ट्यूलिप के फूल

aastha.sneha.pathak
जीवनी
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"बाबा, मुझे भी अपने साथ ले चलो न!”
हर सुबह आयशा अपने दादाजी से कहती, जब वह अपने काम पर ननकलते थे | ६-वर्षीया आयशा को फूल-पौधों का बहुत शौक था |
फारूख पास के शहर में बाग़ में माली का काम करता था | कश्मीर घाटी के एक छोटे से कस्बे का ननवासी, फारूख का जीवन बाग़बानी में बीता था। एक छोटी सी तनख्वाह पर उसने शहर में यह काम पकडा था। जड ३६ वर्षों से उसका जीवन इसी तरह शाांनतपूववक व्यत्तीत हो रहा था; सुबह गााँव से शहर साइककल से जाता था, शाम को घर वापस। अपने हुनर और अनुभव से उसने अपने मकान के बाहर भी एक छोटा सा, सुांदर सा बाग बना ललया था। उस घर में फारूख अपनी बीवी और ३ बच्चो के साथ रहता था।
समय का पहहया घूम रहा था। एक रोज़ फारूख की बेगम रशीदा अल्लाह को प्यारी हो गई, उस अकेला छोड गई। फारूख के बेटे बडे हो गए, शादी कर ली। उन्होंने अपने वाललद को कई बार कहा, की अब इतनी मेहनत ना करो, बुढापे में आराम करो। पर फारूख हर बार बात को टाल देता, यह कह कर, "मैं घर में बैठा बैठा क्या करूांगा!"
फारूख की इस सादी जज़न्दगी में धीरे धीरे बदलाव आए, दबे पाांव, अचानक।
पहला बडा बदलाव था उसकी पहली पोती आयशा का जन्म। नन्ही सी, बबल्कुल ककसी फूल जैसी...ट्यूललप के फूल जैसी, हाां बबल्कुल!
आयशा की ककलकाररयों से फारूख का छोटा आांगन गूांज उठा। पररवार की जज़न्दगी में उमांग भर गया। फारूख को जैसे नया जीवन लमल गया हो। उसका सबसे प्यारा फूल थी वो, ना जैसा उसने कभी देखा, ना सुना था।
हर शाम जैसे वह वापस आता, आयशा उसके पास भाग के जाती।
"बाबा, आज शहर में बाज़ार लगा था?"
"हाां बेटा, बबल्कुल। जगमता, चमकता बाज़ार!"
"बाबा मुझे भी शहर के चलो ना!"
"बेटा, हम सब घूमने चलेंगे, ईद पर"
आयशा का भोला मन उम्मीद एवां कल्पना में डूब जाता।
फारूख और उसकी प्यारी पोती का पसांदीदा काम था घर के छोटे से बाग की देखभाल करना। अपने बाबा से आयशा ने बागबानी के काफी गुर इसी उम्र में सीख ललए थे। हर सुबह और शाम दादा- पोती पौधों के बीच बैठते, ध्यान से एक एक घास ननकलते थे, उन्हें पानी देते थे, लमट्टी की खुदाई करते थे। फारूख आराम से आयशा के भोले प्रश्नों का जवाब देता था। दोनों गाांव के बाज़ार भी जाते थे, वहाां दूसरे गाांव वाांलो से लमलते थे, आयशा दूसरे बच्चों से लमलती,
कुछेक लमठाई या खखलौने लेने की जज़द्द करती। कभी कभी दादा और प्यारी पोती शहर जाने वाली सडक के ककनारे बैठ जाते, और आते जाते लोगों को देखते।
समय का पहहया घूम रहा था। फारूख को एक रोज़ खबर लमली, की उसका प्यारा कश्मीर द्वांद की जस्थनत में है। अांग्रेज़ भारत छोड के जा रहे, और देश का बांटवारा कर रहे। पाककस्तान नाम का नया देश बन रहा। फारूख ने सोचा, "ये सब बडी राजनीनत की बडी बातें हैं, इससे मुझे क्या लेना देना", और अपनी जज़न्दगी में हमेशा की तरह ववलीन हो गया।
एक हदन आयशा ने बाबा से उनके सबसे पसांदीदा फूल के बारे में पूछा। "तुम, मेरी बबहटया, तुम हो मेरी प्यारी फूल!" "नहीां बाबा, ऐसा कौन सा फूल है, जजसे उगाने में आपको आनांद आया हो, जजसके फूलों को देख के आपका मन खखल उठा हो?"
