इन आँखों के शहर को कभी एक उस शख्स से मिलना सम्भव नहीं था जो इसके भरे से दरिया को जान पाए मतलब मुझे पहचान पाए। वो कहते है न दरिया भी सुख जाती है और हमारे साथ भी ऐसा हुआ एक हसीन सूखे से प्रदेश मे अपनी खूबसूरती से इस समंदर को सोख गयी। असल मे ये पता नहीं था कि ख़ुशी से आगे भी कुछ होता जीने मे, अब मैं जी रहा तो ख़ुशी से भी ज्यादा मतलब मैं तुम्हे जी रहा हूँ।
इतनी आसानी से कह देना भी आसान ही है लेकिन जिस तरह से उस इंसान ने मुझे दिया वो मुझे बेहतर नहीं मेरे जैसा होने का कारण रहा, मैं अक्सर खुद ही से मिलता हूँ उससे बाते कर के।
मुझे इतना तो पता है कि किसी इंसान के तौर पर खुद के जैसा खोजना खुदा खोजने जैसा है, और शायद अब मेरे साथ खुदा ही है।
हम दोनों कुछ नहीं एक पुरानी चिट्ठी की तरह है एक छोटी सी ज़िन्दगी लिए पड़े, पता नहीं किस लिफाफे मे घूम रही हमारी खुशियाँ अभी और कल ज़ब उम्र बढ़ेगी भी तो एक महक होंगी हमारी आजकी।
यह पुस्तक आज उस खूबसूरत बला को एक भेंट है मेरी ओर से जिसमे कुछ ही समय में बहुत कुछ बदला है मुझमें अनजाने में ही पर जान बहत कुछ बदला है इसके लिए मैं उसका हमेशा आभारी रहूंगा।
तुम्हारा जानने वाला
सिद्धार्थ