"टपरी" की कहानी हमें ऐसे वक़्त में लेकर जाती है जहाँ पर लोगों को एक दूसरे से बातचीत करने के लिए सिर्फ़ बैठक का एक ठिकाना और साथ में चाय की चुस्की के ज़ायक़े की ज़रूरत होती थी क्योंकि उनका मनोरंजन उनके जुमले, मुहावरे, गप-शप, एक दूसरे पर व्यंग्य कसना और बातूनी लोगों की बयानबाज़ी का जमघट जो की बे-बुनियादी बातों का मिश्रण होती थी अक्सर। "टपरी" शब्द से आप सभी वाक़िफ़ होंगे ही और जो नहीं उनके लिए कैफे, स्टारबक्स, कॉफी हाउस जैसी जगह आज की टपरी हैं तो अब आप सब समझ ही गए होंगे और मेरी ये टपरी एक मोहल्ले में रहने वाले दो भाइयों और उनके आस पास के किरदारों की कहानी है।
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