भगवान् श्रीरामजी को अपनी सोलह वर्षकी आयुमें तीर्थाटनके समय ऋषि-मुनियोंका सत्संग मिलनेसे, वैराग्य उत्पन्नहो गया था। उनकी उदास पूर्ण व्यथाकी बात उन्हींके द्वारा सुनकर, महर्षि वसिष्ठजी उनको संसारिक व मानसिक कष्टोंसे रहित रहकर जीवन व्यतीत करनेका पूरा ज्ञान समझाते हैं। इसप्रकार से उनको मात्र सोलह वर्षकी आयुमें ही ब्रह्म, प्रकृति, जगत व स्वयं का पूर्ण ज्ञान प्राप्तहो गया था। जिससे श्रीरामजी अपना जीवन विषम से विषम परस्थितियोंमें तनाव मुक्त रहकर संसारके लिये प्रेरणा श्रोत बने हैं। योगवासिष्ठ रामायणमें सोलह वर्षके श्रीरामजी व उनके कुलगुरू महर्षि वसिष्ठजी की ज्ञान वार्ता है। योगवासिष्ठ रामायणके वैराग्य व मोक्षकी कामना दो प्रकरण परमात्माकी कृपासे हिन्दीकी सरल भाषामें लिखे हैं।
लेखक- सुरेश कुमार आर्य