अरमान

कथेतर
5 out of 5 (10 )

अरमान और उसका बापू खुशहाल सिंह दिन भर दोनो खेत में काम कर रहे थे। उनका घऱ छोटा सा पत्थरों और लकड़ियों से बना हुआ था। कभी कभी बहुत ज्यादा पते गिरकर आते तो पत्थरों की नहीं बल्कि पतों का छत प्रतीत होता था।

बापू अपने कमरें में खराटे लगा रहे थे और वह अपने सपनों में खोया हुआ था, और सपनों में राष्ट्रीय पुरुस्कारों के ज़ोर का शोर छाया हुआ था। उसमें एक थी उसकी मुवी, “ग्रेट आर्ट विद पुअर लाईफ” उसका नाम लिया गया और लोग उसके काम के लिए तालियां बजा रहे थे, क्योंकि उसे आज के दिन राष्ट्रीय पुरुस्कार मिला था। “क्योंकि यह भी एक आर्ट है, ज़िंदगी को परदें में दर्शाने का” इसके आगे कहने ही वाला था, वह नींद से जाग गया , क्योंकि उसके चेहरे पर बारिश के पानी की बूंदें टपक पड़ी थी।

रात के तीन बजने वाले थे, और उसकी नींद भी चली गयी थी। उसने अपनी चारपायी उस जगह से हटायी और वहां पर पानी के लिए बर्तन रख दिया था। उसने खुद से कुछ बात की थी-

“किसान के हालात भी क्या हालात है, औरों के लिए अनाज पैदा कर रहा है और खुद के लिए , क्या खुद के लिए? खुद के घऱ की छत को भी ठीक नहीं कर सकता है। ऐसी गरीबीं, है क्यों?” फिर कम्बल ओढ़ लिया और सो गया था।

सुबह हुई , अरमान दूर बैठा सोच रहा था “मुझे बापू से बात करनी ही हो होगी, नहीं तो आज रात की तरह एक बूंद ही काफी है सपनों को तोड़ने के लिए औऱ मेरे जो ख्वाब हे बो भी यूं ही टूट कर बिखर जाएंगे अगर मैं यहां से शहर नहीं गया तो। सुबह जागा और बापू से कहा “ बापू मुझे इस गाँव से बाहर , बड़े शहर जाना है। और वहीँ पर काम करना है”। इतना सुना तो बापू गुस्सा हो गये और गुस्से में कहा “क्यों तुझे क्या हुआ? और शहर में जाएगा कहां?, रहेगा कहाँ? और वहाँ खाएगा क्या?

उसने यह सारी बातें सुनी और मन की उदासी में कहा था “बापू, हाँ! यह तो मुझे मालुम है। अगर मैं यहाँ पे ठहरा रहा तो, बेवजह ही जीना होगा मेरा”।

मन इतना उदास था कुछ और सोच नहीं पा रहा था , सिर्फ बापू को कोसने के सिवाय “क्यों?” मैने जो सोचा, मैने आजतक जो किया “क्यों किया?” मेरे यह सब करने से मुझे मिला क्या? और उसे कहानी की दुनिया याद आयी।

बापू परेशान था इस बात से कि उसके शहर जाने का भूत उतरा नहीं था। वह फिर बोला था “ मुझे शहर जाना है, और मैं वहां पर रह लुंगा, और खा भी लूंगा। आप मुझे यहाँ से जाने की इजाज़त दे दें। और आप अपना खुद का ख्याल रखेंगे“।

बापू फिर से गुस्सा हो गया था और कहा “मेरा ख्याल तो आज तक मैं करता आया हूँ। मुझे फिक्र मेरी नहीं, तेरी है।“ उसने बापू को आश्वासन दिया , वोह वहां पर रह लेगा, कहीं पर काम कर लेगा, और रोटी खा लेगा। खाना बन गया था, उन्होने दोनो के लिए खाना निकाला और उससे कहा “तुझे जैसा ठीक लगता है कर, जो करना चाहता है कर, और जाना चाहता है चला जा। लेकिन याद रखना “रोटी अपने घऱ में भी बनती है”।

शायद किसान सिर्फ रोटी के लिए ही बना है, रुखी-सुखी खा ले बस और ज़िंदगी ऐसे ही बसर करता रहे”।

बापू मान गया और उसे जाने की इजाज़त दे दी थी। इसका यहां से शहर जाना ही बेहतर रहेगा”।

बापू खेत में जाकर पेड़ के नीचे बैठे आराम फरमा रहा था और उसका कुछ काम करने का मन नहीं था। उसको यह छोटा सा पल पलके झपकने की तरह लग रहा था। और बापू चाहते थे, यह एक पल सदियों सा लम्बा हो।

अगली सुबह हुई , अरमान तैयार हुआ और अपने बैग को उठाया और बापू के पैरों को छुते हुए उनसे विदा ली। घऱ से जाते हुए उसने कहा “बापू में उसी लड़की से शादी करुंगा यह वादा है”।

