कलियुग वह युग है जिसमें हर मनुष्य अपने ही भीतर गिर चुका है। लगभग हर रिश्ते में प्रेम और समझ की जगह अहंकार ने ले ली है। इंसान वासना और इच्छाओं के पीछे पागलपन की तरह भाग रहा है। हर व्यक्ति भगवान का नाम तो लेता है, और खुद को सबसे बड़ा भक्त दिखाता है, लेकिन अपने भीतर वह जानता है कि वह वास्तव में कैसा है। धोखा और लालच जीवन का सामान्य हिस्सा बन चुके हैं। मन बोझिल हैं और हृदय अशांत। लगभग हर व्यक्ति चिंता और अवसाद में जी रहा है, क्योंकि वह केवल लेना चाहता है, देना नहीं। “सब कुछ मुझे ही मिले” की चाह ने करुणा, धैर्य और आंतरिक शांति के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा है। यह पुस्तक उसी कलियुग को प्रकट करती है जैसा कृष्ण ने उसका वर्णन किया था, और उससे ऊपर उठने का वह मार्ग भी दिखाती है जो उन्होंने बताया।
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