दोपहर का एक दिन

कथेतर
4.9 out of 5 (128 Ratings)
Share this story

मैं,मेरी मां,मेरी छोटी बहन और मेरे बड़े भाई दोपहर के भोजन के उपरांत गांव के एक छोटे से मिट्टी की कमरे में आराम कर रहे थे। उस समय मेरी उम्र करीब 5 साल की रही होगी। 5 साल की उम्र में मुझे केवल यही एक घटना अच्छी तरह से याद है जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। यह घटना मेरे गांव की है जब हम मिट्टी से बने 2 कमरों वाले घर में रहते थे। कमरे में 2 खाट बिछी हुई थी एक पर मैं अकेला और दूसरे पर मां,बड़े भाई और छोटी बहन को लेकर लेटी हुई थी। दरवाजे की ठीक पास में ही वह खाट था जिस पर मां लेटी हुई थी और ठीक उसके बगल में दूसरी खाट थी जिससे मैं लेटा हुआ था। भोजन के उपरांत बहुत अच्छी नींद आती है। मेरी मां,मेरे बड़े भाई और बहन करीब सो ही चुके थे मैं सोने ही वाला था। बचपन में मेरी आदत थी मैं पेट के बल लेट दोनों पैरों को हिलाया करता था और कब सो जाता पता ही नहीं चलता सोने की यह अद्भुत कला मैं बचपन में सीख चुका था जो इन दिनों भी काम आती है लेकिन पता नहीं क्यों आज नींद नहीं आ रही थी। तभी अचानक से मां की खाट के नीचे एक भयानक सांप को देखा। वह अपनी फन को उठाएं शांत भाव से बैठा हुआ था। अचानक से मेरी आंखें और उसकी आंखें मिल गई। हम एक दूसरे को देखने लगे बिना पलकें झपकाए। मैं उसे देखता रहा और वह भी मुझे देखता रहा। मैं इतना डर रहा था कि मेरे मुंह से आवाज तक नहीं आ रही थी मुझे लगा आज कुछ अद्भुत होने वाला है आज हम सब के लिए आखरी दिन है। मैं सांप के बारे में पहले ही सुन रखा था, सांप यदि किसी को काट ले तो उसे कोई बचा नहीं सकता। हम चारों को काट लेगा और हम सब मर जाएंगे। एक दूसरे को देखने का सिलसिला काफी समय तक चला। मैं मन ही मन हिम्मत कर रहा था कि किसी तरह से मां को जगा दू ताकि मां बड़े भाई,बहन और मुझे लेकर दूसरे कमरे में चली जाए। मै चिल्लाने की कोशिश करता लेकिन किसी भी तरह से मेरे मुंह से एक भी शब्द निकलना मुश्किल हो रहा था ऐसा लगता था की गले में स्वर ही ना हो। और उस तरफ सांप भी न जाने क्या सोच रहा था मुझे लगातार देखे जा रहा था ऐसा लगता था जैसे बरसों पुराना कोई संबंधी हो वह मुझे पहचान लिया था और मुझसे बातें करना चाहता। लेकिन सांप के पास स्वर नहीं था वह आंखों से ही बहुत कुछ कहने का प्रयास कर रहा था लेकिन उसका सारा प्रयास मेरे लिए निरर्थक था मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा था मैं इतना डर गया था कि पूरा पसीना-पसीना हो चुका था। उसकी आंखें और उसका रंग आज भी मुझे स्पष्ट याद है। मां जिन-जिन देवी-देवताओं को पूजा करती थी मैं अक्सर उन देवी देवताओं को देखा करता था। आज मुझे स्पष्ट याद तो नहीं पर मैंने उन सभी देवी- देवताओं को मन ही मन एक साथ याद कर लिया और पूरी हिम्मत लगाकर चिल्लाया। मेरे मुंह से एक ही आवाज निकली 'मां'। मां आवाज सुनते ही उठ गई मैं बिना अपनी करवट बदले मां से कहा मां खाट के नीचे बड़ा सांप है, मां ने जैसे सुना तुरंत मेरी बहन और बड़े भाई को गोद में उठाकर उछल कर दूसरे कमरे में चली गई । मां इतना डर गई थी कि मुझे लेना भूल ही गई। लेकिन इधर सांप टस से मस न हुआ और मैं भी। हम दोनों एक दूसरे को देखते रहे और मां दूसरे कमरे से हम दोनों को चुपचाप देख रही थी,मां को कुछ सूझ नहीं रहा था क्या करें? अब मैं मन ही मन समझ गया आज मैं अकेले ही स्वर्ग की यात्रा करूंगा। आज का दिन मेरे लिए अंतिम दिन है मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे । मां की तरफ से कुछ भी हरकत नहीं हो पा रही थी वह भी पूर्ण रूप से डर चुकी थी। मेरे भाई-बहन शायद उस समय भी सो ही रहे थे। उन्हें इस घटना के बारे में कुछ भी पता ना था,वे दोनों शायद सुखद स्वप्न देख रहे थे। मां और मैं मौत के सामने खड़े थे और बस अंतिम समय का इंतजार कर रहे थे कब यह सांप पहले मुझे और फिर मां को डसेगा। सांप अचानक से अपनी गर्दन को मां के कमरे की तरफ करता है। कुछ पल वह मां को देखता है और कुछ पल मुझे और यह सिलसिला कुछ मिनटों तक चला एक बार वह मां को देखता और एक बार मुझे। पता नहीं वह आज क्या करना चाहता था हम उससे डर रहे थे। क्या ऐसा तो नहीं वह हम से डर रहा था?

Stories you will love

X
Please Wait ...