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Prayojanamulak Hindi / प्रयोजनमूलक हिन्दी Prayojanamulak Hindi

Author Name: Dr.s.a.manjunath | Format: Paperback | Genre : Educational & Professional | Other Details

प्रयोजनमूलक में ‘प्रयोजन’ शब्द के साथ ‘मूलक’ परसर्ग लगने से प्रयोजनमूलक पद बना है। प्रयोजन से तात्पर्य है ’उद्देश्य’ अथवा ’प्रयुक्ति’। ‘मूलक’ से तात्पर्य है आधारित। अत: किसी विशिष्ट उद्देश्य के अनुसार प्रयुक्त भाषा को प्रयोजनमूलक भाषा कहते हैं । इस प्रकार प्रयोजनमूलक हिन्दी से तात्पर्य हिन्दी का वह प्रयुक्तिपरक विशिष्ट रूप या शैली है जो विषयगत तथा संदर्भगत प्रयोजन के लिए विशिष्ट भाषिक संरचना द्वारा प्रयुक्त की जाती है।

प्रयोजनमूलक रूप की वजह से हिन्दी भाषा जीवित है। आज तक साहित्यिक हिन्दी का ही अध्ययन किया जाता था, लेकिन साहित्यिक भाषा किसी भी भाषा को स्थित्यात्मक बनाती है और प्रयोजनमूलक भाषा उसको गत्यात्मक बनाती है। वर्तमान जीवन में गत्यात्मक भाषा ही जीवित और प्रचलित रह सकती है। आज साहित्य तो संस्कृत में भी है, लेकिन उसका गत्यात्मक रूप-प्रयोजनमूलक रूप समाप्त हो गया है । हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप अधिक शक्तिशाली तथा गत्यात्मक है। हिन्दी का प्रयोजनमूलक रूप हिन्दी के विकास में सहयोग दे रहा है, साथ ही साथ उसको जीवित रखने एवं लोकप्रिय बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है । इन सभी दृष्टियों से विभिन्न प्रयोजनों के लिए गठित समाज खंडों द्वारा किसी भाषा के ये विभिन्न रूप या परिवर्तन ही उस भाषा के प्रयोजनमूलक रूप हैं।

इस पुस्तक में प्रयोजनमूलक हिंदी को हिन्दी की प्रकृति, प्रवृत्ति और प्रयोग के अनुरूप, छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित कर सुगम-सुबोध शैली में प्रस्तुत किया गया है । प्रयोजनमूलक हिन्दी विषय के अलावा पत्र-व्यवहार, अनुवाद, मीडिया लेखन, पुस्तक समीक्षा आदि बहुउपयोगी विषय यहाँ संगृहीत हैं ।

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manjuspc66

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डॉ. एस. ए. मंजुनाथ

कर्नाटक के जिला हासन के वणबेलगोला में जन्म । माता श्रीमति मायम्मा और पिता अंदानिगौडा। कर्नाटक के मैसूरु विश्वविद्यालय से बी.काम., एम.ए. और पी.एच-डी. उपाधियाँ प्राप्त। आगरा के केंद्रीय हिन्दी संस्थान से हिन्दी पारंगत और इलाहाबाद के साहित्य सम्मेलन से हिन्दी साहित्य रत्न प्राप्त किया । “नरेंद्र कोहली का व्यंग्य साहित्य : एक अध्ययन” विषय पर शोध कार्य संपन्न । तुलसीदास, कबीर और हिन्दी व्यंग्य साहित्य पर विशेष अध्ययन की रुचि। 1992 से 2005 तक कर्नाटक के द.क.जिला के सुल्या के नेहरू स्मारक महाविद्यालय में अध्यापन का कार्य । 2005 से 2015 तक कर्नाटक के द.क.जिला के पुत्तूर के संत फिलोमिना कॉलेज में अध्यापन कार्य करने के बाद वर्तमान में जिला मंगलूरु के पोंपै कॉलेज में 2015 से हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं ।

         ’नरेंद्र कोहली का व्यंग्य साहित्य : एक अध्ययन’, ’हिन्दी के व्यंग्य सर्जक नरेंद्र कोहली’, ’हिन्दी व्यंग्य साहित्य : एक समीक्षात्मक अध्ययन’, और ’हिन्दी में व्यंग्य विमर्श एवं नरेंद्र कोहली’, विषय पर मौलिक ग्रंथ प्रकाशित हैं । ’मार्गदर्शी’, ’हिन्दी मंगला’, ’विहास वाहिनी’, ’विहास वाणी’, ’आधुनिक हिन्दी काव्य : एक अवलोकन’, ’विहास मंगला’, ’हिन्दी कहानी और वर्तमान समय’, पुस्तकों का संपादन कार्य संपनन्न किया है । 

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशालाओं में लगभग 30 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत और प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से 25 वर्ष से हिन्दी प्रचार-प्रसार कार्य में सक्रिय हैं । लगभग 10 से ज्यादा राष्ट्रीय हिन्दी कार्यशाला एवं संगोष्ठियों का आयोन किया । वर्तमान में मंगलूरु विश्वविद्यालय हिन्दी अध्यापक संघ (विहास) मंगलूरु, कर्नाटक और कर्नाटक राज्य विश्वविद्यालय महाविद्यालय हिन्दी प्राध्यापक संघ के अध्यक्ष हैं । मंगलूरु विश्वविद्यालय प्राध्यापक संघ (अमुक्त) के उपाध्यक्ष के रूप कई अध्यापक संघटन में सक्रिय हैं। 

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