मैं वास्तविक हूँ
वास्तविकता से मुँह फेर लेता हूँ
“ an oft-time reading an in-time friend “
पुस्तक 177 ग़ज़लों व कविताओं का संकलन है और इसका शीर्षक “मैं वास्तविक हूँ “ एक कविता का मुखड़ा है जो आज के सभ्य समाज में मानवीय मूल्यों का सच उजागर करती है ।
प्रस्तुत रचनाओं में कुदरत और इन्सान से जुड़े जज़्बात बेसाख़्ता ही आप के साथ अपना रिश्ता क़ायम कर लेंगे।
“आया था तेरे शहर मैं तो ख़ाली हाथ
मुझे दुआ लग गई तेरी गली के फ़क़ीर से “
“चंद तसवीरें मैं ने दीवार पे सजा रखीं हैं
ऐसी ही मैंने अपनी दुनिया बसा रखी है “
“दामन में मैं ने बचा कर रखें हैं कुछ अख़्तियार
ठहरे पानी में पल रहे बिखरी यादों के सीप हैं“
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