पिछले वीस वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं में लिखते आ रहे हैं। उनकी पुस्तकें हैं-
परम की प्रतीति (Realisation of the ultimate): आध्यात्मिक पृष्टभूमि पर लिखा ऐसा उपन्यास है जिसमें पुनर्जन्म, स्वयं की मृत्यु से साक्षात्कार, परलोक गमन, भावों की शक्ति, योग और ईश्वर प्रणिधान जैसे विषयों का तार्किक एवं जीवन्त वर्णन है, जिसे पढ़कर आप बहुत कुछ सोचने को विवश हो जाएँगे।
अपने पराये: कहानी संग्रह है। 'अपने' और 'पराये' को लेकर वर्माजी की समझ परम्परागत मान्यताओं से भिन्न है। सांसारिक मान्यता तो यह है कि जिनके बीच रक्त का सम्बन्ध है, वे 'अपने' हैं और जिनके बीच रक्त सम्बन्ध नहीं, वे 'पराये' कहलाते हैं। परन्तु विवेक दृष्टि से देखने पर ‘अपने पराये' की पहचान में 'रक्त' का कोई महत्व नहीं है। यहाँ महत्व है आचार-विचारों का। जिनके आचार-विचार आपस में मिलते हों, वे 'अपने' हैं। रक्त-सम्बन्ध होने पर भी जिनके आचार विचार नहीं मिलते उन्हें 'पराये' समझें। ऐसे विचारों को पुष्ट करनेवाली वर्माजी की खट्टी-मिठ्ठी और समुन्दरी हवाओं सी नमकीन कहानियों के मिश्रित फ्लेवर और रंग आपको अवश्य पसन्द आयेंगे।
लेखक ने असमीया भाषा से हिन्दी में अनुवाद भी किये हैं-दार्शनिक असमीया लेखक स्व. राधानाथ फूकन की रचनाएँ उपनिषदीय कथाएँ, विज्ञान के उस पार, जन्मान्तरवाद एवं विविध रचनावली का हिन्दी अनुवाद ग्रंथ (प्रथम-खण्ड) और सांख्य दर्शन, वेदान्त-दर्शन और श्रीमद्भगवद्गीता की टीकाओं का हिन्दी अनुवाद ग्रंथ (द्वितीय-खण्ड), दोनों शीघ्र प्रकाशित होने वाले हैं।