठहऽ। जबतलक हमनीं के नंबरवा अइतए तबतलक त हम अगिलबगिल से चायओ-बिस्कुटवो ले के आ जइबेऽ। भूख तो तोरो लग गेलो होत, कि ? "

महिला हाँ में सिर हिला देती है।

पुरूष के जाने के बाद महिला अपने आस-पास बैठे लोगों पर नज़र घुमाती है। उसके पास हीं एक और औरत पानी के बोतल के साथ बैठी थी। उसके चहेरे से विनम्रता साफ़ झलक रही थी।

महिला कुछ देर तो उससे बात करने के प्रयास में चुप रहती है। फिर कुछ क्षण रूकने के बाद हिचकिचाते हुए धीमी आवाज़ में उससे पूछती है- "कि तू मगही समझऽ हू?"

"जी, मैं बोल नहीं पाती पर समझती जरुर हूँ। शहर से भले हूँ पर हूँ तो बिहार से हीं।"

हमरा लगलइहऽ की तू सहर के जन्नी, कि जाने तू हमर भसवा समझऽवु कि न? अच्छा, एगो बात पुछीयोऽ?"

"जी, पूछिये।"

"के सच्चे एहां डाकटर बता देऽ हें कि बच्चावा लड़का होते कि लड़की?"

औरत उसका सवाल सुन अचरज में पड़ जाती है।
"जी, नहीं! यह डाॅक्टर साहिबा ऐसा कोई गलत काम नहीं करतीं हैं।
क्या आपने सामने लिखा हुआ बोर्ड नहीं पढ़ा?"

"काहे, कउची लिखल हको उ बोर्ड मऽ ?"

"यही कि यहाँ भ्रूण लिंग जाँच नहीं होती और यह करना गैरकानूनी है।"

"माने?"

"मतलब यहाँ डाॅक्टर यह नहीं बताती कि पेट में पल रहा बच्चा लड़की है या लड़का।
वह सिर्फ बच्चे और माँ के स्वास्थ्य की जानकारी, संबंधित हिदायतें और दवाएं देंगी।"

यह सुनकर महिला सुकून भरी आभा के साथ मुस्कुराती है।

इससे पहले उन दोनों में और बातें होती, महिला का पति हाथ में बिस्कुट का पैकेट लिए आ रहा होता है। उसके आने के बाद महिला कुछ नहीं कहती। थोड़ी देर बाद उनका नम्बर आने पर दोनों का नाम पुकारा जाता है और दोनों अंदर चले जातें हैं।

डाॅक्टर कुछ देर अकेले में महिला की कुछ जाँच और सवाल-जबाव करने के बाद दंपत्ति को सामने बैठने को कहती हैं।

"इससे पहले कहीं दिखा रहे थे किसी डाॅक्टर से?"

"जी, गामे में एगो हस्पताल हऽ, ओजे से।" पुरुष कहता है।

"अच्छा, घबराने की कोई बात नहीं है। चार महीने बाद इनकी डिलीवरी की संभावना है। फिलहाल सब ठीक है , बस इन्हें अच्छा खाना खिलाइये और जो दवाइयां लिख रहीं हूँ वो इन्हें दिजिए।"

"जी, बच्चवा लड़का हऽ कि लड़की ?" पुरूष फिर कहता है।

"इससे क्या फर्क पड़ता है? जो भी रहे स्वस्थ रहे, आप इसकी चिंता कीजिए।"

"मेडम जी, एगो त तोहर फीस एतना हको ओकरो में हमनीं गांव घर छोड़ ऐजा एतना दूर अयलि हंऽ, काहे ला, जादे जनकारीइए खातिर न? तू जरी बता देबऽ त हम सबनी ओहे हिसाब से अप्पन तैयारी कर लेबऽ, आउ कउची।"

"किस तरह की तैयारी करनी है आपको? ज़रा मुझे भी बताइये।"

"हम्मर पहिले से एगो लड़की हऽ के। आउ लड़की के बियाह एसों करना जरूरी होवऽ हे, ओकरो पे एतना तिलक- दहेज़ हम गरीबन केजा से दे सकम? हमनीं त जन-मजूरी करके जइसे तैइसे अप्पन पेट पाल रहलइये हऽ। आउ एगो लड़की केजा से संभाल पा सकलइये हऽ?"

