“बापू तुम्हें किसने मारा” केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि हमारे समय से किया गया एक साहसी और ईमानदार संवाद है। यह काव्य-संग्रह सत्ता, राजनीति और सामाजिक व्यवस्था के बीच खड़े होकर मनुष्य, समाज और नैतिक मूल्यों पर तीखे प्रश्न उठाता है।
इन कविताओं में सत्ता की विडंबनाएँ, जनता की पीड़ा, भूख, भाषा, धर्म और ‘कुर्सी’ सशक्त एवं जीवंत प्रतीकों के रूप में उभरते हैं।
भाषा सरल है, पर प्रश्न असुविधाजनक—जो पाठक को ठहरकर आत्ममंथन करने को विवश करते हैं। यह संग्रह केवल प्रतिरोध की आवाज़ नहीं, बल्कि करुणा, स्मृति, शोक और मानवीय संवेदना की भी गहन अभिव्यक्ति है—जहाँ देश कभी माँ की तरह कराहता है और मनुष्य अपने ही समय से जूझता दिखाई देता है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो कविता को केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि सच कहने का साहस मानते हैं।