"जब पहाड़ रो पड़े" उत्तराखंड के उन गांवों की कहानी है, जो कभी जीवन से भरे हुए थे — जहां आंगन में मां पुकारती थी, पिता खेत जोतते थे, और बच्चे गलियों में दौड़ते थे। लेकिन आज, वहां सन्नाटा है। पलायन ने सिर्फ लोगों को नहीं छीना, उसने रिश्ते, संस्कृति और उम्मीद को भी साथ बहा दिया।
यह पुस्तक 20 अध्यायों में एक ऐसे सामाजिक और भावनात्मक यथार्थ को उजागर करती है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
हर अध्याय एक गांव की तरह है — जहां दर्द है, स्मृति है, और शायद एक रास्ता भी जो वापसी की ओर जाता है।
लेखक धीरेंद्र सिंह बिष्ट की यह छठी पुस्तक है, और उनकी अब तक की सबसे संवेदनशील रचना मानी जा सकती है।
उनकी लेखनी में पहाड़ की मिट्टी की सादगी, लोक भाषा की मिठास और समाज की गहराई बसती है।
यह किताब केवल पढ़ने के लिए नहीं, लौटने के लिए है।
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