डॉक्टर गंभीर होते हुए कहती हैं "तो,आपलोगों को बच्चा करना हीं नहीं चाहिए था। लड़की पालने में ऐसी क्या दिक्कत आयेगी जो लड़के में नहीं आयेगी? अगर लड़की को भी पलने-बढ़ने का मौका दोगे, पढाओगे- लिखाओगे, तो वो भी किसी से कम नहीं हैं। इनसब चीजों पर ध्यान देने से अच्छा है तुम अपनी पत्नी और बच्चे का ध्यान रखो। और कुछ ऐसा वैसा करने की सोचने से पहले याद रखना, तुम्हारा नाम-पता मेरे पास नोटेड है और पुलिस चौकी तो तुम्हारे गाँव में भी होगी हीं। मेरे सामने यह बात पूछ ली, पूछ ली। किसी और डाक्टर के सामने यह बात करते तो सीधा जेल जाते। इस तरह की जाँच करना और कराना दोनों अवैध है।"


उसकी पत्नी पल्लू में अपना मुँह छुपाए मुस्कुरा रही थी और पुरूष मुँह बनाए, बड़बड़ता हुआ वहाँ से जाने लगा-"इ बड़कन लोग के कउची बुझइतइयऽ, हम गरीबन के कउन कउन दिक्कत आवऽ हऽ?"

इस दंपत्ति से मिलने के बाद डाॅक्टर की नज़र सामने रखे स्थानीय अखबार पर पड़ती है जिस पर बडे़ बडे़ अक्षरों में लिखा होता है- ' राज्य के 17 जिलों में कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए चलेगा अभियान।' अब न जाने क्यों, वह परेशान होतीं दिख रहीं थीं। वह सोचने लगती है कि आखिर क्यों नहीं स्वीकारते हैं कुछ लोग बेटीयों को? वो क्यों नहीं जान पाते हैं उनकी कीमत? क्यों नहीं समझतें हैं कि बेटीयां आधार हैं समाज की और उन पर की गयी मेहनत सिर्फ उनकी जिंदगी नहीं बल्कि आने वाली कई पीढ़ीयों की जिंदगी संवारता है।

वह नर्स को आवाज देती है-" नर्स, लंच टाइम हो गया है। मैं कमरे में थोड़ी देर आराम करने जा रही हूँ। सबको बता दीजिए मैं चार बजे बैठूंगीं।"

डाॅक्टर के कानों में उसकी माँ कि आवाजें गूंज रही थी। डाॅक्टर और उसकी माँ से संबंधित जो भी बातें उसकी माँ ने उसे बतायीं थीं और बाकी चीजें, जो उसने खुद अपने सामने होते देखा था, सब उसके आँखों के सामने किसी चलचित्र के दृश्य की तरह आने लगें।

डाॅक्टर शालिनी की माँ एक बहुत सामान्य परिवार से थीं। परिवार भले सामान्य था पर रूप-रंग में वो बहुत आकर्षक थीं। परंतु इस खुबसूरती को गुण कहा जाए या दोष पता नहीं? क्योंकि इसी खुबसूरती की वजह से जवानी में कदम रखते हीं उनकी शादी के लिए कई रिश्ते आने लगें। वह चाह कर भी अपनी पढ़ाई दसवीं के आगे पूरी ना कर सकीं और उनकी शादी शालिनी के पापा से करा दि गयी।

पापा तो माँ को बहुत चाहते थें पर दादी को माँ फूटी आंख बर्दाश्त ना होती थी। दादी जरूरत से ज्यादा रुढ़िवादी सोच से ग्रसित थीं। लेकिन पापा का माँ के लिए प्रेम, दादी की कठोरता को काटता रहा।

जब माँ गर्भवती हुई और शालिनी पेट में आयी तो दादी की जिद्द थी कि वह दादी कहलायेंगीं तो सिर्फ पोते की। अगर पोती हुई तो उनसे किसी भी प्रकार के स्नेह कि उम्मीद ना रखी जाए। माँ-पापा आये दिन रोज़ दादी के मूहँ से इस तरह की बातें सुनतें और अपनी पूरी कोशिश करतें की उनकी इन बातों का असर अपनी खुशियों पर ना पड़ने दें।

पापा अकेले में माँ को कहतें- "बेटीयां तो भगवान का आशीर्वाद होतीं हैं, सौभाग्य वालों को मिलतीं हैं। माँ को क्या पता, कोई बहन ना होने का ग़म मैंने कैसे झेला है।"

शालिनी के जन्म की खबर सुनते हीं जहाँ दादी ने माथा पकड़ लिया था वहीं पापा ने खुशी के मारे शालिनी की माँ को गले लगा लिया था।

पर दोनों की खुशियों पर गाज़ तब गिरी, जब शालिनी के जन्म के कुछ दिन बाद हीं पेशे से वकील पापा की उनकी वजह से सज़ा पाये कुछ बदमाशों ने बदला लेने के लिए दिन-दहाड़े बाज़ार में चाकू मार कर हत्या कर दी।

इस दुर्घटना के बाद दादी के ताने अभद्र गलियों में तब्दील हो गयें। वो अपने हर दुख का दोषी पोती और बहु को मानतीं थीं। उन्होंने अपनी पूरी कोशिश की दोनों माँ-बेटी किसी कुएँ में गिरकर अपनी जान दे दे या खुद को आग लगा ले।