फारूख ने थोडा सोचा, कफर बोला, "आखखर पूछ ही रही तो बताता हूां। मुझे ट्यूललप के फूल बहुत पसांद हैं। आसानी से लमलते नहीां, बस कहीां कहीां ही देखा है"
"बाबा मुझे भी ट्यूललप देखना है!", आयशा चहक उठी।
"बेटा मैं कोलशश करता हूां, हमारे यहाां इतना पाया नहीां जाता।"
"नहीां बाबा! मुझे ट्यूललप देखना है, और तुरांत!", बबहटया ने जज़द्द को।
फारूख मुस्कुराया। "ठीक है, मेरी अम्मी!! ले आऊांगा!"
उसी क्षण गाांव का पडोस में रहने वाले रहमान भागता हुआ फारूख के घर आया। "फारूख लमयाां, हालत ठीक नहीां! सुनने में आ रहा की पाककस्तान के कुछ लोग इधर को आ रहे। वो चुपचाप कश्मीर पर हमला करके अपने में लमलाना चाहते हैं!"
फारूख कुछ समझ नहीां पाया…"आप क्या कहना चाह रहे?"
"अरे फारूख भाई, बदलाव का समय चल रहा, अफरातफरी मची है दुननया में! पाककस्तान नाम का नया देश बना है ना, वो कश्मीर चाहता है। जबकक कश्मीर महाराजा ने भारत के नाम कर हदया घाटी को।"
"लेककन इस सब से हमारा क्या लेना देना, हम तो छोटे से कस्बे वाले हैं.."
"भाईजान, हमारा कस्बा पाककस्तान बॉडवर के काफी करीब हो गया है। उधर से आने वाले सारी फौजें हमारे गाांव होके ही आगे बढेंगी"
"फौजें..?!"
"हााँ जी, फौजें! बांटवारा हो गया इस धरती का, पररवार उजड गए हैं, लोग घर बार छोड कर, पुरखों की ज़मीन छोड कर भाग रहे, धमव के नाम पर दांगे नछड चुके हैं। भाईजान, अपने बाग बगीचे से बाहर ननकलो और देखो क्या हो रहा दुननया में!!"
यह कहते हुए रहमान तेज कदमों से अपने घर की ओर चला गया। अभी थोडी ही देर हुआ, कक रहमान अपने पररवार के साथ सामान बाांध कर जाता हुआ नजर आया।
"रहमान लमयाां कहाां चल हदए!", फारूख ने पुकारा
"फारूख भाई, यह कस्बा अभी महफूज़ नहीां। मैं अभी के अभी अपने चाचा के यहाां जम्मू जा रहा। मेरी मानो तो आप भी कहीां चले जाओ"
"पर मैं कहाां जाऊां…"
फारूख सोच में पड गया। उसका ध्यान भाग हुआ जब उसकी प्यारी आयशा ने पूछा, "बाबा, ये सब कहाां जा रहे, क्या हो रहा?"
