JUNE 10th - JULY 10th
ज़िन्दगी की पथरीली राहों में नितांत अकेले चलते अगर कोई ऐसा मिल जाए जिस से दिल के तार एकदम जुड़ जाएँ, तो हम सौ सवालों में घिर जाते हैं। मानो मिलन की ख़ुशी मनाने से पहले जुदाई का डर दिल में घर कर गया हो ।
क्या ये प्रेम है या फिर केवल आतंरिक आकर्षण? क्या वो भी मेरे बारे में महसूस करता है जैसे कि मैं ?
अगर मैं गलत समझ रहा हूँ तोह वो क्या सोचेगी? अगर वो सिर्फ दोस्ती चाहता हो तो अपने दोस्तों से मेरे बारे में जाने क्या क्या कह दे ?
मुझे वो बहुत पसंद है पर क्या समझ हमें साथ में देख कर खुश होगा ? क्या एक लड़का लड़की सिर्फ दोस्त हो सकते हैं ?
पर क्या दोस्ती प्रेम की पहली पीड़ी नहीं है? और क्या प्रेम और देह अकेले हमबिस्तर हैं ? फिर आपसी सम्मान का क्या ?
प्रेम और दोस्ती क्या काफी है एक ज़िन्दगी साथ गुज़ार देने के लिए? पर सारी ज़िन्दगी साथ गुज़ारनी ही क्यूँ ?
और दायरे क्यों खींचने उस भाव के आस पास जिस की सीमा अनंत और मापदंड आसमानी हो?
कई बार किसी को दोस्त बनाने में, अपने अंतर्मन की बातों का राज़दार बनाने में बरसों लग जाते हैं। पर कभी कोई ऐसा मिल जाता है जिससे पहली मुलाक़ात में ही अपना सर्वस्व अर्पण करने पर कोई मजबूर हो जाता है।
ये प्रेम है या दैहिक आकर्षण ? और ऐसा क्यूँ है कि जब दो लोग देह बाँट लेते हैं तो दोनों के बीच छुपे राज़ टूटती पत्थर की दीवार की तरह ढ़हना शुरू हो जाते हैं । हर सिरहन, हर आलिंगन, हर चुम्बन के साथ माज़ी का एक सफ़्हा पलटते, राज़ की परत दर परत खोलते, बिस्तर पर निर्वस्त्र फैले दो बदन एक जान होने में क्यों समय नहीं लगाते ?
ऐसी मदमाती रातों की कुछ सुबह या तो भयंकर सिरदर्द के साथ होती है या अमनेशिया के साथ। कुछ जो आदतन इस देह के अदन प्रदान व्यापार के पुराने खिलाडी है, वो हलकी मुस्कराहट के साथ उठ कर अपनी ज़िन्दगी में यूँ वापस चले जाते है जैसे की इस ओर कभी रुख किया ही नहीं।
अदिति इन टाइप कास्ट ढांचों से अलग हो, एक नए सांचे से निकल कर आयी थी.. हाल ही मैं उसका दिल और सगाई दोनों टूटे थे। मन न होते हुए भी ,बॉस के बहुत कहने पर नए कैंपेन की कॉरपोरेट सक्सेस पार्टी में जाने के लिए तैयार हो गयी। ऑर्गेनिसेर्स ने कमरे भी बुक कर दिए थे होटल में , एक दिन मम्मी कि शादी की ज़िद सुनाने से बच जाने का अच्छा अवसर था अदिति के पास.
तेज़ रॉक म्यूजिक से कान बचा कर हॉल के एक कोने में सांगरिया का गिलास थामे अदिति पार्टी में हो रही नेटवर्किंग और बिज़नेस डील्स का तमाशा देख रही थी तभी किसी से आकर उसके गिलास से गिलास टकरा कर हलके से उसके कान में 'चियर्स 'कहा।
पहले थोड़ी सकपकायी अदिति पर फिर खुद को संभाल लिया. कम्पटीशन कंपनी का मार्केटिंग हेड रोहन सिंह था। अपनी हार की रंजिश या गम का कोई इल्म उसके चेहरे पर नहीं झलक रहा था , बल्कि वो हल्का-फुल्का मज़ाक करता पार्टी से घूम कर अदिति के पास आकर रुक गया था। वैसे मार्किट में या क्लाइंट्स के पास जब मिलते, जानी दुश्मनो की तरह मिलते पर आज माहौल अलग था , तो शायद युद्ध विराम में दोनों तरफ के सिपाही साथ मिल कर शराब तो पी सकते थे।
दोनों शोर से बचने के लिए बालकनी में चले गए. फिर बातों से बातें, वाइन का दौर ऐसा चला कि रात के दो बज गए थे। अंदर लाइट्स डिम होना शुरू हो गयी थी और नशे में डूबते उबरते लोग अपने कमरों में जाते नज़र आ रहे थे। रोहन ने आँख के इशारे से अपने जूनियर को कमरे में जाने के लिए कहा।
अदिति और रोहन का कमरा एक ही फ्लोर पर था. अदिति को पीने की आदत नहीं थी , सोशल ड्रिंकर थी तो थोड़ा घबरा रही थी। रोहन उसे कमरे तक छोड़ने आया तो न जाने क्यूँ , उसका हाथ पकड़ वो उसे साथ ले गयी.
अपने दिल का हाल कहती बहुत फूट फूट कर रोई, अदिति। उसका आंसुओं से भरा मासूम चेहरा देख कर रोहन का मन मायूस हो गया. रात यूँ ही घुल कर सुबह की सुनहरी किरणों में बदल गयी.
अदिति सुबह उठी तो दिमाग सुन्न था. रूम सर्विस से निम्बू पानी और डिस्प्रिन मंगवा दिमाग पर ज़ोर डाला. आखिर हुआ था क्या कल रात.
कमरे में रोहन की परफ्यूम की महक और एहसास के अलावा उसके वजूद को कोई निशानी नहीं थी।
अचानक अदिति को याद आया उसका लैपटॉप टेबल पर खुला पड़ा था और अगली बड़ी कॉर्पोरेट बिड की प्रेजेंटेशन उसमे थी।
अदिति का माथा ठनका। लैपटॉप का स्क्रीम अब भी गरम था. मन में जिस रोहन को प्यार से याद कर रही थी, एक बड़ी सी गाली निकाली।
बेडसाइड पर चार्जर में लगे फ़ोन पर नज़र पढ़ी ( जो शायद रोहन जाते जाते प्लग कर गया था ). फ़ोन उठाया और उसके नीचे दो कागज़ मिले।
टेढ़ी मेढ़ी राइटिंग में लिखा था - "पानी खूब पीना पूरे दिन ,बिल्लो। आदत नहीं शराब की तुम्हें शायद. ना ही डालो वैसे तो अच्छा होगा :)"
दूसरे कागज़ पर लिखा था - " यार, बड़ा मुश्किल था इतना बड़ा मौका सामने होना और हाथ न मारना। पर कई पार जंग जीतने के लिए छोटी लड़ाइयां कुर्बान करनी पड़ती है। "
कागज़ के पीछे साइड पर लिखा था , " अगले महीने कॉफ़ी पीने चलोगी मेरे साथ। जल्द ही नयी नौकरी ढून्ढ लूँगा । अपनी हंसी मेरे लिए संभाल के रखना। "
-रोहन
अदिति मुस्करायी और फ़ोन से साथ रखे लाल गुलाब को सीने से लगा लिया.
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shilpisheen
Nice Story..
Crystal M
Dr Shalini Goyal
बहुत अच्छी कहानी
Description in detail *
Thank you for taking the time to report this. Our team will review this and contact you if we need more information.
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