मैं अगर एक वाक्य में कविता और शायरी के विषय में कुछ कहना चाहूँ तो ये मैंने नहीं लिखी है बल्कि इन्होंने मुझे लिखा है।
कुछ लोग लिख-लिख कर जीते हैं और कुछ जी-
नदी अपने उदगम स्थल से एक पतली सी जलधार के रूप में सागर/महासागर में समा कर उसके जैसा ही हो जाने का उद्देश्य लेकर जब आगे बढ़ते हुए विस्तार लेती है,तो पता नही कितने ही तटबंधों पर रुककर
दिन ब दिन मृत होती संवेदनाएं...रिश्तों का रिसाव...मानवीय जज़्बातों का अभाव और अपने अह्म से ऊपर न उठ पाने की हमारी क्रियाशीलता जब कराती है हमें एकाकीपन का एहसास, तो सहज ही उठ जाती है क
यह सब कविताएं किसी सोंची समझी गई मुहिम के तहत नहीं लिखी गई। यह खुद को मुझसे लिखवाती चली गईं। इनकी अपनी अलग अस्मिता है, मैं बस माध्यम भर हूॅ। यह उस पीढ़ी की औरतों के शब्द चित्र हैं ज