यह पुस्तक उन सभी के लिए है—
जो टूटकर भी ईश्वर से प्रश्न नहीं करते,
बल्कि उसी मौन में उत्तर खोजते हैं।
जो संघर्ष को दंड नहीं,
आत्मा की दीक्षा मानते हैं।
जो प्रेम को अधिकार नहीं,
एक ऐसी करुणा समझते हैं
जो जीवन को चुपचाप जोड़ती चली जाती है।
यह पुस्तक उस क्षण की भी साक्षी है
जब एक नन्ही किलकारी—मायशा—
थके हुए जीवन में
फिर से प्राण फूँक देती है,
और उस प्रतीक्षा की भी,
जब एक अजन्मा अतिथि
अपनी मौन उपस्थिति से ही
पूरे अस्तित्व को पूर्ण कर देता है।
यह पुस्तक उनके लिए है
जिन्होंने बहुत सहा,
पर विश्वास को नहीं छोड़ा।
क्योंकि अंततः
ईश्वर उन्हीं को संतान, शांति और अर्थ देता है
जो हर मोड़ पर
समर्पण के साथ चलते रहते हैं।
- डॉ महेंद्र सिंह गोले