उसकी मासूलमयत पे फारूख मुस्कुराया उठा। "कुछ नहीां बेटा, चलो अब हम अांदर चलते हैं, खाने का वक़्त हो रहा।"
उस रात खाने के बाद फारूख अपने दोनों बेटों के साथ बैठा बातें कर रहा था। उन दोनों ने भी यह सब कुछ सुन रखा था, वो भी चचांनतत थे। बाहर का नज़ारा भी कुछ बदला बदला सा था। लोग खाना खा के अपने घरों के बाहर नहीां बैठे थे, दूर से ककसी के गाने की आवाज़ नहीां आ रही थी, घरों के जलते चूल्हों का धुांआ नहीां हदख रहा था। अजीब का सन्नाटा पसरा था। सब कुछ वही था, कफर भी बहुत कुछ बदला बदल सा था।
थोडी देर बाद फारूख और उसके बेटे सोने के ललए घर के अांदर चले गए। हदन भर की थकान के बाद फारूख की आाँख तुरांत लग जाती थी, पर आज उन्हीां आाँखों में नीांद कहाां! ककसी तरह करवटें बदलते बदलते रात कट रही थी।
तभी अचानक फारूख को कोई हलचल महसूस हुई। वो चौकन्ना हो गया। कदमों की आवाज़ आ रही थी, कई लोगों की, वो भी बबल्कुल पास। फारूख घबरा गया। वह उठ कर अपने बेटों के कमरों की ओर बढा। जैसे ही उसने कदम बढाए, उसका कलेजा मुांह को आ गया। उसके घर के अांदर करीब 10-12 लोग घुस चुके थे, उसके दोनों बेटों को पकड रखा था। बडे बेटे की बहू आयशा को लेकर कोने में दुबकी हुई थी। फारूख सन्न होकर इस दृश्य को देख रहा था। 2 लमनट तो उसे समझ नहीां आया कक हो क्या रहा।उनमें से एक ने फारूख को कहा, "चाचजान, हम पाककस्तान से हैं, चलोगे हमारे साथ उस पार?"
"बेटा, हम सीधे सादे कस्बे वाले हैं, हमें बख्श दो, चाहे जो लेना है के लो, रुपए पैसे, जो भी है.." फारूख बडबडाया।
तभी अचानक उसकी नज़रों के सामने उसके बडे बेटा का गला रेत हदया गया।
फारूख को लगा जैसे पूरा घर घूम रहा हो। अगले चांद पलों में क्या हुआ, उसे होश नहीां। उसके दूसरे बेटे ने सांघर्षव ककया, उसके सर पे ककसी ने वार ककया और वह नीचे चगर पडा। कफर एक दररांदे कक नजर आयशा और उसकी माां पर गई। आांखों में नाचती दररांदगी ललए कुछ लोग उनकी तरफ बढे। फारूख लडखडाया और आगे बढा, "आयशा!!", उसकी चीख गले में ही रह गई। ककसी ने उसके सर पर ज़ोर से वार ककया। सब कुछ सुन्न हो चला। फारूख के लडखडाते
कदमों के साथ साथ उसकी दुननया उसके सामने चगर गई। धुांधलाती आांखों से उसे उन हैवानों से नघरी आयशा नजर आयी, बेहोश होने से ठीक पहले उसने उसकी चीख सुनी, "बाबा!"
जाने ककतने हदनों बाद फारूख को होश आया। उसने खुद को एक अस्पताल में पाया। बदहवासी की हालत में उसने आस पास देखा, और उसके मुांह से चीख ननकाल पडी। एक नसव ने आकर उसे एक इांजेक्शन दे हदया। वह कफर से बेहोश हो गया।
अांग्रेज़ गए। हहन्दुस्तान बांटा, पाककस्तान बना। कश्मीर को लेकर जांगे हुईं, वातावलाप हुए, चचावएां हुईं। बडे बडे नेताओ ने भार्षण हदए। लेककन आयशा को यह सब कहाां समझ थी। उसे तो बस ट्यूललप के फूल चाहहए थे..।
समय का पहहया घूम गया। वो कस्बा आज भी वहीां है, हाां लेककन उसका रूप बदल चुका है। वो घर भी वहीां हैं, पर टूटा पडा है। उसके बाहर की बाग अब उजड चुका है।
कुछ बातें लेककन अब भी नहीां बदली।
कश्मीर आज भी बबावद हो रहा।
और फारूख आज भी ट्यूललप के फूलों का गुच्छा ललए आयशा की राह तक रहा..

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