ज़िंदगी एक ऐसी यात्रा है जहाँ मंज़िल से ज़्यादा रास्ते हमें सिखाते हैं। "चला चल राही" विजय वर्मा द्वारा लिखित एक ऐसी ही दिल को छू लेने वाली किताब है, जो आम आदमी के संघर्ष, अनकहे रिश्तों और ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव को बेहद करीब से दर्शाती है।
किताब का सफर राजस्थान के शिवगंज की उन खट्टी-मीठी यादों से शुरू होता है, जहाँ दोस्तों के साथ की बेफ़िक्री, 'चोरी-चोरी' की दावतें और पिंकी के साथ एक अनकहे रिश्ते की ऐसी कहानी है जो आगे चलकर माउंट आबू में एक साध्वी 'राधा' के रूप में नया मोड़ लेती है। ये किस्से आपको हंसाएंगे भी और एक अजीब सा सुकून भी देंगे।
सफ़र आगे बढ़ता है तो कहानी हमें बनारस के घाटों पर ले जाती है, जहाँ एक पढ़ा-लिखा शख्स 'राजू' रिक्शा चलाने को मजबूर है। विदेशी पर्यटक एंजेला के साथ उसकी निःस्वार्थ दोस्ती, रघु काका का दर्द, और फिर कोरोना महामारी के भयावह दौर में भूख, लाचारी और पैदल अपने गाँव लौटने का सफ़र—यह हिस्सा इंसानियत, दर्द और मजबूरी का बिल्कुल सच्चा आईना दिखाता है।
यह किताब सिर्फ कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि उन सभी 'राहियों' के लिए एक प्रेरणा है जो ज़िंदगी की मुश्किलों में गिर कर दोबारा उठना और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ना जानते हैं।
अगर आप ऐसी कहानियों की तलाश में हैं जो सीधे दिल में उतर जाएं और आपको जीने का एक नया हौसला दें, तो यह किताब आपके लिए ही है। क्योंकि ज़िंदगी का बस एक ही फलसफा है— "चला चल राही..."
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