वह कुल्लू से मुम्बई शहर निकल गया था। वोह वहाँ से बस- स्टेशन चला गया और बस में बैठकर फिल्म सिटी के लिए निकल गया था।

नया शहर था और नयापन सपनों में, इसलिए कुछ भी मालुम न होते हुए भी इस बेगाने शहर में खुश था यहाँ पहुंचकर। लगभग 3 मीलों की दूरी तय की थी, सामने से एक बड़ा ट्रक भारी सामान से लदा हुआ आ रहा था। ट्रक ड्राईवर अपनी कोशिश में लगा हुआ था, किसी और गाड़ी के साथ मुटभेड़ न हो। लेकिन उस ट्रक के साथ हादसा हो गया था।

इस हादसे को देखकर, अरमान बहुत हैताश औऱ दुखी हुआ और मन भारी हो गया था क्योंकि उसे इस शहर में कदम रखते ही यह हादसा हो गया था। उसके पास रहने का ठिकाना नहीं था। कुछ दूरी तय कर ली थी चलते हुए, सामने पार्क नज़र आया तो वहाँ चला गया और बैंच पर बैठ गया। उसे कुछ सुझ नहीं रहा था , कहाँ जाना है? ज़हन में वोही लोग और वोही हादसा नज़र आ रहा था। उसने अपना पेन और डायरी खोली, स्ट्रीट लाईट के पास जाकर बैठ गया और इसके बारें में एक पेज पर लिख दिया था।

अगले दिन बस का इंतज़ार कर रहा था , बस आयी , लोग उसमें चढ़ने लगे और वोह भी उसमें चढ़ गया, और लोगो के साथ बैठ गया। उसके पास में बैठे एक ने फिल्म सिटी की टिकट ली और उसने भी वहीँ की टिकट ले ली। अब फिल्म सिटी में पहुंचकर कहाँ जाना है सोचने लगा था। फिर सोचा वहीँ जाकर सोचेंगे कहाँ जाना है। क्योंकि उसके पास किसी कम्पनी , किसी डाईरेक्टर और प्रोडुसर का पता नहीँ था।

लेकिन ऑफिस के अंदर चला जाता और उनसे काम के बारें में बातें करता था। वो पुछते क्या काम करते हो? वह कहता “लेखक हूँ, इसी से जुड़ा काम चाहिए”। उसने अपने काम को उन्हे दिखाया , लेकिन अनिपुण कहकर उसे बाहर कर दिया गया था।

दिन भऱ काम ढूँढने के बाद रात के वक्त अपनी कहानी को लिखने बैठा था, और एक पन्ना कहानी का और जुड़ा था और दूसरे को लिखने में लगा था, कुछ शब्द थे, “इन्सान का खून और पानी इस शहर का” उतने में पानी की बूंदे आसमान के बादलों ने गिरा दी थी और उस पन्ने के शब्दो पर बूंदे गिरते ही स्याही फिकी पड़ी गयी थी। उसने अपना उनी कोट निकाला औऱ उसे कम्बल की तरह ओढ़ लिया और सो गया था।

एक महीने तक उसके कोई काम नहीं मिला , उसने एक ढाबें में काम मांगा और बदले में दो वक्त की रोटी मांगी थी और काम का वक्त शाम के 4-9 के बीच मांगा था। ढाबे वाले को महसुस हुआ था कि इसे इस शहर में काम नहीँ मिला हे जो यह करने आया था। उसने इतना कहा था “शाम के 4 बजे पहुंच जाना और 9 बजे चले जाना , और बदले में सुबह , शाम औऱ रात के वक्त का खाना खाके जाना “।

दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया था। काम तो नहीं मिला था लेकिन हाँ उमीद थी उसे अभी भी। कहते है न “उमीद पे दुनिया कायम है” उसके साथ भी यही था। आज फिर एक प्रोडेक्शन कम्पनी में काम के लिए चला गया था। वहाँ के एच आर मैनेजर से बातें चली हुई थी उसने उससे पुछा “कहानी अधूरी ही है और काम मांगने आये हो, कैसे मिलेगा काम”? वोह समझ गया था उसे काम नहीँ मिलेगा। वह वोला “हर रोज़ लिखता हूँ , शायद बहुत कम लिखता हूँ। लेकिन लेखक हूँ औऱ काम कर सकता हूँ”। उस डायरी के पनो को फिर से पलटा और आखिर तक पलटती गयी और उससे कहा “ऐसी अधरी कहानी से कुछ नहीँ होगा, इसे पूरा करो, आपको इसे पूरा करना चाहिए और आपको काम मिलेगा ज़रुर मिलेगा”। उसे खाली पन्नो के आगे फिर से लिखा हुआ मिला और उसे पढ़ा । इस पने पर लिखा था “”यह शहर बहुत कड़वा है औऱ बहुत मीठा भी।