पर शालिनी की माँ ने ना सिर्फ अपने उस कठिन जीवन को जीने का फैसला लिया बल्कि शालिनी को अच्छी जिंदगी देने का वादा भी खुद से किया।
इसी ख्वाहिश में वो अपनी नवजात को लिए एक दिन दादी के घर से निकल गयीं।

पर जिंदगी सिर्फ फैसलों से कहाँ सुलझती है? हाँ, रास्ता जरूर बन जाते हैं अहम फैसले लेने के बाद।

अकेले बच्चे को पालने के भार में माँ ने स्वयं को पूरा झोंक दिया। वो आधा वक्त लोगों के घरों में खाना बनातीं और आधा वक्त कपड़े सिलतीं। जब उन्होंने अपने संघर्ष और अकेलेपन को लगभग स्वीकार हीं लिया था तभी उनकी खुबसूरती ने उनपर फिर वार किया। वह जिस कपड़े की दुकान के लिए सिलाई किया करतीं थीं उसी दुकान के मालिक का दिल शालिनी की माँ पर आ गया। इस बात से अवगत होने के बाद, पहले तो कुछ दिनों तक वह चिंतित रहीं। पर जब अनन्तः सामने से शादी का प्रस्ताव आया तो शायद बड़े दिनों बाद हीं सही पर उन्हें भी अपने अकेलेपन का अहसास हुआ। वह सोचने लगीं कि हो सकता है ईश्वर अब उनकी परीक्षाएं खत्म करने की सोच रहें हों। तभी तो कोई खुद समाने आकर स्वेच्छा से उन्हें और उनकी बेटी को स्वीकार रहा है। हो सकता है इस शादी के बाद माँ-बेटी को नई और बेहतर जिंदगी मिल जाए।

पर अफसोस कि यह उनकी गलतफ़हमी थीं। उनके जीवन का संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ था।

शालिनी की माँ ने अपनी बच्ची और खुद के अच्छे भविष्य के लिए दूसरी तो कर ली थी। पर शादी के कुछ दिनों बाद हीं शालिनी का दूसरा पिता शालिनी को अनाथालय भेजने के बात करने लगा।
दादी तो सिर्फ अभद्र गालियाँ और दिन-रात ताने हीं दिया करती थीं शालिनी की माँ को। पर इस आदमी ने तो कुछ दिनों में हीं उनके साथ मार-पीट भी शुरु कर दिया था।
शालिनी की माँ का काम तो शादी करते हीं छूड़वा दिया था उस आदमी ने। बाद में उसने शालिनी के स्कूल के लिए पैसे देने से भी मना कर दिया।

शालिनी की माँ अब परेशान होने लगी थीं फिर भी उस आदमी के ह्दय परिवर्तन हो जाने के इंतजार में सब बर्दाश्त करतीं जा रहीं थीं। लेकिन उनके सब्र का बांध उस दिन टूट गया जिस दिन शालिनी के सौतेले पिता ने शालिनी पर हाथ उठा दिया।


उस दिन शालिनी की माँ समझ गयीं कि जीवन में परिक्षाएं अभी और चलेंगीं। उन्होंने फिर एक बार हिम्मत जुटाई और किसी दिन के भोर में मौका देखकर अपनी बेटी को साथ ले एकबार फिर घर पीछे छोड़ आयीं।

इस बार उन्होंने केवल घर नहीं शहर तक बदल लिया था। उन्होंने दुबारा अपनी जिंदगी अपनी बेटी और उसके बेहतर कल के नाम कर दी। और इसबार वह तब तक नहीं रूकीं जब तक उन्होंने शालिनी को एक सुरक्षित भविष्य दिला नहीं दिया।

वो हमेशा अपने अंधकार भरे जीवन की चमकती लौ शालिनी को बतातीं थीं। शालिनी के मासूम चेहरे को देखकर हमेशा उन्हें संघर्ष करने की प्रेरणा मिलती रही। और शायद यही वज़ह है कि इतनी मुश्किलों के बावजूद भी उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी।
वह अंत तक आशावादी बनीं रहीं। और शालिनी के डाॅक्टर बनने के एक साल बाद हीं उन्होंने अपनी आंखें सुकून के साथ मूंदी। पर जाने से पहले उन्होंने शालिनी को खुद के जीवन के संघर्ष की सारी कहानियां सुना दी थीं। यह जीवन गाथा सुनाना उन्होंने शायद इसलिए चुना ताकि शालिनी को वह इस बात का आभास दिला सकें और शालिनी यह बात जीवन भर याद रख सके कि वह कितनी बेशकीमती है!

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