यह उपन्यास, एक भारतीय विधवा नारी की टीस है, दर्द है, और कराह है| हमारे रूढ़िवादी समाज की कुरीतियों पर एक कुठाराघात है| हमारा समाज किस तरह, नारी को देवी, श्रद्धा, अबला, कल्याणी जैसे शब्दों से संबोधित (जो अत्यंत प्राचीनकाल से चली आ रही है) कर, कभी पूजा की चीज बना दिया, तो कभी भोग्या और चल संपत्ति समझ लिया| ऐसे जननी नारी न होकर मात्र एक भोग्या बनकर रह जाती है| उसे एक निरीह पशु मानकर, उसका हाथ, जिसके साथ मर्जी, उसे पकड़ा दिया जाता है| इस उपन्यास को पढ़कर मन दर्द भावुकता से भर उठता है, आत्मा कराह उठती है|
डॉ. तारा, की सशक्त लेखनी को पाकर, कहानी का एक-एक पात्र जीवित हो-होकर बातें करते हैं| पुष्पा (कहानी की मुख्य पात्री)एक गरीब घर की, मगर देखने में बेहद सुन्दर युवती है| उसके माता-पिता द्वारा उसका विवाह, अपनी सड़ी-गली कुप्रथाओं के अनुसार, बचपन में ही कर दिया जाता है, औ जब वह मात्र आठ साल की होती है, अर्थात जब वह अपना कपड़ा भी ठीक ढंग से नहीं पहन पाती है| उसके पति की मृत्यु हो जाती है| एक अबोध के साथ, समाज का यह क्रूर मजाक आँखों में आँसू ला देता है|
डॉ. तारा की प्रत्येक रचना, आम भारतीय की जीवन शैली को प्रतिबिम्बित करती है| यह बेमिसाल पुस्तक ‘बासी फूल’ ज्वलंत विषय पर दिल को छू लेने वाली कहानी है|