उसने इतना पढ़ा और उसे लगा , लिखता अच्छा है लेकिन कहानी अधूरी है फिर भी काम पर ऱख लेना चाहिए। यह लिखने का काम कर लेगा। उसने उसे काम पर ऱख लिया था । अगले दिन से काम पर चला गया और उसे उस कम्पनी के सिनियर लेखक के साथ काम करने के लिए कहा था। हर दिन एक नये किस्से के लिए कहानी लिखते थे। शुरुआत में उसका लिखा हुआ कम्पनी को अच्छा नहीँ लगा था। क्योंकि वह हर किस्से में सच्चाई लिखता था , जो काम ही नहीँ आती थी क्योंकि लोगो को यह भाती नहीं थी

पहली सैलरी मिली, उसने एक छोटा सा रुम किराये पर ले लिया था। एक महीना बीत गया था, इतने दिनो में उसका कोई दोस्त नहीं बना था, हाँ कम्पनी के और आसपास के कुछ लोगों से जान-पहचान हो गयी थी। हाँ एक दोस्त था, जो था ढाबे का मालिक।

उसका परिवार , उसके बापू से कभी कबार बात होती थी, दोनो का एक ही सवाल होता था “क्या अपना ख्याल रख रहे हो”? और दोनो का एक ही जबाव होता था “हाँ”।

दो साल बीत गये थे, उसकी दोनो कहानियां वहीँ पर रुकी हुई थी। अपनी कहानी “द ग्रेट आर्टस विद पुर लाईफ” को फिर से लिखना शुरु कर दिया था। उस कहानी को वहीं से लिखते हुए शुरू किया था, लेकिन कुछ देर बाद कहानी में दोस्तों का जिक्र होना था, और हुआ ही। उसे अपने गांव के दोस्तों की याद आ गयी थी और आंखे नम हो गयी थी। दोस्त के नाम से भावुक हो गया था। उन पन्नों में दो दोस्तों की मौत हो गयी थी। दोनो दोस्त दोनों की याद में डुबे हुए थे। उन्हे बहुत दु:ख होता है दोनो का दुनिया को छोड़कर जाने का। आखिर में दोनो दोस्त , एक के शरीर को मिट्टी देने लगे थे, और दूसरे को आग दी गयी थी। उसने अपने दोस्तों को याद किया था, और सोच में था “ कैसे होगें वो सब”?

छ: महीने और बीत गये थे। आज की रात को उसने कहानी का आखिरी पन्ना लिख दिया था। वह उस कहानी को डायरेक्टर ऑफ क्रिएटिव राईटर के पास लेकर चला गया था। उसने उसको कुछ देर पढ़ा और उससे कहा “मैं इसको घर ले जा रहा हूँ, पूरा पढ़ने के बाद तुम्हे लौटा दूंगा यह भी कहकर गया था “ मैं इसे फिल्म डायरेक्टर के पास भेज रहा हूँ। अगर उनको कहानी पंसद आयी तो मैं तुम्हे इनफॉरम कर दूंगा।

वह रुम में बैठा सोच रहा था, अगर मेरी कहानी पर फिल्म बनेगी तो!

अब मेरे बापू के घर की छत से बरसात की बूंदे नहीं टपकेगी। हमारा बड़ा घऱ होगा, और बापू कोई काम नहीँ करेगा क्योंकि सारा काम लेवरों से करवाउंगा। अपने दोस्तों के साथ इन्ह, उन्ह, उन्ह-उन्ह जगहों पर घुमने निकलुंगा।

उसी वक्त उसके दोस्त की कॉल आयी थी। अनजाना नंबर था, लकिन आवाज़ से पहचान लिया था। उसकी आवाज़ सुनकर बहुत खुश हुआ था। और खुद से कहा था “ आज का दिन मेरे लिए कितना लकी है”।

उसने उससे कहा था “कैसा है तू”? उसने कहा “मैं ठीक हूँ, लेकिन तुझे गाँव वापस आना होगा”। उसने कहा “हाँ मैं आउंगा, कुछ दिनों का काम है”। उसका दोस्त रोने लगा था और नम आंखों से कहा था “ बापू इस दुनिया में नहीँ रहे, दुनिया छोड़कर चले गये है। उसने जो सपने अभी अभी बुने थे, सब बिखर गये थे।

वह अपना सामान पैक करके घर पहुंचा, उसने और उसके दोस्तों ने बापू को कांधे पर उठाया और उसके आखिर सफऱ को शमशान की ओर लेकर चले गये थे।

अरमान उस गाँव की लड़की से मिला था। उसने उसे शादी के लिए प्रपोज़ किया था, और अपने बापू की इच्छा को पूरी करना चाहता था। लेकिन उस लड़की ने शादी से मना कर दिया था।

20 दिन बाद, उस डायरेक्टर ऑफ क्रिएटिव राईटर का कॉल आया था। उसने बताया “आपकी कहानी को डायरेक्टर ने फिल्म के लिये चुन लिया है औऱ इस पर फिल्म बनाने जा रहे है, यहाँ आ जाओ”। उसने इधर का सोचा था न उधर का और कहा था “जी मैँ आया “ ।

The End

*********************************************

যেই গল্পগুলো আপনার ভালো লাগবে

X
Please Wait ...