खुतूत उन अनकहे शब्दों और अधूरी भावनाओं की कथा है, जो समय पर कहे नहीं जा सके और फिर ख़त बनकर यादों में जीवित रह गए। यह पुस्तक प्रेम, प्रतीक्षा और बिछड़न की एक संवेदनशील यात्रा प्रस्तुत करती है, जिसकी पृष्ठभूमि में गाँव की सादगी, शहर की जटिलता, स्कूल और कॉलेज का जीवन तथा रिश्तों की नाज़ुकता सहज रूप से उभरती है। खुतूत किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि हर उस मन की आवाज़ है जिसने कभी पूरी सच्चाई से चाहा हो और फिर परिस्थितियों के आगे मौन चुन लिया हो। इस कथा में ख़त केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं का आईना हैं, जिनमें प्रेम, आशा, पीड़ा और स्वीकार एक साथ झलकते हैं। यह मिलन की नहीं, बल्कि समझ और आत्म-स्वीकार की कहानी है—एक ऐसा दुखांत जो पाठक को उदास करने के बजाय भीतर से और गहरा, संवेदनशील और मानवीय बना देता है।